विष्णु नागरः सुभाष चंद्रा, बैंक लोन और एनसीएलटी, बेचारे अमीर भी कितने गरीब होते हैं!
देश की आजादी के लिए न जाने कितने लोगों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी और एक यह यह सरकार है कि अपने अच्छे और सच्चे सेवक के लिए बाईस हजार करोड़ रुपये की कुर्बानी तक सह नहीं सकती? लानत है ऐसी सरकार पर! एक बार नहीं, सौ बार लानत है।

तो खबर यह है कि जी न्यूज के मालिक और पूर्व राज्यसभा सदस्य सुभाष चन्द्रा ने 22006 करोड़ रुपए का जो कर्ज बैंकों आदि से लिया था, उसे महज साढ़े छह करोड़, जी, फिर से लिख रहा हूं, केवल साढ़े छह करोड़ में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने निबटा दिया! यानी जितना वसूल करना था, उसका महज 0.03 फीसद लेकर मामला रफा-दफा कर दिया। उनसे कर्ज का एक प्रतिशत या आधा प्रतिशत तो छोड़ो, एक चौथाई फीसदी भी नहीं लिया! एक तरह से उन्हें मुफ्त में छोड़ दिया क्योंकि बताया जा रहा है कि इससे अधिक चुकाने की उन बेचारों की औकात नहीं थी! गरीब आदमी हैं न! कर्ज तो वे 22006 करोड़ का ले सकते हैं और उन्हें सादर दिया भी जा सकता है मगर चुकाते वक्त वे बेचारे इतने गरीब हो जाते हैं कि इतना गरीब तो गरीब भी यकायक नहीं होता! हजार रुपए लेकर तीस पैसे चुकाना भी उनके लिए भारी था! दिल पर पत्थर रखकर किसी तरह उन बेचारों ने साढ़े छह करोड़ रुपए देकर राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य निभाया!
अमीर भी कितने गरीब होते हैं, इस तरह की घटनाओं से पता चलता है। बताया जाता है कि 2017 में इन्हीं चंद्रा जी की नेटवर्थ 45888 करोड़ थी, जो घटते-घटते मात्र 31.7 करोड़ रह गई है! आप सोच सकते हैं कि वे इस बीच कितने गरीब होते गए और फिर भी जिंदा हैं, यह कुछ कम नहीं! हमें तो उनकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए और कहना चाहिए कि हिम्मते मर्दा तो मददे सरकार!
अब आप कहेंगे कि जी न्यूज के मालिक की हैसियत क्या इतनी कम हो सकती है? देखिए इस मामले में जी न्यूज को मत घसीटिये। उस चैनल का मूल और एकमात्र पवित्र उद्देश्य सरकार की तन और मन से सेवा करना है और विज्ञापन लेना है। वहां सेवा को प्राथमिकता है। उसकी कमाई उनकी अपनी कमाई नहीं है। वह एक पवित्र काम है, देश और धर्म की रक्षा का काम है। हिंदुत्व की सेवा है। उस पवित्र राशि को वे अब चिमटी से भी नहीं छूते। छूते होते तो मामला इतनी आसानी से रफा-दफा भी नहीं होता! सरकार की किरपा इतनी आसानी से नहीं बरसती!
आपको मालूम नहीं होगा और आपने मालूम करना चाहा भी नहीं होगा कि सुभाष चन्द्रा जी की संपत्ति इतनी कम कैसे हो गई! अमीरों को लोग अमीर मानकर चलते हैं। समझते हैं कि ये तो ऐश करते हैं, इनकी क्या परवाह करना? नतीजा सामने है। एक अमीर लगभग 45 हजार करोड़ से घटते-घटते 31.7 करोड़ पर आ गया और हमें पता ही नहीं चला! वह तो एनसीएलटी के सदस्यों में इंसानियत बची हुई है तो उन्होंने ध्यान दिया और सुभाष चन्द्रा जी के मान की रक्षा की!
उन्होंने सोचा कि इस तंगहाली में जीनेवाला आदमी जो मुश्किल से ही पांच सितारा होटल में खाना-पीना अफोर्ड कर पाता होगा, वह 22006 करोड़ का कर्ज कैसे चुकाएगा? ऐसे इ़ंसान को एनसीएलटी के सदस्य कर्ज चुकाने के लिए परेशान करते तो उन पर पाप नहीं चढ़ता? उनके ऊपर पहुंचने पर ईश्वर उनसे इस बात का जवाब मांगता तो वे क्या उत्तर देते? ईश्वर कहता तो ओह तुम वही पापी हो न, जिसने गरीब चंद्रा जी के प्रति जरा भी दया नहीं दिखाई थी! उनका दिवाला पिटवा दिया था। इन्हें फौरन मेरे सामने से हटाकर नरक ले जाओ! ऐसे पापी को मैं एक मिनट भी अपने सामने बर्दाश्त नहीं कर सकता। उम्र बढ़ने के साथ नीचेवाले के साथ ऊपरवाले से भी डरना होता है। दोनों तरफ बैलेंस बनाकर रखना होता है ताकि दोनों तरफ का आनंद अनंतकाल तक लिया जा सके!
उधर यह दृष्टिकोण भी सामने आ रहा है कि मान लो एनसीएलटी के सदस्य अड़ जाते कि हम तो सुभाषचन्द्रा जी से पूरा का पूरा पैसा वसूल करेंगे तो सोचिए इससे देश के तमाम पूंजीपतियों तक कितना खराब संदेश जाता कि देश को 2047 तक विकसित बनाने का सपना देखनेवाली सरकार कितनी ओछी और कमीनी है कि एक पूंजीपति के हित के लिए 22006 करोड़ रुपए भी कुर्बान नहीं कर सकती?
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देश की आजादी के लिए न जाने कितने लोगों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी और एक यह यह सरकार है कि अपने अच्छे और सच्चे सेवक के लिए बाईस हजार करोड़ रुपये की कुर्बानी तक सह नहीं सकती? लानत है ऐसी सरकार पर! एक बार नहीं, सौ बार लानत है। इस स्थिति को देखकर मान लो कि पूंजीपति अपना टीन-टप्पर उठाकर अमेरिका चलने को तैयार हो जाते तो बताइए इस प्राचीन देश का दुनिया की नजर में क्या सम्मान रह जाता? विश्वगुरु कंगाल हो जाते!
चंद लोग आज अपने लाख-दस लाख के टुच्चे-टुच्चे कर्ज का रोना रो रहे हैं कि हमारा तो एक पैसा भी कभी माफ नहीं होता, उन्हें व्यापक दृष्टिकोण से सोचना चाहिए। देश के पूंजीपति ही देश की असली मान और शान हैं! इस प्रकार देखें तो एनसीएलटी ने देश की आन-बान और शान को बचा लिया है! उसने 22006 करोड़ रुपए की ओर नहीं देखा, उसने देश के मान-सम्मान की ओर देखा! भारतीय पूंजीपतियों को विदेश में बसने के खतरे से बचा लिया!
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आलोचकों को यह भी सोचना चाहिए कि सरकार की जो सेवा पिछले बारह वर्षों से सुभाष चन्द्रा जी कर रहे हैं, उसका भी कोई मूल्य है या नहीं? इसके बदले उन्हें आज तक कुल क्या मिला है? जी टीवी को सरकारी विज्ञापन और कुल छह साल की राज्यसभागीरी! इतना कम पाकर भी जो सरकार मतलब राष्ट्र की सेवा कर रहा है, उसे दंडित करना क्या न्याय की दृष्टि से उचित होता? क्या ऐसे आदमी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए विवश करना सम्मानजनक होता?
फिर एनसीएलटी के मेम्बरान को यह भी लगा होगा कि इस मामले में उनसे अगर 'अन्याय' हो गया, सुभाष चन्द्रा जी फंस गए तो मोदी जी, अमित शाह जी, वित्त मंत्री निर्मला जी को कितना बुरा फील होगा? कितने उदास हो जाएंगे ये तीनों? आलरेडी ये बहुत परेशानी में चल रहे हैं। उनकी परेशानियां और बढ़ाना उनके प्रति बेईमानी होगी और उनके प्रति बेईमानी का मतलब है राष्ट्र के प्रति बेईमानी, जिसे इस देश के 140 करोड़ लोग कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे! ऊपर से सुभाष चन्द्रा जी का इस सरकार पर से विश्वास भी उठ जाएगा! लोकतंत्र का एक आधार स्तंभ जी टीवी धड़ाम से गिर जाएगा। ये सेंसेक्स नहीं है, जो कि फिर से उठ जाए!
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खैर कोई बात नहीं सुभाष चन्द्रा जी, आप गरीब हैं तो कोई बात नहीं आपका बाकी 99.97 प्रतिशत बकाया हम चुकाएंगे। आप गरीब हैं तो क्या हुआ, हम तो अमीर हैं! कोई बात नहीं सुभाष जी, बाकी 22000 करोड़ का बोझ हम सह लेंगे। कुछ और टैक्स ही तो बढ़ाएगी सरकार, जान तो लेगी नहीं हमारी। हम हमेशा की तरह यह भी खुशी-खुशी सह लेंगे। देश के हम देशभक्त नागरिक सुभाष चन्द्राओं को बचाने के लिए कोई भी बलिदान दे सकते हैं! फांसी पर भी चढ़ सकते हैं मगर उससे इनका कोई लाभ नहीं होगा, इसलिए नहीं चढ़ रहे हैं!
लेकिन अकेले सुभाष चन्द्रा को ही टारगेट क्यों करना? एक दर्जन से अधिक बड़े लोग अपना कर्ज माफ करवा चुके हैं। किसी ने अस्सी प्रतिशत तो किसी ने 95 प्रतिशत तक कर्ज माफ करवाया है! किसी ने 54000 करोड़ का कर्ज लिया और उसे 23 फीसदी तक कम करवा लिया। किसी ने 94 प्रतिशत तो किसी ने 95 प्रतिशत तक! देश अब गरीब नहीं रहा! यह जवाहरलाल नेहरू का नहीं, डंकेश जी का भारत है!
तो बोलो, भारत माता की जय! किसी को वंदेमातरम के छहों छंद याद हों तो उसे सस्वर गाएं!
