तीन मुलाकातें और 'न्यू इंडिया' के दर्शन: देसी उपनिवेशवाद के चंगुल में देश

विदेशी उपनिवेशवाद की गिरफ्त से आजाद हुआ भारत अब देसी उपनिवेशवाद के चंगुल में फंस चुका है

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अवय शुक्ला

यह मेरे लिए एक बुरा सप्ताह रहा। सबक देने वाला लेकिन निराशाजनक और मैं अपने ‘56 इंच’ के सीने पर तमगे की तरह इसे नहीं रख सकता। सारा मामला केरल पुलिस के एक रिटायर्ड डीजीपी के एक ट्वीट से शुरू हुआ। अपने ट्विटर हैंडल पर उन्होंने ऐलान किया कि हिन्दुओं के बचाव में वह पूरे दम-खम (विद ऑल गन्स फायरिंग) के साथ उतर आए हैं। जाहिर है, वह इसका जवाब नहीं दे सकते थे कि आखिर 82% बहुसंख्यक आबादी वाले समुदाय को किसी सुरक्षा की जरूरत ही क्यों है? 

जो भी हो, उन रिटायर्ड डीजीपी ने विरोध प्रदर्शन कर रहे पहलवानों (जिन्हें वह ‘कचरा’ करार देते हैं) के बारे में कहा कि उन्हें बेझिझक गोली मारी जा सकती है और वह उन पहलवानों को पोस्टमॉर्टम टेबल पर देखना चाहते हैं। इस तरह के शख्स के पुलिस बल की अगुआई करने से काफी कुछ अंदाजा होता है कि भारत में कानून कैसे लागू किया जाता है लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि यह हमें आज के भारतीय समाज के बारे में भी बहुत कुछ बताता है। खैर, उसपर मैं बाद में आऊंगा। 

सप्ताह का मेरा दूसरा अनुभव एक करीबी दोस्त और किसी और सेवा के सेवानिवृत्त सहयोगी के जरिये आया जिन्होंने कहा कि महिला पहलवान वैसे ही सलूक की हकदार हैं जैसा दिल्ली पुलिस ने उनके साथ किया। उनके लिए किसी भी तरह का अफसोस जाहिर करने से इनकार करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि पहलवान यह सब काफी सोच-समझकर कर रहे हैं और उनका असली इरादा 2024 के चुनावों में राजनीति में प्रवेश करने का है। उन्होंने मुझसे कहा, ‘ये पहलवान लगभग 30 साल के हो चुके हैं और उनके लिए कुश्ती जैसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी खेल में बने रहना मुश्किल था। लिहाजा, उन्हें ‘वैकल्पिक व्यवसाय’ तो खोजना ही था।’

मुझे पता चल गया कि यह जनाब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के बड़े वाले भक्त हैं लेकिन मुझे नहीं पता था कि वह अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण इस हद तक अमानवीय हो गए हैं कि वह यौन उत्पीड़न के पीड़ितों का उपहास करने और उनके साथ हिंसा की कामना करने की हद तक चले जाएंगे। 


निराशा भरे इस हफ्ते का अंत शिमला के एक मित्र के होटल में दोपहर के भोजन के साथ हुआ। मेरी टेबल पर मौजूद सभी लोग समाज में प्रतिष्ठित थे- व्यवसायी, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी और उनकी पत्नियां। सभी एकमत थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में नहीं है, छोटे-मोटे काम-धंधों का हाल बुरा है और अगर बस चले तो मोदी की बुराई करने वालों को फांसी पर चढ़ा दिया जाए। मोदी समर्थक महंगाई, बेरोजगारी, असमान आय वितरण और गरीबी अनुपात को वामपंथी प्रचार कहकर खारिज कर देते हैं क्योंकि उनकी नजर में इसका मकसद मोदी को बदनाम करना है।

क्या आप नए भारत के इन तीन लक्षणों में कोई पैटर्न देखते हैं? मुझे दिखता है- भारत को उसके अभिजात वर्ग, उसके शिक्षित, संपन्न, शहरी लोगों, इसकी 75% संपत्ति पर कब्जा कर लेने वाले 10% लोगों और सत्ता के सभी लीवर को नियंत्रित करने वाले- नौकरशाही, रक्षा बल, इसकी अर्थव्यवस्था, इसके शिक्षा संस्थान, खेल और संस्कृति, इसका मीडिया नीचा दिखा रहे हैं।

अब ये नई ईस्ट इंडिया कंपनी हो गई हैं जिनकी अकेली चिंता अपने धन को सुरक्षित रखना (और बढ़ाना), अपनी गेटेड सामुदायिक जीवन शैली की रक्षा करना, अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और सत्ता और नीति निर्माण पर अपनी पकड़ बनाए रखना है। उन्हें अपनी ‘विशेषाधिकार प्राप्त छावनियों’ के बाहर रहने वाले भारत के 90% लोगों की परवाह नहीं। इसकी झलक हमें कोविड के समय भी देखने को मिली थी और तब हमने समझा था कि यह कोई सामान्य व्यवहार नहीं बल्कि अपवाद है लेकिन अब यह साफ होने लगा है कि दरअसल, यही हमारे सामाजिक चरित्र का मूल बन गया है। 

यही वजह है कि मौजूदा दौर को मैं आजादी के बाद के उपनिवेशीकरण के रूप में देखता हूं। फर्क यह है कि इस बार यह उपनेविशीकरण देसी नेताओं, देसी पूंजीपतियों,देसी नौकरशाही और सामाजिक अभिजात वर्ग द्वारा हो रहा है। हमारे आसपास औपनिवेशीकरण के साफ संकेत दिख रहे हैं- एक सरकार जिसने अहंकारपूर्वक तरीके से जनता की मांगों, उनके हितों और यहां तक कि विरोधों की ओर से आंखें मूंद रखी हैं; एक पुलिस जो आजादी से पहले की पुलिस जैसी क्रूर है; कानून जिसे सत्ताधारी और कुछ खास लोगों के हितों को पूरा करने के लिए तोड़-मरोड़ दिया गया है; चंद लोगों के फायदे के लिए प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट; बड़े पैमाने पर आदिवासियों और स्थानीय लोगों का विस्थापन जिसका हालिया उदाहरण अंडमान की परियोजना है; असंतुष्टों को अतार्किक कारणों से जेल में डालना।


कोविड काल ने शायद इसका पक्का सबूत दे दिया: जहां 7.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए, अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई और उनकी संपत्ति दोगुनी बढ़कर 720 अरब डॉलर हो गई। असमानता को मापने का देश-दुनिया में स्वीकृत पैमाना गिनी गुणांक 2000 के 74.7 से बढ़कर 2021 में 80.3 हो गया। हम असमानता को कम करने के लिए प्रतिबद्धता सूचकांक में 160 देशों में से 123 रैंक पर हैं।

अब बात दूसरे उपनिवेशीकरण का अंतिम प्रमाण है: जैसे अंग्रेज भारत से निकाले गए धन को वापस अपने देश में ले गए, वैसे ही वर्तमान उपनिवेशवादी, यानी देसी लोगों द्वारा विदेशों में 500 बिलियन डॉलर से 4 ट्रिलियन डॉलर के बीच जमा किए जाने का अनुमान है। 

अभिजात वर्ग द्वारा शोषण के हमारे इतिहास के इस चरण की अध्यक्षता नरेंद्र मोदी कर रहे हैं जिन्हें संयोगवश, उसी समय ‘भारत सम्राट’ का ताज पहनाया जा रहा था जब दिल्ली पुलिस खिलाड़ियों को बेरहमी से पीट रही थी। वजह यहां भी वही थी- मोदी पर महिला ओलंपियनों की पुलिस द्वारा पीटे जाने, सुदूर एक राज्य में आदिवासियों की हत्या, महीनों चले किसानों के विरोध प्रदर्शन, कठुआ और हाथरस में समान विचारधारा वाले लोगों द्वारा नाबालिगों के बलात्कार से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह सरकार सिर्फ, और सिर्फ नई ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों और शेयर धारकों के हितों को पूरा करती है- चाहे वह बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों का क्रूर दोहन हो, पाखंडी विदेश नीति के जरिये सस्ते रूसी तेल खरीदकर अपने खास उद्योगपतियों को बेहिसाब मुनाफा पहुंचाना हो बेशक वे तेल का कारोबार में न हों। इतना सबकुछ अगर स्थायी वफादारी सुनिश्चित करने के लिए काफी न हो तो धर्म की सुपर गोंद तो है ही। 

यही कारण है कि 28 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन का प्रारूप नए अभिजात वर्ग के लिए एक आदर्श प्रतीक था: सत्ताधारी पार्टी के नए कॉरपोरेट मुख्यालय पर 1,200 करोड़ रुपये की फिजूलखर्ची, इस मौके पर एक ही धर्म के कर्मकांड का खुला वर्चस्व, एक व्यक्ति को सत्ता हस्तांतरण का तड़क-भड़क वाला प्रदर्शन, एक व्यक्ति को सुरक्षा जबकि उसके पीड़ितों को बाहर क्रूरता से पीटा जाना। लोकतंत्र का ढोंग जबकि वोट डालने की रस्म अदायगी को छोड़कर आम लोगों की किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं रही। अब हम एक मंडली और उसके उत्साही चीयर-लीडर्स द्वारा शासित होंगे। पचहत्तर साल की राजनीतिक और सामाजिक प्रगति यमुना में बहा दी गई।

बरबस 1804 की याद आती है जब एक फ्रांसीसी सम्राट ने अपनी ताजपेशी खुद की। पोप से ताज लेकर खुद ही अपने सिर पर रख लिया। संदेश यह था कि उन्होंने जो कुछ पाया, उसके पीछे किसी संविधान या परंपरा की कोई भूमिका नहीं। जो पाया, अपने दम पर पाया और इसलिए उन्हें किसी के साथ सत्ता साझा करने की जरूरत नहीं। पोप चुपचाप बगल में खड़े रहे। यह सब कुछ जाना-पहचाना सा लग रहा है ? इतिहास खुद को दोहराता है। लेकिन क्या त्रासदी भी दोहराएगी, यह तो वक्त ही बताएगा।

(अभय शुक्ला रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं।)

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