मृत शिशु पैदा होते रहेंगे, देश कुपोषण से जूझता रहेगा और प्रधानमंत्री रंगीन सपने दिखाते रहेंगे

मोदी सरकार में महिलाओं में एनीमिया के कारण स्टिलबर्थ, यानि मृतक शिशुओं के जन्म के मामले गंभीर रूप से बढ़ें हैं। एनीमिया और मृतक शिशु के जन्म, दोनों मामलों में भारत विश्वगुरु हो चुका है।

मृत शिशु पैदा होते रहेंगे, देश कुपोषण से जूझता रहेगा और प्रधानमंत्री रंगीन सपने दिखाते रहेंगे
i

हमारे देश में पक्ष और विपक्ष में स्वास्थ्य, विशेष तौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य पर गहरा सन्नाटा रहता है। शायद ही कभी इस संबंध में कोई आवाज उठती है, और मीडिया तो सरकारी प्रचार में इस कदर व्यस्त है कि उसके पास भ्रामक और ध्रुवीकरण की खबरों से ज्यादा कुछ रहता ही नहीं है। प्रधानमंत्री का पूरा ध्यान राहुल गांधी पर प्रलाप पर रहता है और स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा अपने मंत्रालय को छोड़कर शेष सभी विषयों पर कमेन्ट करते रहते हैं। जाहिर है, स्वास्थ्य के सभी मामलों में हम दुनिया के निकृष्ठ देशों में एक हैं।

प्रतिष्ठित मेडिकल साइंस जर्नल “लैनसेट” के दक्षिण-पूर्व एशिया कार्यालय ने भारत में एनीमिया, यानि खून की कमी और स्टिलबर्थ, यानि मृतक शिशुओं के जन्म, पर एक रिपोर्ट प्रकाशित कर इन दोनों में संबंध स्थापित किया है। इस अध्ययन के अनुसार, हमारे देश में गर्भावस्था में एनीमिया पीड़ित महिलाओं द्वारा गर्भधारण के 28वें सप्ताह के बाद मृतक बच्चे के जन्म की संभावनाएं 27 प्रतिशत तक बढ़ जाती हैं। गंभीर एनीमिया पीड़ित गर्भवती महिलाओं में यह संभावना गर्भधारण के 29वें सप्ताह या इसके बाद प्रबल हो जाती है, जबकि अन्य महिलाओं में यह संभावना 31वें सप्ताह में अधिक रहती है।

एनीमिया-मृतक शिशु के जन्म के मामले में भारत विश्वगुरु

यह अध्ययन इसलिए विशेष है क्योंकि एनीमिया और मृतक शिशु के जन्म, दोनों मामलों में भारत विश्वगुरु है– यानि दुनिया का अग्रणी देश है। गर्भावस्था में एनीमिया एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, जिसका हल निकाला जा सकता है। पर, देश की सत्ता हरेक समस्या को नजरअंदाज करती है और समस्या को उजागर करने वालों को देशद्रोही और आतंकवादी करार देती है। एनीमिया का मुख्य कारण पोषण में कमी के कारण रक्त में लाल रक्त कोशिका और हीमोग्लोबिन की कमी है।

इस अध्ययन के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च में मृतक शिशुओं के जन्म से संबंधित 214709 महिलाओं के आंकड़ों का गंभीर विश्लेषण किया गया। इसमें से 52 प्रतिशत महिलायें, यानि 108982 महिलायें विभिन्न स्तर के एनीमिया से पीड़ित थीं और हीमोग्लोबिन की रक्त में सांद्रता 10 ग्राम प्रति डेसिलिटर से कम थी। इन महिलाओं ने जितने भी शिशुओं को जन्म दिया उनमें से 1.7 प्रतिशत यानि 3595 मृतक शिशु थे। गर्भावस्था में हल्के एनीमिया से पीड़ित महिलाओं में मृतक शिशु को जन्म देने की संभावनाएं सामान्य महिलाओं की अपेक्षा 1.2 गुणा अधिक रहती हैं, जबकि गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं में यह संभावना तीन-गुणा अधिक रहती है।


सरकार विज्ञापनों से जनता को भ्रमित कर रही

जनवरी 2026 में बीएमसी प्रेगनेंसी एंड चाइल्डबर्थ नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, हमारे देश में मृतक शिशुओं के जन्म की दर कोविड से पहले के समय की तुलना में कोविड के बाद 44 प्रतिशत तक बढ़ गई। जाहिर है, स्वास्थ्य सेवाओं ने इस दिशा में ध्यान देना बंद कर दिया है और सरकार विज्ञापनों की चकाचौंध से जनता को भ्रमित कर रही है। मृतक शिशुओं के जन्म की दर प्रति हजार जन्म में इनकी संख्या से निकाली जाती है। कोविड से पहले यह दर 12.7 थी, कोविड के दौर में यह 14.4 थी जबकि कोविड के बाद अनुमान था यह दर कम होगी, पर यह दर बढ़कर 18.3 तक पहुँच गई।

इस अध्ययन को पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों ने किया है। इनके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 20 का आंकड़ा भी पार कर जाती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 14 है। मृतक शिशुओं के जन्म में 44.7 प्रतिशत सरकारी अस्पतालों का है, 39.2 प्रतिशत निजी अस्पतालों का और 16.1 प्रतिशत का जन्म घरों में ही होता है। इसमें से 50 प्रतिशत से अधिक का जन्म गर्भावस्था के 9 महीने या इसके बाद होता है। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार ऐसे हर जन्म को पंजीकृत करना जरूरी है, पर इनमें से 1 प्रतिशत से भी कम पंजीकृत किए जाते हैं और शेष का कोई रिकार्ड नहीं रहता।

इसे भी पढ़ेंः गायब हो गए लैंगिक अनुपात और एनेमिया के आंकड़े: नाकामियों पर पर्दा डालने में जुटी मोदी सरकार

देश का भविष्य कुपोषित और अंधकारमय !

लैनसेट में मई 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मृतक शिशुओं के जन्म में वर्ष 2005-06 से 2015-16 के बीच 36.3 की कमी आई पर इसके बाद इसमें महज 5.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इस अध्ययन के अनुसार हमारे देश में मृतक शिशु के आंकड़े सरकारों द्वारा बताए गए आंकड़ों से बहुत अधिक रहते हैं। सरकारी आंकड़ों में मृतक शिशुओं की संख्या वही दर्ज की जाती है जिनका जन्म गर्भवती महिलाओं द्वारा गर्भधारण के 28वें सप्ताह या इसके बाद होता है। दूसरी तरफ पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि इनमें से 44 प्रतिशत से अधिक का जन्म गर्भधारण के 20 से 28 सप्ताह के बीच ही हो जाता है– पर सरकार इसे गणना में शामिल नहीं करती।

तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 5 खरब डॉलर के ख्वाब में मोदी सरकार ने देश को दुनिया के सबसे कुपोषित देश में तब्दील कर दिया है। कुपोषण का सबसे आसान संकेतक, ए*/नेमिया यानि खून की कमी, है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के 5 वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में से 67.1 प्रतिशत और किशोर बालिकाओं में से 59.1 प्रतिशत बालिकाएं खून की कमी की चपेट में हैं। देश में लगभग तीन-चौथाई आबादी को आइरन का पूरा पोषण नहीं मिलता है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार भविष्य और वर्ष 2047 की बातें करते हैं– पर आंकड़ों में तो देश का भविष्य कुपोषित और अंधकारमय ही नजर आता है।

इसे भी पढ़ेंः मोदी सरकार में गहराता जा रहा है मातृत्व काल में मृत्यु का संकट


सरकार के पास केवल भाषण और वादे

ये सभी आंकड़े प्रेस इनफार्मेशन ब्युरो द्वारा 18 अप्रैल 2025 की विज्ञप्ति में प्रकाशित हैं। एनेमिया का मुख्य कारण पोषण में आइरन की कमी है जिससे रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। इसके दूसरे कारण फोलेट, विटामिन ए और विटामिन बी12 की कमी भी है। यह सब कुपोषण, कम उम्र में गर्भवती होने, गर्भवती महिलाओं की पूरी देखभाल ना होना और आइरन-समृद्ध खाद्य पदार्थों के उपलब्ध नहीं होने के कारण होता है।

यह स्थिति खतरनाक है क्योंकि इससे पूरा भविष्य प्रभावित होता है– बच्चों में एनेमिया के कारण मृत शिशु का जन्म, उचित बौद्धिक विकास नहीं होता और गर्भवती महिलाओं में एनेमिया गर्भ में पल रहे शिशु को असामान्य कर देता है। अनेमिया की देश में चिंताजनक और आपातस्थिति के बाद भी सरकार के पास इससे निपटने की कोई गंभीर योजना नहीं है। मोदी राज में हरेक समस्या व्यापक होती जाती है क्योंकि सरकार के पास केवल भाषण, वादे और मोदी जी की तस्वीर वाले पोस्टर हैं। मोदी सरकार जनता से जुड़ी हरेक समस्या को बाइपास करती है और इसके बदले अर्थव्यवस्था की रंगीन तस्वीर में जनता को उलझाकर रखती है।

इसे भी पढ़ेंः सुरक्षित प्रसूति में फिसड्डी मोदी सरकार, सिर्फ आंकड़ों के हेरफेर के जरिये इमेज चमकाने में व्यस्त

मृत शिशु पैदा होते रहेंगे, देश कुपोषण से जूझता रहेगा

पीआईबी की यह विज्ञप्ति कुछ आंकड़े ऐसे भी हैं जो इस समस्या के निवारण में मोदी सरकार की शर्मनाक असफलता की दास्तान बयान करते हैं। वर्ष 2019 में महज 30 प्रतिशत सामान्य महिलायें और 37 प्रतिशत गर्भवती महिलायें एनेमिया की चपेट में थीं। इसके बाद वर्ष 2019 से 2021 तक राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 कराया गया। इस सर्वेक्षण के अनुसार 15 से 48 वर्ष की 57 प्रतिशत और इसी आयुवर्ग में 52.2 प्रतिशत महिलायें एनेमिया की शिकार पाई गईं। इस तरह 2019 के बाद के दो वर्षों के भीतर ही एनेमिया की शिकार में सामान्य महिलाओं की संख्या में लगभग दुगुनी और गर्भवती महिला के संदर्भ में डेढ़-गुनी से अधिक वृद्धि हो गई।

यदि आप प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्यों को देखें तो स्पष्ट है कि जिस तेजी से देश की महिलायें एनेमिया की चपेट में आती जा रही हैं उससे अधिक तेजी से प्रधानमंत्री का महिला-सशक्तीकरण, नारी शक्ति और नारी वंदना का नारा बुलंद होता जा रहा है। पीआईबी के बुलेटिन में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर 15 से 49 वर्ष के आयुवर्ग के लगभग 50 करोड़ और पांच वर्ष से कम आयु के 27 करोड़ बच्चे एनेमिया-पीड़ित हैं– इन आंकड़ों के अनुसार तो यही समझ में आता है कि दुनिया में केवल भारत ऐसा देश है जहां की महिलायें और बच्चे एनेमिया के शिकार हैं। ऐसे में विकास, बड़ी अर्थव्यवस्था, विश्वगुरु और महिला सशक्तीकरण – सारे नारे महज चुटकुले नजर आते हैं। देश में मीडिया से तो कोई उम्मीद अब नहीं ही है।

मृत शिशु पैदा होते रहेंगे, पूरा देश कुपोषण से जूझता रहेगा और प्रधानमंत्री विकसित भारत के रंगीन सपने दिखाते राहेंगे– यही आज का भारत है।

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए