विष्णु नागर का व्यंग्य: मूर्खता के दिन फिरे, पूरे देश में फहर रहा इसका पताका!

अस्तित्व में आने के बाद मूर्खता ने ऐसी खुशी पहली बार अनुभव की थी। उसे अपने-आप से प्यार होने लगा था। उसे यह देख कर खुशी होती थी कि हर वेश में आज वह ठसक के साथ तनी खड़ी है। पढ़े विष्णु नागर का व्यंग्य।

प्रतीकात्मक तस्वीर
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विष्णु नागर

कहा जाता है कि  घूरे के दिन भी एक न एक दिन फिरते हैं तो फिर मूर्खता जैसी मानव की 'अमूल्य निधि' के दिन क्यों नहीं फिरते? फिरे। जिन पर उसका विश्वास था, उन्होंने उसका भरपूर साथ दिया। सगे भी जितना साथ नहीं देते,  उतना साथ दिया। कभी उसके प्रति अपनी चाहत में कमी नहीं आने दी। अच्छे-अच्छे प्रेमी-प्रेमिका भी एक- दूसरे से कुछ समय बाद ऊबने लगते हैं मगर मूर्खता के दीवानों ने अनोखा उदाहरण पेश किया। मूर्खता से उनका प्रेम हर क्षण बढ़ता गया!' सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' पाकर उसका विकास उत्तरोत्तर होता गया। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक मूर्खता का समुद्र लहराने लगा। ज्वार पर ज्वार आने लगे। आंधी पर आंधी आने लगी, दिन -रात बरसात होने लगी। लू चलने लगी।

अस्तित्व में आने के बाद मूर्खता ने ऐसी खुशी पहली बार अनुभव की थी। उसे अपने-आप से प्यार होने लगा था। उसे यह देख कर खुशी होती थी कि हर वेश में आज वह ठसक के साथ तनी खड़ी है। हर पद उसके लिए आरक्षित है। हर डाल उसकी है। और अंजामे गुलिस्तां क्या होगा, कह कर उसकी हंसी उड़ाने वाले मुश्किल में हैं। बहुत से जेल की हवा खा रहे हैं। कोई ऐसी हरकत करता है तो हर अखबार, हर टीवी चैनल उसे मूर्ख और अपराधी साबित कर देता है। इसके बावजूद पता नहीं कहां से कोई आ टपकता है और मूर्खता की खिल्ली उड़ा कर ,उसका अपमान करके, उसे ठेंगा दिखा कर चला जाता है! उसकी खुशी में ग्रहण लगा जाता है। खुशियों के बीच हताश के कुछ क्षण दे जाता है।


उसके प्रेमी, उसके पुजारी, उसके प्रशंसक रोज विश्वास दिलाते हैं कि मूर्खता, तू निश्चिंत रहा कर, इस दौर में तेरा कोई कुछ बिगड़ नहीं सकता! घबरा मत। ये कुछ नहीं कर पाएंगे। एक दिन देखना ये भी जेल में होंगे और जहां तक हंसी उड़ने का सवाल है, तो सबकी उड़ी है। भगवान राम की उड़ी है। मुखिया जी की हर दिन 'तीन किलो' उड़ती  है। सबकी हंसी उड़ती रही है, आगे भी उड़ती रहेगी। फिर भी वह कुछ-कुछ डरी-डरी सी रहने लगी थी। उसने इतने बुरे दिन देखे थे कि कहीं एक तिनका भी  उसकी तरफ आता था तो वह डर जाती थी। उसका भय लौट आता था। उसकी खुशी काफूर हो जाती थी।

उसे इस बात का सख़्त अफसोस था कि चालाकी, नफ़रत, झूठ, पाखंड, धूर्तता आदि इतने रूप धरने के बावजूद उसके साथ ऐसी 'बदतमीजी' हो रही है! पिछले दस वर्षों में भारत का बहुत 'विकास' हुआ है मगर उसके ' विकास ' में रोड़े अटकाने वाले आज भी जिंदा हैं, उनके हौसले अभी पस्त नहीं हुए हैं। सरकार और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी उसका भरपूर से भी भरपूर सहयोग कर रही है। उसकी हर जरूरत का खयाल रख रही है। उसके लिए हर स्थान खाली करवा रही है। यूनिवर्सिटी में उसे घुसा रही है। युद्धस्तर पर उसकी हर प्रकार से सहायता कर रही है। उसके लिए हर जगह रेड कारपेट बिछा रही है। उसे जेड सेक्यूरिटी दे रही है! फिर भी स्थितियां उतनी अनुकूल नहीं हैं, जितनी कि होनी चाहिए थी।

मूर्खता को अधिकतर इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, लेखकों-कलाकारों से बेहद चिढ़ और नफरत है। उसका मानना है कि ये ही उसकी परेशानी की असली जड़ हैं। उसके   दुश्मन हैं। उसका मन करता है कि इनमें से एक-एक का खून पी जाए, गला घोट दे, चिथड़े उड़ा दे! वह चाहती है कि सरकार 2002 टाइप कुछ करके इन्हें एक बार ठीक से ठीक कर दे वरना मूर्खता-विरोधी इन तत्वों के हौसले बुलंद रहेंगे। उसका जीना, सांस लेना ये मुश्किल करते रहेंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा कि ये दिन सपने की तरह हवा हो जाएंगे। मूर्खता का यह स्वर्ण युग चला जाएगा, पाषाण युग लौट आएगा!

मूर्खता भुक्तभोगी है। 1947 में उसने नफ़रत का साथ देकर अपनी जान लड़ा दी थी, विजय पताका फहरा दी थी मगर महात्मा गांधी-नेहरू आदि आड़े आ गए और उसका जीना मुहाल कर दिया। ‌किसी तरह उसने अपनी जान बचाई, तब जाकर 2002 का 'अमृतकाल' वह देख पाई! उसे भरोसा हो गया था कि अब देर है मगर अंधेर नहीं! 2014 आया तो उसे बेहद खुशी हुई।' विकास ' के अवसरों की नई-नई संभावनाएं दिखीं। इस बार शुक्र था कि गांधी-नेहरू नहीं थे मगर मूर्खता विरोध की जो विरासत वे छोड़ गए थे, वह कमजोर हुई थी मगर मिटी नहीं थी।इस सरकार ने कितनी ही कोशिश की, प्रधान जी ने सबकुछ करके देखा-दिखा दिया मगर उस विरासत का केवल एकाध बाल ही बांका कर पाए!


मूर्खता को कभी- कभी निराशा इतना घेर लेती है कि उसका मन होता है कि इससे तो अच्छा है, वह मर जाए। यह देश छोड़ जाए। सुख की ऐसी छाया में चली जाए कि जहां उसका कोई कुछ बिगाड़ न पाए। इसी दौरान उसके कुछ चाहनेवाले उसे मिल जाते हैं। वे उसकी तारीफ़ के पुल दर पुल बांधने लगते हैं। उसके साम्राज्य के विस्तार का उसे ज्ञान करवाते हैं। तब उसकी जान में जान आती है। उसका आत्मविश्वास लौटता है। उसे भरोसा होता है कि चूंकि इस देश में उसके 'अच्छे दिन' आए हैं, तो ये जाएंगे नहीं अब कभी। कठिन संघर्ष के बाद आए हैं, तो लोग उन्हें जाने भी नहीं देंगे। उसे नेतृत्व की 'क्षमता' पर पूरा विश्वास है। जब करीब दस साल पहले उसने सुना था कि 'अच्छे दिन' आनेवाले हैं तो वह खुशी से पागल हो गई थी। जनता समझ रही थी कि 'अच्छे दिन' उसके आने वाले हैं मगर मूर्खता जानती थी कि 'अच्छे दिन' तो  उसके आनेवाले हैं। मूर्खता इतनी मूर्ख नहीं थी कि यह बात वह सबके सामने  छाती ठोककर कहती। और लो, वे दिन आ  गए थे! अब मूर्खता का सूरज रोज उगेगा, चंद्रमा आकाश में रोज दमकेगा। रोज वह नए-नए आइटम पेश करेगी। रोज जाम छलकाएगी!

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