विष्णु नागर का व्यंग्य: सबसे बड़ा सवाल- शर्म आती कैसे है, क्या शर्म आना अनिवार्य है?

सवाल यह भी है कि शर्म आना क्या अनिवार्य है? क्या नाथूराम गोडसे को यह आई थी? नहीं आई थी, इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। पढ़ें विष्णु नागर का व्यंग्य...

प्रतीकात्मक तस्वीर
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विष्णु नागर

आप-हम कह तो देते हैं कि उन्हें शर्म नहीं आती मगर हम शर्म-शर्म कहनेवालों ने शर्म पर गहन क्या उथला चिंतन तक किया है कभी? इधर मैंने इस तरह का कुछ करने की कोशिश की है। सवाल यह है कि शर्म कैसे और कहां से आती है? अभी तक किसी ने इसके स्रोत की खोज नहीं की है! यह आकाश से आती है या धरती से? हवा से आती है या पानी से? हो सकता है, यह अंतरिक्ष से आती हो? यह भी हो सकता है, यह राफेल के देश से आती हो! वैसे हथियार आदि खरीदने के मामले में हम किसी एक देश के मोहताज नहीं हैं, इसलिए वह ठीक- ठीक कहां से आती है या नहीं आती है, यह शोध का विषय है। इतना निश्चित है कि वह पाकिस्तान से नहीं आती है। हमारा सुरक्षा तंत्र इतना मजबूत तो है ही कि बीच में इसे धर ले। चीन के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। उनके तो सैनिक भी यहां आकर जम के बैठ जाते हैं! चुनौती देते हैं कि आओ, हमें हटाकर दिखाओ! हम चूंकि राष्ट्रवादी हैं, इसलिए ऐसी बातों पर कान नहीं देते!

जहां तक शर्म कैसे आती है का प्रश्न है, किसी को नहीं मालूम कि वह उड़ के आती है या चल कर या तैर कर? कार से आती है या रेलगाड़ी से? अगर वह उड़ के आती है तो क्या वह पक्षी है, उसके पंख हैं? उड़ कर कुछ पक्षी तो बेहद ठंडे देशों से बहुत लंबी दूरी तय करके हमारे यहां आते हैं मगर शर्म कहां से आती है, यह अनिश्चित है। प्रश्न यह भी है कि पिछले नौ वर्षों से इसकी सप्लाई की शार्टेज क्यों चल रही है? यह टमाटर के टमाटर होने से पहले ही टमाटर क्यों और कैसे हो गई?


यह भी हो सकता है कि इसके पंख न हों, यह हवाई जहाज से उड़ कर आती हो! तब तो इसका कोई आयातक भी होगा और खुदरा व्यापारी भी। क्या इस पर जीएसटी लगता है? इन प्रश्नों का जब तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह पूछना बेमानी है कि इन्हें शर्म क्यों नहीं आती‌ और उन्हें क्यों आ जाती थी?

 सवाल यह भी है कि शर्म आना क्या अनिवार्य है? क्या नाथूराम गोडसे को यह आई थी? नहीं आई थी, इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। गुजरात से पहले 1984 में भी एक हत्याकांड हुआ था। उसके  कर्ता को शर्म आई थी मगर देर से आई थी। फिर 1991 आया और 2002 भी। बाबरी मस्जिद के गिराने की बारी आई और गुजरात  हत्याकांड की भी। इसमें  करीब 1100 लोग मार दिए गए पर मुख्यमंत्री समेत किसी को शर्म नहीं आई। अदालत तक किसी को दिला नहीं पाई। सब हो गया मगर दोषी कोई नहीं पाया गया। जिन्हें शर्म नहीं आई, वे राजनीतिक फायदे में रहे। जिन्हें आई, वे जेलों में रह रहे हैं और एकाध अभी बचा हुआ है तो वह भी जाएगा। इन चंद उदाहरणों से सिद्ध होता है कि शर्म का आना जरूरी नहीं है और अच्छी बात भी नहीं है बल्कि नुकसानदेह है।

अब बताइए गोडसे को शर्म आ जाती और वह गांधी जी को गोली नहीं मारता तो गोडसे को आज कौन पूछता? गांधी वध पर मिठाई बांटनेवाले किस बात पर मिठाई बांटते? हिंदू राष्ट्र बनाने का मार्ग क्या तब अधिक कठिन नहीं हुआ होता? क्या बाबरी मस्जिद गिरानेवाले अपनी पार्टी को इतना मजबूत बना पाते? और 2002 जिन्होंने किया-करवाया अगर वे ऐसा न करते तो आज जहां पहुंचे हैं, वहां पहुंचते? इस जगह पहुंचना जरूरी था या शर्म करना? 


शर्म न आना कोई देसी विशेषता नहीं है, यह ग्लोबल संस्कृति का अंग है। नीरो को यह नहीं आई थी, इसलिए उसका नाम आज तक जिंदा है। हिटलर और मुसोलिनी को नहीं आई थी। जलियांवाला बाग कांड के रचयिता जनरल डायर को नहीं आई थी। हरेक महानता के रास्ते पर चलकर नाम नहीं कमा सकता। जब गैसचैंबरों और हत्याकांडों के जरिए यह सुविधा है, तो कोई इतना कष्ट क्यों उठाए?न ले कोई आदर से नाम? जिन्होंने जीते जी इसकी परवाह नहीं की,वे मरने के बाद क्यों करें? नाम इतिहास में दर्ज कराना था, वह हो गया?

मेरा ख्याल है इससे काफी कुछ दिशा आपको मिल गई होगी। अब आप शर्म करो, शर्म करो, कहना बंद करेंगे। लकीर पीटना बंद करेंगे। शर्म के प्रश्न पर एकांगी दृष्टि से विचार नहीं करेंगे। जय श्री राम करेंगे।

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