विष्णु नागर का व्यंग्यः मोदी-मंत्र का जाप करके ये सबकुछ खा जाते हैं, मंदिरों का चंदा और चढ़ावा तक डकार गए!
ये पदों की गरिमा खा गए। सीबीआई, ईडी सबको खा गए। निर्वाचन आयोग की इन्होंने केवल हड्डियां ही नहीं चूसीं, उन्हें गटक भी गए। ये करोड़ों लोगों की नागरिकता जीम चुके हैं। ये पार्टियां खा जाते हैं, लोकतंत्र को सशरीर निगल जाते हैं। अदालत कुछ खा चुके, कुछ बाकी है।

'न खाऊंगा और न खाने दूंगा' के मोदी-मंत्र का जाप करके ये सबकुछ खा जाते हैं। रुपए खा जाते हैं। डॉलर खा जाते हैं। येन हो या यूरो, सब खा जाते हैं। खाने को मिले तो 80000 किलो का मशरूम खा जाते हैं और ऊपर से गोबर खाकर और गोमूत्र पीकर कट्टर हिन्दू हो जाते हैं। ये पिछले 12 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल खा चुके हैं और हर दिन पच्चीस स्कूल खा रहे हैं। ये स्कूल खाते हैं तो कालेजों को नहीं छोड़ते और जब कालेजों को नहीं छोड़ते तो फिर विश्वविद्यालयों और बड़े और पुराने इंस्टीट्यूटों को क्यों छोड़ें? जो भी नेहरू ने बनाया और संवारा है, इन्हें सब का सब खा पीकर खत्म करना है!
खाते-खाते दांयां हाथ दर्द करने लगता है तो ये बांए हाथ से खाने लगते हैं। जब दोनों हाथ जवाब देने लगते हैं तो ये सहायता के लिए सरकारी शिवसेना, एनसीपी, आप, टीएमसी को बुला लेते हैं।खा-खाकर हर एक किलोमीटर पर ये नैतिकता की उल्टी जरूर करते हैं। उसमें से चाल, चरित्र, चेहरा, अखंड भारत, विश्व गुरु, विश्व में बजता डंका बाहर आता है, जो इतनी बदबू मारता है कि जो भी उधर से गुजरता है, उसकी तबियत बिगड़ जाती है। उसे मतली आ जाती है।
अमर्त्य सेन की एक किताब है- 'आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन'- भारत की प्राचीन काल से चली आ रही तर्क परंपरा के बारे में। ये भारत की तर्क की, बहस की, विरोध की, विवेक की उस परंपरा को खाकर, हाथ धोकर टावेल से हाथ पोंछ चुके हैं। इस कारण ये गर्व से अपने को कट्टर सनातनी मानते हैं।
विज्ञान को वेदों की पेटी में बंद कर उसकी चाबी तक ये खा चुके हैं। इतिहास इनका प्रिय भोजन है। ये शिवाजी और राणा प्रताप के नाम पर मध्यकाल का पूरा इतिहास खा चुके हैं। इन्हें नेहरू और गांधी से नफरत है तो ये आजादी का पूरा इतिहास भी खा चुके हैं। ये जगहों के ऐतिहासिक नाम खा चुके हैं। ये बहुत सी मस्जिदों, मजारों, चर्चों को खाने के बाद ताजमहल को भी खाना चाहते हैं मगर उसके लिए मजबूत दांत और मजबूत आंतें चाहिए, जो रोज रबड़ी उड़ाने के कारण सड़ चुकी हैं।
ये जयश्री राम का नारा लगाकर मंदिरों का चंदा और चढ़ावा खा गए। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में आठ हजार लोगों को आमंत्रित कर 113 करोड़ खर्च बता चुके हैं। इसमें कितना खाया और कितना पिया होगा, कौन जाने! ऊपर से इनका दावा है कि हम पाक भी हैं और साफ भी। इनकी खाने की क्षमता असीम है। जब ये खाते हैं तो फिर खाते ही चले जाते हैं। न आगे देखते हैं, न पीछे, न पेट की समाई देखते हैं, न अपने मुंह का आकार। गले-गले तक ठूंसते हैं। हजम न हो तो बार-बार लोटा लेकर जाना इन्हें मंजूर है, मगर खाएंगे जरूर। 2047 तक ये खाने का संकल्प ले चुके हैं।
ये लोगों की इज्जत आबरू खा जाते हैं। उनका नागरिक होने का अधिकार खा जाते हैं। किसी का घर हो तो घर और झुग्गी हो तो झुग्गी और दुकान हो तो दुकान, बुलडोजर लेकर आते हैं और एक कौर में निपटा देते हैं। दस मिनट भी नहीं लगाते, इनकी भूख इतनी विकराल है।
ये पदों की गरिमा खा गए। प्रधानमंत्री, अब प्रधानमंत्री नहीं, मंत्री अब मंत्री नहीं और मुख्यमंत्री अब मुख्यमंत्री नहीं। सब मोदी का कीर्तन करते हुए प्रसाद स्वरूप देश को खा रहे हैं। सीबीआई, ईडी सबको ये खा गए। निर्वाचन आयोग की इन्होंने केवल हड्डियां ही नहीं चूसीं, उन्हें गटक भी गए, जो निश्चय ही वीरता का काम है।
वोटर का ये लवणेन भोज्यम कर चुके हैं। ये करोड़ों लोगों की नागरिकता जीम चुके हैं। ये पार्टियां खा जाते हैं, लोकतंत्र को सशरीर निगल जाते हैं। अदालत कुछ खा चुके, कुछ बाकी है, आजकल उसे भी खाने में लगे हैं। ये हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच का भाईचारा खा गए और अब डकार पर डकार मार रहे हैं।
ये हिंदुत्व के नाम पर परिवार के परिवार खा गए। रिश्तेदारियों और दोस्तियां खा गए। लड़के -लड़कियों का भविष्य पेपर लीक करवाकर खा गए। ये संसद और संविधान खा गए। पेड़, पहाड़ और जंगल खा गए। इस खाने को ये खाना नहीं मानते, सनातन की सेवा मानते हैं। भारत के हिंदू गौरव की वापसी मानते हैं।
ये विकास के नाम पर हजारों करोड़ की सड़कें और पुल खा गए और फिर से थाली, कटोरी लेकर हाजिर हैं। ये पीएम केयर फंड के नाम पर सार्वजनिक निगमों का पैसा और कर्मचारियों की एक दिन की तनख्वाह के हजारों करोड़ खा गए। इन्होंने इलेक्टोरल बांड के नाम पर भी खूब खाया और खूब निबाहा। इन्होंने इतना खाया कि देश की हर राजधानी और हर जिले में इनकी पार्टी के भवन खड़े हो चुके हैं और हो रहे हैं। इनकी पार्टी के पास आज भी 1200 हजार करोड़ रुपए हैं, जो कि इनके सत्ता में आने से पहले कुल 35 लाख थे। कहां से किसकी सेवा करने से आए?
इन्होंने अडानी को देश की हवा, पानी, जंगल, जमीन, खेत, पहाड़ सब खाने के लिए छुट्टा छोड़ दिया है। ये एक रुपए सालाना में देश के सबसे अमीर आदमी को जंगल बेच दें तो यह कानून सम्मत है मगर कोई गरीब, आदिवासी, दलित दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में झोपड़ी बना ले तो ये सरकारी जमीन का अतिक्रमण है। ये जल्दी ही भारत को खाकर, इंडिया को भविष्य में खाने के लिए बचाकर रखेंगे।
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