नए नियमों की वजह से बंद हो जाएंगी हजारों पत्रिकाएं
83,500 की जगह निकल रहीं 31,650 पत्रिकाएं, अब इन पर भी संकट।

अपने यहां पत्रिकाएं कैसे बंद हो रही हैं, यह समझने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि आखिर, यह ख़तरा कितना बड़ा है। 2024-25 में देश में लगभग 83,500 पत्रिकाएं निकलती थीं। 2025-26 में इनकी संख्या घटकर 31,650 हो गई है। सबसे ज्यादा ख़तरे में उन भाषाओं की पत्रिकाएं हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या कम है। जैसे, बोडो भाषा में 2022 में 18 पत्रिकाएं निकलती थीं। अब वहां केवल एक साप्ताहिक न्यूजपेपर बचा है। 2022-23 में डोगरी में कम-से-कम 8 पत्र-पत्रिकाएं निकलती थीं। अब कोई नहीं निकलतीं। कश्मीर में पहले कम-से-कम चार वीकली निकलती थीं, अब केवल एक बची है।
दरअसल, प्रेस एवं पंजीकरण कानून में हुए संशोधन के बाद न्यूजपेपर की परिभाषा बदल गई है। उसमें केवल डेली न्यूजपेपर और वीकली न्यूजपेपर रह गए हैं। इस परिभाषा से मंथली न्यूजपेपर या पत्रिका, त्रैमासिक, छमाही और सालाना पत्रिकाओं को बाहर कर दिया गया है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बताया भी है कि इन्हीं नियमों की वजह से पिछले साल 88,000 पत्र-पत्रिकाओं के टाइटल (नाम-शीर्षक) रद्द कर दिए गए क्योंकि इन्होंने 2023 में बनाए गए प्रेस और पंजीकरण, यानी रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 11 का उल्लंघन किया है। दरअसल, धारा 11 में प्रेस रजिस्ट्रार जनरल को ये अधिकार दिए गए हैं कि वह तीस दिनों से कम नहीं बल्कि एक सौ अस्सी दिनों से अधिक की अवधि के लिए, एक आवधिक ( पीरीयॉडिकल्स) के पंजीकरण प्रमाण पत्र को निलंबित कर सकता है।
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असली सवाल यह है कि जो बची हुई 31,650 पत्र-पत्रिकाएं हैं, उनमें से भी कितनी बच पाएंगी। सरकार ने उन पर भी पोस्ट ऑफिस के कानून के जरिये ताला लगाने की तैयारी कर ली है। पत्रिकाएं चाहे जहां से भी निकलती रही हैं, वे स्टाॅलों पर बिकती थीं। कोविड के बाद से और विभिन्न सरकारी दबावों के कारण पत्र-पत्रिकाओं की अधिकतर दुकानें, स्टाॅल बंद हो गए। देश की यूनिवर्सिटी तक में ऐसी दुकानें बंद कर दी गईं। स्टेशनों पर एएच व्हीलर्स के जरिये किताबों के साथ पत्र-पत्रिकाएं बिकती थीं। उनकी शक्ल ऐसी कर दी गई है कि वह परचून या दवा की दुकान लगती है। किसी की इच्छा भी हो, तो वह पत्रिकाएं नहीं ख़रीद सकता।
इसलिए अब एकमात्र तरीका यह है कि छोटी पत्रिकाएं डाक से भेजी जाएं। लेकिन सरकार ने इससे संबंधित नियम-कानून ही बदल दिए हैं। पत्रिकाएं और किताबें आदि प्रिंटेड सामग्री भेजने के लिए बुक पोस्ट सबसे सस्ती सुविधा थी। नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसे बंद कर दिया।
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नए नियमों के तहत पोस्ट ऑफिस ने अगले साल से रजिस्टर्ड पत्रिकाओं को पोस्टल लाइसेंस देने से मना कर दिया है। मतलब, ये लाइसेंस 2026 तक ही कायम रहेंगे। वैसे, डाक विभाग ने अपने स्तर से पत्रिकाओं को यह जानकारी नहीं दी है कि उन्हें 2027 से डाक लाइसेंस नहीं मिलेगा। जो पत्रिकाएं अगले साल के लिए डाक लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए अर्जी भेज रही हैं, उन्हें ही यह जानकारी अलग-अलग दी जा रही है।
लाइंसेंस का मतलब यह होता है कि पत्रिकाएं पचास पैसे में भेजी जा सकती हैं। लेकिन संशोधित नियमों के अनुसार, जिस पत्रिका के अभी पचास पैसे लगते हैं, उनमें चार रुपये का टिकट लगाना होगा। यदि पत्रिका जर्नल है तो उसके नियम अलग हैं। भारत सरकार के डाक भवन में सैकड़ों लोग गुहार लगा चुके हैं लेकिन अब तक तो कहीं से कोई सकारात्मक संकेत नहीं है। इन पंक्तियों के लेखक ने स्वयं डाक भवन के अधिकारियों से मिलने बाद यही महसूस किया
वैसे भी, पत्रिकाओं के लिए इस्तेमाल की जाने वाली हर चीज पर तो टैक्स पहले से ही ज्यादा थे, मोदी सरकार ने जो नए नियम-कानून बनाए हैं, उससे ये टैक्स और बढ़ गए हैं। कागज और छपाई दिनोंदिन महंगी होती गई है। पहले सरकारी विज्ञापन सरकार देती थी। अब विज्ञापन देने का काम बड़ी-बड़ी कंपनियों के हवाले कर दिया गया है, मतलब अब ये कंपनियां तय करती हैं कि किस अखबार, किस पत्रिका को कौन-सा और कितना विज्ञापन देना है। दिल्ली में जब शीला दीक्षित की सरकार थी, तब लघु पत्रिकाओं को विज्ञापन देने की एक नीति बनाई गई थी। उनके जाने के कुछ साल बाद वह बदल गई।
वैसे भी, आजादी के बाद से लघु और अव्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं को सरकारी नीति में एक निश्चित मात्रा में- बड़े व्यवसाय वाले को 60 और मध्यम आकार के संस्थान तथा लघु पत्रिकाओं को 40 - इस औसत के आधार पर विज्ञापन देने का सिद्धांत तय हुआ था। इसके पीछे सोच यह थी कि ये गैरव्यावसायिक पत्रिकाएं राजनीतिक पार्टियों या चुनावी काम के लिए भले नहीं हों लेकिन वे समाज में विभिन्न तरह के विचारों के ख़याल से बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस ख़याल से, जिन पत्रिकाओं पर गाज़ गिरती लगती है, वे मुख्यतः वंचितों, महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों को स्वर देने वाले मंच हैं।
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