एक जमींदार की जागीर बन गया है देश
भ्रष्टाचार बढ़ने का मुख्य कारण सत्ता पर व्यक्तिवाद का हावी होना, न्याय व्यवस्था का राजनीतिकरण, चुनाव व्यवस्था पर सत्ता का अवैध प्रभाव, मानवाधिकार हनन और प्रजातंत्र का नाश है। ये सभी कारण तथाकथित विकसित भारत के आधार-स्तंभ हैं, मोदी की राजनीति का मूल यही है।

हाल में ही बर्लिन स्थित ट्रैन्स्पेरन्सी इन्टरनेशनल ने भ्रष्टाचार अनुभूति इंडेक्स 2025 (Corruption Perception Index 2025) प्रकाशित किया है। इस इंडेक्स की शुरुआत सबसे कम भ्रष्टाचार वाले देशों से होती है और अंत के देश सबसे अधिक भ्रष्टाचारी हैं। कुल 182 देशों की सूची में प्रधानमंत्री मोदी के “ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा” नारे वाला भारत ठीक मध्य में यानि 91वें स्थान पर है। जाहिर है, दुनिया के 90 देशों में भारत से कम भ्रष्टाचार है। इंडेक्स 0 से 100 अंकों के बीच में है, 100 अंक यानि भ्रष्टाचार-मुक्त और 0 अंक का मतलब पूरी तरह से भ्रष्टाचार। इसमें भारत को 39 अंक ही मिले हैं, जबकि वैश्विक औसत 42 है और एशिया-प्रशांत क्षेत्र का औसत अंक 45 है।
दरअसल देशों वाले इंडेक्स में भारत को शामिल ही नहीं करना चाहिए– वर्ष 2014 के बाद का तथाकथित विकसित भारत अब देश नहीं है बल्कि एक जमींदार की जागीर है और संसद जमींदार की बैठक। यहां भ्रष्टाचार की कोई परिभाषा ही नहीं है- बल्कि यह इस पर निर्भर करता है कि इसे किया किसने है। यदि एक ही काम जमींदार के विरोधी और जमींदार के संतरियों ने किया है, तब विरोधी भ्रष्टाचारी और संतरी दूध का धुला साबित कर दिया जाता है। भ्रष्टाचारी विरोधी भी यदि संतरी जमात में शामिल हो जाता है तो वह भ्रष्टाचारी नहीं रहता। यह सब खुले आम होता है, जांच एजेंसियों और न्यायालय के सहयोग से होता है।
संतरी भी जब जमींदार की मानसिक गुलामी की जकड़न से बाहर आने का प्रयास करता है तो उसका हेलिकाप्टर/हवाई जहाज आग के गोले में तब्दील हो जाता है। पूरे जागीर में जमींदार का न्याय चलता है– बलात्कारी, निर्मम हत्यारे और दूसरे अपराधी – सभी जमींदार की जागीर में सुरक्षित हैं और जमींदार का मीडिया वास्तविक अपराधियों को बेचारा और पीड़ितों को अपराधी साबित करने में जुटा रहता है। जमींदार के सभी मंत्रियों के पास भी केवल एक काम है– जमींदार की स्तुति और लगातार झूठ उगलना।
भारत के भ्रष्टाचार का पैमाना ही अलग है– दूसरे देशों में आर्थिक भ्रष्टाचार होते हैं, पर मोदी जी के तथाकथित विकसित भारत में तो सत्ता “तन, मन धन” और “मन, वचन और कर्म”– हरेक तरह से भ्रष्टाचारी है। दुनिया में कहीं भी जहां भ्रष्टाचार की परिभाषा खत्म होती है, हमारे देश में तो वहां से इसकी परिभाषा शुरू होती है। सत्ता अपने वक्तव्यों से भ्रष्टाचारी भाषा उगलती है, मीडिया और मंत्री-संतरी सभी इसे विकसित भारत के स्तम्भ का नाम देते हैं और प्रचारित करते हैं और जनता इसे सड़कों पर हत्या, बलात्कार के स्वरूप में पूरा करती है। यदि कोई कहीं कमी रह जाती है तो तथाकथित संवैधानिक संस्थाएं, पुलिस और न्यायालय इसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
जमींदार की जमींदारी अभेद्य है, जागीर पर पूंजीपतियों का राज है और जनता धर्म/आस्था का नंगा नाच देख रही है। जमींदार का विकास बिना आंकड़ों का है, क्योंकि आकड़ों पर प्रश्न उठाना जुर्म है। अब तो जमींदार को जनता के मतदान की भी कोई चिंता नहीं है, चुनाव आयोग शरणागत है। सत्ता के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाली हरेक आवाज को पुलिस और न्याय व्यवस्था मिलकर सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी/देशद्रोही/अपराधी साबित कर देते हैं। वैसे देश में बिना साबित किए भी आप लंबे समय तक कारागार की सलाखों के पीछे रह सकते हैं और न्यायाधीश अपने न्यायालय से बाहर किसी अधिवेशन में अभिव्यक्ति की आजादी और बिना आरोप साबित हुए कारागार से बाहर रहने के अधिकार पर लच्छेदार प्रवचन दे सकते हैं।
ट्रैन्स्परेन्सी इन्टरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है क्योंकि दुनिया से प्रजातंत्र खत्म हो रहा है। जिन देशों में प्रजातंत्र है भी, वहां इसे निरंकुश कर दिया गया है। भ्रष्टाचार बढ़ने का मुख्य कारण सत्ता पर व्यक्तिवाद का हावी होना, न्याय व्यवस्था का राजनीतिकरण, चुनाव व्यवस्था पर सत्ता का अवैध प्रभाव, मानवाधिकार हनन और प्रजातंत्र का नाश है। ये सभी कारण तो तथाकथित विकसित भारत के आधार-स्तंभ हैं, प्रधानमंत्री मोदी की पूरी राजनीति का मूल यही है।
दुनिया के दो-तिहाई देशों में भ्रष्टाचार का पैमाना वर्ष 2012 से लगातार बढ़ता जा रहा है। इस इंडेक्स में सबसे आगे के देश हैं– डेनमार्क, फ़िनलैंड, सिंगापुर, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड और जर्मनी। इन देशों में भी भ्रष्टाचार का पैमाना बढ़ रहा है तभी किसी देश को 100 अंक नहीं मिले हैं, बल्कि 90 अंक तक वाला भी कोई देश नहीं है। शीर्ष पर स्थापित डेनमार्क के भी 89 अंक हैं। कुल 80 या अधिक अंक वाले महज 7 देश हैं। इंडेक्स में शामिल कुल 182 देशों में से 122 देशों के अंक 50 या इससे भी कम हैं। भारत के महज 39 अंक हैं और इंडेक्स में यह 91वें स्थान पर है। इंडेक्स में सबसे नीचे 9 अंकों के साथ साउथ सूडान है, इससे पहले क्रम से सोमालिया, वेनेजुएला (जहां का तख्तापलट हाल में डोनाल्ड ट्रम्प ने किया था), यमन, लीबिया, एरिट्रिया, सूडान, निकारागुआ, सीरिया और नॉर्थ कोरिया हैं।
इस इंडेक्स में बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया 12वें स्थान पर, कनाडा 16वें, यूनाइटेड किंगडम 20वें, संयुक्त अरब अमीरात 21वें, फ़्रांस 27वें, अमेरिका 29वें, सऊदी अरब 45वें, इटली 52वें, दक्षिण अफ्रीका 81वें, अर्जेन्टीना 104वें, ब्राजील 107वें, मिस्र 130वें, मेक्सिको 141वें और रूस 157वें स्थान पर है। एशियाई देशों में सबसे आगे 18वें स्थान पर भारत का पड़ोसी भूटान और जापान है, साउथ कोरिया 31वें, इजरायल 35वें, चीन 76वें स्थान पर है जबकि भारत 91वें स्थान पर है। भारत के सभी पड़ोसी देश हमसे भी अधिक भ्रष्ट हैं– इंडेक्स में श्रीलंका 107वें, नेपाल 109वें, पाकिस्तान 136वें, बांग्लादेश 150वें और अफगानिस्तान 169वें स्थान पर है।
ट्रैन्स्परेन्सी इन्टरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते भ्रष्टाचार का मुख्य कारण प्रजातंत्र का खात्मा और सत्ता द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी का क्रूर दमन है। अभिव्यक्ति की आजादी का दमन कर सत्ता अपने भ्रष्टाचार को जनता के सामने उजागर होने से बचा लेती है। वर्ष 2012 के बाद से गैर-युद्ध क्षेत्रों में 829 पत्रकारों की हत्या की गई, इनमें से 150 हत्याएं उन पत्रकारों की गईं जो सत्ता के भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। इन 150 हत्याओं में से 90 प्रतिशत से अधिक हत्याएं ब्राजील, भारत, मेक्सिको, पाकिस्तान और इराक जैसे देशों में की गई।
इस रिपोर्ट में सीधे तो भारत के प्रजातंत्र के विनाश पर कुछ नहीं है, पर अप्रत्यक्ष तौर पर इससे देश के प्रजातंत्र की स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। इन 182 देशों में जीवंत प्रजातंत्र वाले देशों का औसत अंक 71 है, विकृत-प्रजातंत्र वाले देशों का औसत अंक 47 है और गैर-प्रजातान्त्रिक देशों का औसत अंक 32 है। हमारे देश को इंडेक्स में 39 अंक दिए गए हैं– जाहिर है हमारा प्रजातंत्र गैर-प्रजातंत्र और विकृत-प्रजातंत्र के बीच में है। इसी तरह उन्मुक्त मानवाधिकार वाले देशों का औसत अंक 68 है, संकुचित मानवाधिकार वाले देशों का औसत 51, बाधित मानवाधिकार वाले देशों का औसत अंक 38, मानवाधिकार हनन वाले देशों का औसत 32 और शून्य मानवाधिकार वाले देशों का औसत अंक 30 है। इन आंकड़ों के अनुसार भी भारत की स्थिति बाधित मानवाधिकार वाले देशों जैसी है। यही तथाकथित विकसित भारत जो एक जमींदार की जागीर में तब्दील हो चुका है, की सच्चाई भी है।
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