विष्णु नागर का व्यंग्य: कहानी एक ऐसे राजा कि जो खुद को चक्रवर्ती सम्राट ही नहीं, ईश्वर का अवतार समझता था!

राजा से उसके दरबारी कहने लगे थे कि वह चक्रवर्ती सम्राट ही नहीं है, ईश्वर का अवतार है। इस समय धर्म की हानि हो रही है, इसलिए उसने ईश्वर होते हुए भी कृपापूर्वक यह कार्यभार स्वीकार किया है। पढ़ें विष्णु नागर का व्यंग्य।

प्रतीकात्मक तस्वीर
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विष्णु नागर

यह बात उस देश में लोकतंत्र की स्थापना के दशकों बाद की है। तब उस देश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री आदि हुआ करते थे। तब तक उस देश के आजाद होने से पहले के  सभी राजा भूतपूर्व होकर परलोक प्रयाण कर चुके थे पर उस जमाने में अपने को राजा समझनेवाले अनेक थे। घर-घर में राजा और रानियां थीं। हर चपरासी, हर क्लर्क, हर अफसर, हर विधायक, हर सांसद, हर मंत्री, हर दलाल, हर जुआरी, हर सेठ, हर पत्रकार अपने को राजा समझता था। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री अपने को सचमुच का राजा समझने लगे। राजा ही नहीं ,चक्रवर्ती सम्राट मानने लगे। ईश्वर समझने लगे। मनमानी करने लगे,खुद को अजर -अमर मानने  लगे।

किसी को यह शक न हो जाए कि वह इस देश का सम्राट नहीं बल्कि प्रधानमंत्री है, जिसे बदला, हराया तथा हटाया जा सकता है तो वह दिन में छह बार झूठ के कपड़े बदलने लगा। झूठ के कपड़े चूंकि महंगे और चमकीले होते हैं, इसलिए जनता भी उसकी चमक -दमक में आकर उसे राजा और अपने को प्रजा मानने लगी। वह भूल चुकी थी कि उसने ही इसे चुना है।

राजा से उसके दरबारी कहने लगे थे कि वह चक्रवर्ती सम्राट ही नहीं है, ईश्वर का अवतार है। इस समय धर्म की हानि हो रही है, इसलिए उसने ईश्वर होते हुए भी कृपापूर्वक यह कार्यभार स्वीकार किया है। वह रोज दरबार लगाने लगा। वहां उसकी प्रशंसा में गीत और भजन गाये जाते, आरती उतरी जाती,  प्रसाद चढ़ाया जाता और  दरबार अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया जाता।

वह अपने आप से बहुत मगन रहने लगा। अपने गीत वह स्वयं गाने लगा। अपनी कीर्ति अपने मुख- कमल से गाने लगा। वह अपने चेहरे, अपनी दाढ़ी, अपने हाथ, अपने पांव, अपनी कब्जीयत, शरीर के केंद्रीय भाग में बार बार उठनेवाली खुजली, अपने मधुमेह ,अपने हृदयरोग से भी प्यार करने लगा।

हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की अमर कहानी में अंततः एक बच्चा यह राज खोल देता है कि राजा कीमती अदृश्य कपड़ों से सज्जित नहीं है बल्कि अदद नंगा है। यह कहानी उस हवाई राजा ने भी सुन रखी थी। उसकी यह सख्त ताकीद थी कि अगर किसी बच्चे ने उसकी गैरहाजिरी में भी उसे नंगा कहा और उस तक यह बात पहुंच गई तो उस बच्चे की, उसके मां-बाप, भाई-बहनों, पड़ोसियों आदि की आंखों के सामने उसकी कुल्हाड़ी से हत्या कर दी जाएगी और इनमें से किसी की आंखों से आंसू टपकने से  पहले ही बाकी सबको तोप से उड़ा दिया जाएगा। यह उसकी कोरी धमकी नहीं थी, उसने यह अनेक बार कर दिखाया था।


इस कारण जनता उससे डरी- डरी रहती थी। बच्चों को उनके मां- बाप इतना डरा रखा था कि बच्चे, राजा और नंगा के बीच कोई संबंध हो सकता है, इससे अनभिज्ञ थे। बच्चों को सख्त हिदायत थी कि वे राजा शब्द का उच्चार नहीं करेंगे। करेंगे तो भूत उन्हें उठाकर ले जाएगा। बच्चों को चूंकि नंगा रहना पसंद होता है और दूसरे बच्चे को नंगा देखकर ताली बजाना भी पसंद है, इसलिए नंगा शब्द का वे धड़ल्ले से उपयोग करते थे। और बच्चे कहीं के हों, होते तो आखिर बच्चे ही हैं। एक दिन उनमें से एक ने आखिरकार वह कह  दिया, जिसकी आशंका थी कि जिस आदमी ने झूठ के इतने आवरण पहन रखे हैं, वह नंगा है। किसी बड़े ने कहा कि राजा को ऐसा नहीं कहा करते तो यह कहने में बच्चों को और भी मजा आने लगा कि राजा नंगा है, राजा नंगा है। सारे राज्य के बच्चों में यह बात फैल गई कि राजा नंगा है।

राजा कितने बच्चों और उनके परिजनों को मरवाता। पता चला उसमें उसके दरबारियों, न्यायाधीशों, उसके सेना की तीनों कमानों के प्रमुखों, उसके सिपाहियों,उसके सेठों के बच्चे भी शामिल हैं। पता यह भी चला कि उसके अपने वैध और अवैध बच्चे भी आजकल राजा नंगा है, नंगा है, गाते हैं। पटरानी को छोड़कर बाकी रानियां भी बच्चों के साथ मिल कर राजा नंगा है, गाती हैं। राजा परेशान हो गया। उसने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई। उसमें वह चाहता था कि यह प्रस्ताव पारित हो कि राजा नंगा नहीं है मगर तब तक राजा इतना नंगा हो चुका था कि दरबारी उसके सामने ही गाने लगे- राजा नंगा है। फिर क्या था, जो भी किसी से कहीं मिलता, नमस्कार या प्रणाम नहीं करता, राजा नंगा है, कह कर अभिवादन करता। पगला चुके नंगे राजा ने बंदूक उठाई। चलाई तो इसलिए थी कि उससे वह दूसरों को मार सके मगर गलती से उसकी बंदूक की गोली, उसे ही लग गई।

राजा की शवयात्रा में राजा को नंगा रखने का फैसला हुआ। प्रजा अब जागकर जनता हो चुकी थी, उस पर बालकनियों से थूकने लगी। उस थूक से राजा का शव इतना भारी हो गया कि उसे रास्ते में ही छोड़ देना पड़ा। अवसर का लाभ उठाकर सारे देश से लोग राजधानी आकर उस पर थूकना अपना पवित्र कर्तव्य समझने लगे।

 'थूक राजा ' नाम से इतिहास में वह आज भी प्रसिद्ध है।

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