योगी 'राज' में उत्तर प्रदेश, विज्ञापनों में समृद्ध, धरातल पर बदहाल

पिछली सरकारों को कोसने, सत्य-दमन, सामाजिक ध्रुवीकरण का उन्माद पैदा करने और बुल्डोजर (अ)न्याय पर जितना विमर्श आदित्यनाथ सरकार करती है, उसका कुछ प्रतिशत भी सामाजिक विकास पर विमर्श करती तो हालत कुछ और होती।

योगी 'राज' में उत्तर प्रदेश, विज्ञापनों में समृद्ध, धरातल पर बदहाल
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पिछले कुछ महीनों ने देश में शिक्षा, महंगाई और रोजगार की खूब चर्चा की जा रही है, विपक्ष इस मुद्दे पर लगातार हमलावर है, छात्र और युवा आंदोलन कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर बहुत सारे यूजर सत्ता से प्रश्न कर रहे हैं। जैसा कि मोदी सरकार का चाल, चरित्र और चेहरा है– उसके अनुरूप धमकी और दमन से विपक्ष और युवाओं को चुप कराने की कोशिश की गई– पर ना तो विपक्ष रुका और ना ही युवा। इसके साथ ही एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर भी सरकार पर चौतरफा वार हो रहा था। आंदोलनकारी युवाओं के चरित्र हनन का प्रयास भी असफल हो गया।

इसके बाद अंतिम रास्ते के तौर पर देश के आर्थिक विकास को पेश किया जाने लगा। यह मोदी सरकार के घिसे-पिटे प्ले-बुक का हिस्सा है। जब भी सरकार दबाव में आती है, तब देश की अर्थव्यवस्था “संदेहास्पद” आंकड़ों के साथ तेजी से बढ़ने लगती है। कभी विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था, कभी रातों रात 25 करोड़ लोगों का गरीबी से बाहर आ जाना, कभी 5 खरब की अर्थव्यवस्था, कभी स्वदेशी का राग तो कभी जीडीपी में अचानक उछाल। मोदी-सत्ता के इन रंगीन सपनों के बीच देश की बढ़ती गरीबी और अरबपतियों की बढ़ती संपत्ति ही एक अटल सत्य है।

उत्तर प्रदेश केंद्र का आईना है

उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ सरकार अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर जनता को गुमराह करने में बिल्कुल मोदी सरकार का आईना है, बल्कि कुछ कदम आगे ही है। यहां भी सरकारी वक्तव्यों और सरकारी विज्ञापनों में लगातार देश के औसत से अधिक तेजी से प्रति-व्यक्ति आय बढ़ने, जीडीपी में उछाल और किसानों की आय बढ़ने के दावे किए जाते रहे हैं, पर धरातल पर लोग हाशिये पर पहुंचने लगे हैं। वर्ष 2024 के अंत में योगी सरकार ने वर्ष 2025 तक गरीबी हटाने का दावा किया था, बड़ी-बड़ी उपलब्धियां गिनाई गईं पर कुछ नहीं हुआ।

अगले वर्ष चुनाव से पहले फिर ऐसे दावों की बौछार होगी, पर वास्तविक स्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश में औसत प्रति व्यक्ति आय लगभग 2 लाख रुपये प्रतिवर्ष है। राज्यों में 60000 से 65000 रुपये की प्रति व्यक्ति आय के साथ सबसे बुरी स्थिति में बिहार है। इसके बाद के स्थान पर 80000 से 85000 रुपये प्रति व्यक्ति आय के साथ आदित्यनाथ और मोदी के शब्दों में विकास की नदियां बहाता उत्तर प्रदेश है।


बढ़ते निवेश के दावे और औसत से कम क्रय-क्षमता

मुख्यमंत्री लगातार उत्तर प्रदेश में बढ़ते पूंजी निवेश के दावे करते हैं, बड़े बाजार की बात करते हैं, बड़े औद्योगिक माहौल की बातें करते हैं– पर हकीकत यह है कि रोजगार और आमदनी के संदर्भ में उत्तर प्रदेश की आबादी राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है। सामान्य आबादी की आमदनी और क्रय-शक्ति आंकने का सबसे आसान तरीका प्रति व्यक्ति उपभोक्ता वस्तुओं को खरीदने में किए जाने वाले खर्च का आकलन है। जहां आमदनी अधिक होगी, वहां क्रय-शक्ति अधिक होगी और लोग इस पर अधिक खर्च करेंगे।

इन आंकड़ों को केंद्र सरकार का राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, पारिवारिक उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण में प्रकाशित करता है। इस शृंखला की सबसे नई रिपोर्ट वर्ष 2023-24 के लिए प्रकाशित है। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश के ग्रामीण क्षेत्रों में हरेक महीने का प्रति व्यक्ति उपभोक्ता खर्च 4122 रुपये और शहरी आबादी के लिए 6996 रुपये है। यही आंकड़ा उत्तर प्रदेश के लिए क्रमशः 3481 रुपये और 5395 रुपये है– इससे यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता व्यय राष्ट्रीय औसत का 84 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में महज 77 प्रतिशत ही है।

भोजन पर अधिक खर्च

आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरों के साथ लगातार प्रकाशित रंगीन विज्ञापनों में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक खाद्य सुरक्षा को दिखाया जाता है, केन्द्रीय स्तर पर और राज्य स्तर पर सबसे अधिक आबादी को मुफ्त अनाज दिया जाता है। इसके बाद भी भोजन पर उत्तर प्रदेश की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक खर्च करती है, पर गेहूं छोड़कर अन्य सभी अनाजों पर राष्ट्रीय औसत से कम खर्च किया जाता है।

कुल उपभोक्ता व्यय में से खाद्य पदार्थों पर खर्च का राष्ट्रीय औसत ग्रामीण क्षेत्रों में 47.02 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 39.68 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश के लिए यही आंकड़े क्रमशः 47.25 प्रतिशत और 41.37 प्रतिशत है– जाहिर है उत्तर प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में खाने पर खर्च राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है। दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में अनाजों पर खर्च किया जाने वाला राष्ट्रीय औसत 4.97 है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 4.52 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्रों के लिए यही आंकड़े क्रमशः 3.74 प्रतिशत और 3.68 प्रतिशत हैं।

कुल अनाजों के खपत में से चावल के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत 54.16 प्रतिशत है, जबकि शहरी क्षेत्रों का राष्ट्रीय औसत 52.27 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश के लिए यही आंकड़े क्रमशः 37.61 प्रतिशत और 31.58 प्रतिशत हैं। गेहूं की खपत उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय औसत से अधिक है और मोटे अनाजों की खपत लगभग नगण्य है।

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बिजली, ईंधन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च

उत्तर प्रदेश में बिजली, ईंधन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक महंगी हैं क्योंकि इन पर उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय औसत से अधिक खर्च किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-खाद्य सामग्री पर कुल खर्च में से ईंधन और बिजली पर व्यय का राष्ट्रीय औसत 11.54 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 11.79 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्रों में यह अंतर बड़ा हो जाता है, यहां के लिए यही आंकड़े क्रमशः 9.27 प्रतिशत और 11.49 प्रतिशत हैं।

शिक्षा पर देश के ग्रामीण क्षेत्रों पर औसत व्यय 6.11 प्रतिशत है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 7.19 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्रों के लिए यही आंकड़े क्रमशः 9.9 प्रतिशत और 10.40 प्रतिशत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य की ओर किया जाने वाले खर्च का राष्ट्रीय औसत 12.90 प्रतिशत है, पर उत्तर प्रदेश में यह 13.75 प्रतिशत है। शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर खर्च का राष्ट्रीय औसत 9.70 प्रतिशत है, पर उत्तर प्रदेश में यह 10.60 प्रतिशत है।

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समाज का हरेक वर्ग राष्ट्रीय औसत से नीचे है

उत्तर प्रदेश में समाज का हरेक वर्ग व्यय के संदर्भ में राष्ट्रीय औसत से नीचे है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और सामान्य वर्ग– हरेक के व्यय का औसत राष्ट्रीय स्तर से बहुत नीचे है। यह हाल शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में है। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और रोजगार से जुड़े हरेक सामाजिक वर्ग की स्थिति राष्ट्रीय औसत की तुलना में बहुत खराब है। शहरी क्षेत्रों में भी श्रमिकों का हरेक वर्ग बदहाल है।

बदहाल आबादी वाले उत्तर प्रदेश में सत्ता जितना रंगीन विज्ञापनों पर खर्च करती है, यदि उतना ही सामाजिक विकास पर व्यय कर दे तो प्रदेश का भला हो जाएगा। पिछली सरकारों को कोसने, सत्य-दमन, सामाजिक ध्रुवीकरण का उन्माद पैदा करने और बुल्डोजर (अ)न्याय पर जितना विमर्श आदित्यनाथ सरकार करती है, उसका कुछ प्रतिशत भी सामाजिक विकास पर विमर्श करती तो हालत कुछ और होती।

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