गांधी को भूलने से बदहाल हुए गांव-किसान, करोड़ों हो गए बेकार

गांधी ने हमेशा कहा कि भारत शहरों में नहीं बल्कि गांवों में बसता है। यदि गांवों का नाश होता है, तो भारत का नाश हो जाएगा। गांधी जी का साफ मानना था कि शहरवासियों ने ग्रामवासियों का शोषण किया है। सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर ही जीते हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

पूरी दुनिया गांधी मार्ग के जरिए रास्ता तलाश रही है। लेकिन, अपने ही देश में लोकतंत्र पर जिस तरह से खतरे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें महात्मा गांधी के संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। हमने अपने साप्ताहिक समाचार पत्र संडे नवजीवन केे दो अंक गांधी जी पर केंद्रित करने का निर्णय लिया। इसी तरह नवजीवन वेबसाइट भी अगले दो सप्ताह तक गांधी जी के विचारों, उनके काम और गांधी जी के मूल्यों से संबंधित लेखों को प्रस्तुत करेगी। इसी कड़ी में पेश है स्वराज्य और गांव पर गांधी जी के विचारों पर आधारित वरिष्ठ पत्रकार राजेश रपरिया का लेख।

इस 2 अक्टूबर को भी इस बात की होड़ होगी कि गांधी जी को सबसे ज्यादा श्रद्धेय कौन मानता है। पर शायद ही कोई नेता आज गांधी जी के स्वदेशी, ग्रामोद्योग, ग्राम स्वराज्य, सत्याग्रह आदि विचारों को याद करे जिनके बल पर उन्होंने अंग्रेजों को आजादी देने के लिए मजबूर कर दिया था। वैसे, यह भारत की आत्मा में महात्मा का कद ही है कि जो लोग गांधी जी के नाम से चिढ़ते हैं, वे भी गांधी जी की 150वीं जयंती बनाने के लिए विवश हैं। गांधी नाम की माला जपना अपनी जगह, हकीकत यह है कि गांधी के विचारों से दूर जाने की वजह से आज गांवों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही है, खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गया है, इसलिए उनकी संख्या में जबरदस्त गिरावट आई है और युवा पीढ़ी आज खेती नहीं करना चाहती है।

पर इस गिरावट को अर्थशास्त्र के बाजारवादी पुजारी देश की प्रगति का लक्षण मानते हैं। लेकिन खेती-किसानी और इन पर आधारित मजदूरी छोड़कर प्रवासी मजदूर बने लोग शहरों में नारकीय जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं। यह बात दूसरी है कि इनके श्रम बल पर शहर चमक रहे हैं। गांधी ने बार-बार कहा कि हिंदुस्तान शहरों में नहीं बल्कि गांवों में बसता है। यदि गांवों का नाश होता है, तो भारत का नाश हो जाएगा। इस हालत में भारत, भारत नहीं रहेगा। वह कहते थे कि शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में बसता है और गांवों का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरा करने के लिए हुआ है। पर गांधी जी का इस शहरी सोच से छत्तीस का आंकड़ा था।

गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि शहरवासियों ने ग्रामवासियों का शोषण किया है। सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं। गांधी जी देश में फैली गरीबी के लिए बड़े उद्योगों को जिम्मेवार मानते थे। गांधी जी ने 27 फरवरी, 1937 की ‘हरिजन’ पत्रिका में लिखा कि भारत की गरीबी तब शुरु हुई, जब हमारे शहर विदेशी माल के बाजार बन गए और विदेशों का सस्ताऔर भद्दा माल गांवों में भर कर उन्हें चूसने लगे। आजादी के सात दशकों बाद देखें, तो गांवों और किसानों की आर्थिक स्थिति और दयनीय हो गई है। खेती से जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने लायक आमदनी भी किसानों को नहीं हो रही है और अधिकांश किसान कर्ज के बोझ से दब गए हैं। कड़वा सच यह है कि किसान अपने बच्चों को खेती में नहीं रखना चाहता। कृषि की पढ़ाई करने वाले युवा भी गांव में जाकर खेती नहीं करना चाहते हैं।

2015 में जारी एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में किसानों की संख्या 86 लाख कम हो गई है। गांवों में रोजगार की क्या दशा है, इसका अंदाज नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की इस रिपोर्ट से हो जाता है कि 2005 से 2011-12 के बीच तीन करोड़ 40 लाख लोगों ने कृषि श्रम बाजार को छोड़ दिया। सामान्य धारणा है कि इन कृषि श्रमिकों ने शहरों की राह पकड़ी जहां वे निर्माण उद्योग में दिहाड़ी मजदूरी करने लगे। पिछले तीन-चार सालों से निर्माण उद्योग, विशेषकर रियल्टी सेक्टर चौपट है। इससे इन श्रमिकों को अपने गांव लौट जाना पड़ा। वहां रोजगार हैं नहीं। इसलिए इन सबका ग्रामीण आमदनी पर बुरा असर पड़ा है।


आज देश में फैली मंदी का सबसे बड़ा कारण ग्रामीण आमदनी है। तमाम खबरें बताती हैं कि इन दिनों तो गांवों में 5 रुपये का बिस्किट खरीदने से पहले भी अधिकांश ग्रामीण दोबारा सोचते हैं। आज जिन कारणों से गांव वालों का आर्थिक शोषण हो रहा है, उन्हें गांधी जी ने 80-100 साल पहले ही भांप लिया था। उन्होंने कहा कि हम दिन-प्रतिदिन गरीब होते जा रहे हैं। इसका कारण है कि हमने अपने सात लाख गांवों की उपेक्षा की है। जैसे-जैसे गांधी जी के नेतृत्व में स्वराज्य आंदोलन तेज होता गया, वैसे-वैसे उनका यह विश्वास प्रगाढ़ होता गया कि गांवों-किसानों के पुनरुद्धार और उत्थान के बिना आजादी का कोई मतलब नहीं है। उनका यह विश्वास दृढ़ होता गया कि बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्मेवार है।

उन्होंने 29 अगस्त, 1936 के हरिजन में लिखा कि एक क्षण के लिए मान भी लिया जाए कि यंत्र मानव समाज की सारी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं तो भी उसका परिणाम होगा कि उत्पादन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित हो जाएगा। बड़े पैमाने पर उद्योगीकरण का अनिवार्य परिणाम यह होगा कि ज्यों-ज्यों प्रतिस्पर्धा और बाजार की समस्याएं खड़ी होंगी, त्यों-त्यों गांवों का प्रकट या अप्रकट शोषण होगा।

गांधी जी का प्रबल विश्वास था कि विकेंद्रीकरण ही शोषण के खिलाफ श्रेष्ठ उपाय है। इसलिए उन्होंने न केवल राजनीतिक, बल्कि आर्थिक विकेंद्रीकरण को भी उतना ही आवश्यक बताया। ग्राम स्वराज्य, पंचायत राज्य, ग्रामोद्योग, खादी, आदि पर गांधी जी के विचार विकेंद्रीकरण का ही विस्तार है। गांधी जी ने बार-बार चेताया था कि बड़े पैमाने पर उत्पादन देश को तबाह कर देगा। गांधी कुटीर और लघु उद्योगों के हिमायती थे। आज भी हर राज्य में कुटीर, लघु और मध्यम उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए सरकारी विभाग बने हुए हैं। लेकिन देश में कितने कुटीर उद्योग हैं, इसकी मुक्कमल जानकारी किसी सरकारी या गैरसरकारी संस्थान के पास नहीं है। हर सरकारी संस्थान के पास कुटीर, लघु उद्योगों की लिस्ट तो है लेकिन संगठित स्तर पर बड़े उद्योगों ने कुटीर उद्योगों को खत्म कर दिया है।

कुटीर और लघु उद्योगों की लिस्ट में साबुन, तेल, बिस्किट, मोमबत्ती, अगरबत्ती आदि बनाना है। पर खुद ही याद करने की कोशिश करें, कुटीर-लघु उद्योग में बना यह सामान आपने आखिरी बार कब खरीदा था। नमकीन बनाने का काम भी कुटीर-लघु उद्योग की लिस्ट में है। लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों के इस क्षेत्र में उतर आने के बाद कुटीर उद्योग के लिए इसका भी स्कोप खत्म हो गया है। आज बड़े शहर हों या कोई कस्बा, कोने-कोने में किसी-न-किसी बड़ी कंपनी के पैकेट दुकानों पर टंगे मिल जाएंगे। इसी तरह आप रसोई में उपयोग वाले मसालों को ले सकते हैं, झाड़ू बनाने को ले सकते हैं, दरी उद्योग, कालीन उद्योग, बर्तन उद्योग को ले सकते हैं। ये सब लघु-कुटीर उद्योग लगभग नष्ट ही हो गए और इनमें लगे लोग दिहाड़ी मजदूर हो गए।


हां, नाम के लिए लघु उद्योगों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ है क्योंकि अब 5 करोड़ रुपये पूंजी लागत वाली इकाइयां इसके तहत आती हैं। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद इन उद्योगों के दुर्दिन भी आ गए। इसका सबसे बड़ा असर रियल्टी सेक्टर, साइकिल, होजरी, ब्रास, ताला, आभूषण आदि उद्योगों पर पड़ा है। इन सेक्टरों की ज्यादातर इकाइयां असंगठित क्षेत्र की हैं। नोटबंदी के बाद पीएचडी चैंबर ऑफ काॅमर्स, ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन और अन्य संगठनों के किए सर्वेक्षण बताते हैं कि लघु असंगठित क्षेत्र पर 50 से 80 फीसदी तक नोटबंदी का असर पड़ा है, वे इनसे अब तक नहीं उबर पाए हैं और लाखों की संख्या में मजदूर बेकार हो गए हैं।

यह सब भी वजह है कि देश का विकास दर पिछले 18 महीनों से लगातार गिर रहा है। सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी के अनुसार, जनवरी-अप्रैल, 2017 के दौरान डेढ़ करोड़ लोगों का रोजगार खत्म हो गया। दुर्भाग्य यह है कि तब से यह सिलसिला रुका नहीं है। ऑटो सेक्टर में बड़ी कंपनियों में उत्पादन बंद या काफी कम होने से इनसे जुड़ी सैकड़ों लघु इकाइयां भी बंद हो चुकी हैं। ध्यान रहे, वाहनों की बिक्री पिछले 20 साल के न्यूनतम पर है। सबको मालूम है कि देश का 92 फीसदी श्रम बल असंगठित क्षेत्र में लगा हुआ है। तब भी लघु क्षेत्र को अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो रहा है। बड़े स्तर पर विदेशी पूंजी प्रवाह को बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने काॅरपोरेट टैक्स को 10 फीसदी घटाकर तकरीबन 25 फीसदी कर दिया है, यानी असंगठित क्षेत्र की लघु इकाइयों की दशा जल्द ही वैसी ही हो जाएगी जैसी आज कुटीर उद्योग की है।

देश के संगठित नमकीन उद्योग के उदाहरण से बड़ी पूंजी के प्रभावों को अच्छे से समझा जा सकता है। गांधी जी तब भी गलत नहीं थे, और आज भी नहीं हैं कि आर्थिक असमानता, लूट और शोषण का सबसे बड़ा कारण बड़े पैमाने पर माल का उत्पादन है। देश की ताजा आर्थिक तस्वीर तो इसकी ही तस्दीक करती है। अगर हमें स्वराज्य की रचना अहिंसा के पाये पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्थान देना होगा।

गांधी जी ने 1937 में लिखा कि उनके दिमाग में कोई भ्रम नहीं है कि हमारे देश में करोड़ों बेरोजगार हैं। उन्हें काम देने की जरूरत है। इसके लिए खादी और कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इस बात को नकारना असंभव है कि उन्होंने खादी और चरखे से पूरे देश को आंदोलित कर दिया और लोगों ने पूरे देश में विदेशी सामानों और महंगे विदेशी वस्त्रों की होली जलायी। निःसंदेह गांधी जी ने चरखे को आजादी का प्रतीक बना दिया था। उनके ग्राम स्वराज्य की कल्पना है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर निर्भर नहीं होगा। उन्होंने गांवों की पुनर्रचना में उद्योग हुनर, तंदरुस्ती और शिक्षा के समन्वय को आवश्यक बताया।

(पूर्व कार्यकारी संपादक, अमर उजाला)

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