आज के सत्ताधारी चाहते हैं कि देश में नागरिक नहीं, सिर्फ उनके वोटर रहें

जिस नागरिक ने देश को गुलामी से मुक्त किया, अपने देश का अपना लोकतंत्र बनाया, इस और ऐसी कितनी ही सरकारों को बनाया-मिटाया, आज उसी नागरिक से, उसकी ही बनाई सरकार उसकी वैधता पूछ रही है और उसे अवैध घोषित करने का कानून बनाकर इतरा रही है।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार प्रशांत

कोई अगर पूछे कि इस गणतंत्र दिवस पर, 70 से ज्यादा उम्र के गणतंत्र का क्या हाल है, तो हमें कोई जवाब देने की जरूरत नहीं है- बस, उसे सड़क का रास्ता बता देना है। सारा देश सड़कों पर है। जिन्हें स्कूलों-कॉलेजों में, बाजारों-दुकानों में, घरों-दफ्तरों में होना चाहिए था, वे अगर सड़कों पर उतर आएं तो समझ लेना चाहिए कि देश की गाड़ी पटरी से उतर रही है। जिस नागरिक ने देश को गुलामी से मुक्त किया, अपने देश काअपना लोकतंत्र बनाया, इस और ऐसी कितनी ही सरकारों को बनाया-मिटाया, आज उसी नागरिक से, उसकी ही बनाई सरकार उसकी वैधता पूछ रही है और उसे अवैध घोषित करने का कानून बनाकर इतरा रही है। कोई कहे कि नौकरों (प्रधानसेवक!) ने मालिक तय करने काअधिकार ले लिया है, तो गलत नहीं होगा।

हमने जिस सरकार को देश के लिए चुना था, उसने देश को दल में बदल लिया है। हमने लोकसभा में उसे जो बहुमत दियाथा, उसे उसने मनमाना करने का लाइसेंस मान लिया है। वह भूल गई है कि नागरिक उससे नहीं हैं, वह नागरिकों से है। नागरिक उसे चाहे जब-तब बदल सकता है, वह चाहे, तब भी नागरिक को बदल नहीं सकती है।

नागरिकता की एक परिकल्पना और उसका आधार हमारे संविधान ने हमें दिया है कि जो भारत में जनमा है, वह इस देश का नागरिक है। फिर उसी संविधान ने यह भी कहा कि कोई जनमा कहीं भी हो, यदि वह इस देश की नागरिकता का आवेदन करता है और संविधान सम्मत किसी भी व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करता है, तो सरकार उसे नागरिकता देगी। ऐसा करते समय सरकार न लिंग का भेद कर सकती है, न धर्म या जाति का, न रंग या नस्ल या देश का। नागरिकता अनुल्लंघनीय है, नागरिक स्वंयभू है। सरकार को याद कराना जरूरी हो गया है कि उसने नागरिक प्रमाणित करने का जो अधिकार लपक लिया है, वह लोकतंत्र, संविधान, राजनीतिक नैतिकता और सामाजिक जिम्मेवारी के खिलाफ जाता है।

साल 1925 से, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की स्थापना के बाद से, एक सीधी और साफ धारा मिलती है जो हिंदुत्व का अपना ही नया दर्शन बनाती है और दावा करती है कि देश धर्मों से बनते हैं और इसलिए वह हिंदू बहुमत वाले इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाकर रहेगी। विनायक दामोदर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर आदि से प्रेरित और इनके द्वारा ही संगठित-संचालित हिंदुत्व के इस दर्शन को सबसे पहला और सबसे बड़ा समर्थन मिलता है मुस्लिम लीग से। सावरकर-जिन्ना धर्माधारित राष्ट्र के इस मंच पर एक साथ खड़े मिलते हैं।


इन दोनों की इस सांप्रदायिक सोच को, उसके जन्म से ही लगातार महात्मा गांधी से सबसे बड़ी चुनौती मिलती रही। गांधी भारत की आजादी की लड़ाई के सेनापति भर नहीं थे, भारतीय समाज के नए दार्शनिक भी थे। वे खुद को हिंदू कहते थे- सनातनी हिंदू! लेकिन हिंदुत्व के संघ-परिवारी दर्शन के किसी तत्व को स्वीकार नहीं करते थे। गांधी को सीधी चुनौती देकर, साथ लेने की बनावटी मुद्राएं धरकर और फिर छल की सारी कोशिशों के बाद भी जब गांधी हाथ नहीं आए, और जनमानस पर उनके बढ़ते असर और पकड़ की कोई काट ये खोज नहीं पाए, तब जाकर यह तय किया गया कि इन्हें रास्ते से हटाया जाए।

यही वह फैसला था जो पांच विफल कोशिशों के बाद, 30 जनवरी, 1948 को सफल हुआ और गांधी की हत्या हो गई। योजना यह थी कि हत्या से देश में ऐसी अफरा-तफरी मचेगी, मचाई जाएगी जिसकी आड़ में हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर कब्जा कर लेंगी। हिंदुत्व की इनकी अवधारणा तानाशाही की है और सत्ता इनके लिए अस्तित्व का सवाल है। हत्या तो कर दी गई लेकिन देश में वैसी अफरा-तफरी नहीं मची जिसकी आड़ लेकर ये सत्ता तक पहुंचें। गांधी का रचा राष्ट्र-मन, जवाहरलाल और सरदार की दृढ़ एकाग्रता ने देश को अफरा-तफरी से बचा भी लिया और निकाल भी लिया। इसलिए सरदार की आड़ में नेहरू इनके निशाने पर थे और हैं।

तब से आज तक हिंदुत्व का यह दर्शन समाज में न वैसी जगह बना सका जिसकी अपेक्षा से ये काम करते रहे और न सत्ता पर इनकी कभी ऐसी पकड़ बन सकी कि ये अपने एजेंडे का भारत बना सकें। अटल बिहारी वाजपेयी के पांच साल के प्रधानमंत्रित्व-काल में यह हो सकता था, लेकिन अटलजी ‘छोटे नेहरू’ का चोला उतारने को तैयार नहीं थे। वह संघी हिंदुत्व की मदद तो लेते थे लेकिन उसके खतरों से बचते भी थे। इसलिए अटल-दौर संघी हिंदुत्व की सत्ता का नहीं, जमीन तैयार करने का दौर बना और उसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला नरेंद्र मोदी के गुजरात में खोली गई।

फिर, दिल्ली नरेंद्र मोदी के हाथ आई। तब से आज तक दिल्ली से हिंदुत्व का वही एजेंडा चलाया जा रहा है, जो 1925 से अधूरा पड़ा था। यह गांधी को खारिज कर, भारत को अ-भारत बनाने का एजेंडा है। अब ये यह भी जान चुके हैं कि लोकतांत्रिक राजनीति में सत्ता का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए ये अपना वह एजेंडा पूरा करने में तेजी से जुट गए हैं जिससे लोकतांत्रिक उलटफेर की संभावनाएं खत्म हों, और सत्ता अपने हाथ में स्थिर रहे।

नोटबंदी से लेकर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) तक का सारा खेल समाज की ताकत को तोड़-मरोड़ देने, संविधान को अप्रभावी बना देने तथा संवैधानिक संस्थानों को सरकार का खोखला खिलौना बनाने के अलावा कुछ और नहीं है। ऐसे में, भारतीय लोकतंत्र का विपक्ष संसद में नहीं, सड़कों पर है। आज युवा और नागरिक ही भारतीय लोकतंत्र के विपक्ष हैं।


सड़कों पर उतरे युवाओं-छात्रों-नागरिकों में सभी जातियों-धर्मों के लोग हैं। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) किसी भी तरह मुसलमानों का सवाल नहीं है। वे निशाने पर सबसे पहले आए हैं, क्योंकि दूसरे असहमतों को निशाने पर लेने की भूमिका बनाई जा रही है। इसलिए लाठी-गोली-अश्रु गैस की मार के बीच भी सड़कों से आवाज यही उठ रही है कि हम पूरे हिंदुस्तान को, और इस हिंदुस्तान के हर नागरिक को सम्मान और अधिकार के साथ भारत का नागरिक मानते हैं। कोई भी सरकार हमारी या उनकी या किसी की नागरिकता का निर्धारण करे, यह हमें मंजूर नहीं है। इसलिए कि सभी सरकारें जिस संविधान की अस्थायी रचना हैं, जनता उस संविधान की रचयिता भी है और स्थायी प्रहरी भी!

सरकारें स्वार्थ, भ्रष्ट और संकीर्ण मानसिकता वाली हो सकती हैं। सांप्रदायिक भी हो सकती हैं और जातिवादी भी! सरकारें मौकापरस्त भी होती हैं और रंग भी बदलती हैं। यह संविधान से बनती तो है लेकिन संविधान का सम्मान नहीं करती है- यह वोट से बनती है लेकिन वोटर का माखौल उड़ाती है। यह झूठ और मक्कारी को हथियार बनाती है और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर अपना मतलब साधना चाहती है। आज यह हमारी नागरिकता से खेलना चाह रही है, कल हमसे खेलेगी। यह चाहती है कि इस देश में नागरिक नहीं, सिर्फ उसके वोटर रहें। सत्ता के खेल में यह समाज को खोखला बना देना चाहती है। इसलिए लड़ाई सड़कों पर है। जब संसद गूंगी और व्यवस्था अंधी हो जाती है तब सड़कें लड़ाई का मैदान बन जाती हैं।

इसे पहचाना है हमारी न्यायपालिका ने। किन्हीं वकील पुनीत कुमार ढांढा की याचिका थी कि अदालत सीएए को संवैधानिक घोषित करे और उसके खिलाफ चल रहे सारे आंदोलन को असंवैधानिक। अदालत ने कहा कि वह पहली बार ही अदालत से ऐसी कोई मांग सुन रही है कि वह संसद द्वारा पारित किसी कानून को संवैधानिक करार दे। सभी जानते हैं कि संसद द्वारा पारित हर कानून संवैधानिक होता है। अदालत का काम यह देखना मात्र है कि जो पारित हुआ है, वह कानून सम्मत है या नहीं। अदालत ने जो कहा, वह सही ही कहा लेकिन अधूरा कहा। अदालत यह कह ही कैसे सकती है कि जब तक शांति नहीं होगी, तब तक वह संविधान की कसौटी पर किसी सरकारी कदम को जांचने का काम स्थगित करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में लगी हिंसा की आग को संविधान के छींटे से बुझाना न्यायपालिका की पहली जिम्मेवारी है।

प्रधानमंत्री और उनकी कृपा पर बने वे सभी मंत्री हिंसा के जनक हैं जो सच छुपाने में और येन केन प्रकारेण अपनी सत्ता की रखवाली में लगे हैं। सत्ता की निरंकुश हिंसा जिस प्रधानमंत्री और जिसके मंत्रिमंडल को न दिखाई देती हो, हिंसा की यह आग उसकी ही लगाई हुई है। देश में छिड़ा नागरिकता आंदोलन सरकारी दुमुंहेपन से पैदा हुआ है और प्रधानमंत्री की निंदनीय मक्कारी से फैला है। जामिया मिल्लिया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, अलीगढ़, वाराणसी के विश्वविद्यालयों में जैसी क्रूर और नंगी हिंसा हुई है, उसके बाद भी क्या किसी को कहने की जरूरत है कि हिंसा के जनक कौन हैं और कहां हैं?


यह राजधर्म में हुई वैसी ही लज्जाजनक और अक्षम्य चूक है जैसी चूक 2002 में, गुजरात में सांप्रदायिक दंगे को भड़काने और उसे निरंकुश चलते रहने देने में की गई थी। बीजेपी का दुर्भाग्य है कि आज उसके पास कोई वाजपेयी नहीं है और उसके पास वह मुख्यमंत्री है जिसने अपने विपक्षी अवतार में सार्वजनिक संपत्ति को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है, महात्मा गांधी के बारे में फूहड़, घटिया बातें कही हैं। आज वह मुख्यमंत्री सार्वजनिक घोषणा करते हैं कि वह नागरिकों से ‘बदला लेंगे’, कि सीसीटीवी में कैद प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें देख-देखकर, उनसे नुकसान की भरपाई करेंगे।

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हम कपड़ों से पहचान रहे हैं कि आंदोलनकारी कौन हैं। और आंदोलनकारी सही कह रहे हैं कि हम हिंसकअसंवैधानिक हरकत करने वालों का चेहरा पहचान रहे हैं। कपड़े बदले जा सकते हैं, कैमरे खाली किए जा सकते हैं लेकिन चेहरे का आप क्या करेंगे?

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