विष्णु नागर का व्यंग्य: यह विचित्र जमाना है, कल के खलनायक आज के आदरणीय और सम्माननीय हैं!

अब सम्मानितों की नई सूची बाजार में आ चुकी है। उसमें वे सब शामिल हैं, जो कल तक खलनायक थे। कल के गुंडे, कल के लुटेरे, कल के झूठे आज के आदरणीय, सम्माननीय, महामहिम हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

यह विचित्र समय है। हमारे समय के गुंडे  56 इंची सीना दिखाकर यह नहीं कहते, हां, हम गुंडे हैं, जाओ,  तुमसे जो बन सके, कर लो। ये बीते जमाने की बातें हो चुकी हैं। अब वे धमकाते नहीं, जो करना होता है, करके दिखा देते हैं और उसके बाद मुस्कुराहट फेंकते हुए आपसे हाथ मिलाकर भी जाना चाहते हैं। आप हाथ मिलाने से इनकार कर देते हैं, तो इसका वे बुरा मानते हैं और आपके खिलाफ केस दर्ज कर देते हैं। साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि इन्होंने हमें लुटेरा कहा और इसकी सज़ा भी तुरंत मुकर्रर हो जाती है। समय ऐसा है कि केस दायर होने से पहले ही जज का फैसला आ जाता है। जितना आपके पास कुल धन नहीं है, उससे अधिक राशि का जुर्माना लग जाता है। गुंडई उनकी चल रही है तो बात भी उन्हीं की सुनी जाती है।

लुटेरे भी यह नहीं कहते कि हम लूटने आए हैं। वे यह भी नहीं कहते कि हम लूटने नहीं आए हैं। वे आपके घर को अपना घर समझकर आराम से आते हैं और आराम से जाते हैं। उन्हें पिस्तौल दिखाने या अंधेरे का फायदा उठाकर भागने की जरूरत नहीं। उन्हें सीसीटीवी से डर नहीं, दिन के उजाले से डर नहीं, दस लोग यह देख रहे हैं, इससे खौफ नहीं। आप चीखकर आसपास के सैकड़ों लोगों को बुला कर उन्हें पकड़वा देंगे, इसकी उन्हें चिंता नहीं। पुलिस उनसे डरती है, अदालत उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखती है। अखबार उनके हैं, टीवी चैनल उनके हैं। नेता उनके हैं। भीड़ उनकी है। धर्म उनका है। साधु -संत उनके हैं। बुलडोजर उनका है और बुलडोजरीवाणी उनकी है। अपराधी अगर कोई है तो आप हैं, जिनका घर लुटा है। गलत अगर कोई है तो आप हैं क्योंकि आप स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि लूटना, गुंडई करना उनका धर्म है, उनका कर्तव्य है , उनका अधिकार है। उनकी देशभक्ति का सबूत है।


यही हाल चोरों का है। वे भी नहीं कहते कि हम चोर नहीं हैं। वे यह भी नहीं कहते कि हम चोर हैं। वे दूसरों की ओर इशारा करते हैं कि आपका मंगलसूत्र और आपकी भैंस वे चुरा ले जाएंगे।झूठे भी इसी प्रजाति के हैं। वे यह नहीं कहते कि हम सच्चे हैं। वे अपने बारे में न खंडन करते हैं, न मंडन। वे कहते हैं कि झूठ की मशीन दूसरों के पास है। वे धड़ाधड़ झूठ बोलते हैं। जो हत्या करते हैं, वे हत्यारे नहीं हैं। हत्यारे वे हैं, जो हत्या को आज भी हत्या मानते हैं।

 सच यह है कि अब यह सब सामान्य हो चुका है। लुटेरे जानते हैं कि हम अपने से बड़े लुटेरों के संरक्षण में पल रहे हैं और वे अपने से और भी बड़े लुटेरों के संरक्षण में हैं। और सारे लुटेरों का मालिक एक है, जो कहां बैठा है, सब जानते हैं। जब तक उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा, हमारा भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे संरक्षकों पर कभी संकट आया भी तो तब तक हम इतने बड़े लुटेरे बन चुके होंगे कि हमसे ऊपर वाले लुटेरे भी हमसे पंगा लेने से डरेंगे। दोस्ती रखने में फायदा मानेंगे।

लुटेरों ने आज अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली है कि लुटेरों को लुटेरा कहनेवाले का ही बिगड़ता है, लुटेरे का बिलकुल नहीं। अब लूट वैध हो चुकी है, बशर्ते कि लुटेरे उस सबसे बड़े लुटेरे को अपना आका मानते हों। लूट पर सवाल उठाना अब दंडनीय अपराध अघोषित रूप से घोषित है। अब हत्यारों को भी हत्यारा, घर की चहारदीवारी के अंदर  ही कहा जा सकता है और ऐसा कहने से पहले सोचना पड़ता है कि दीवारों के भी कान होते हैं। हत्यारों को हत्यारा कहना, उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना माना जा सकता है। इससे 'सांप्रदायिक सद्भाव 'खतरे में पड़ सकता है, शहर में दंगे भड़क सकते हैं, इस आरोप में बंद किया जा सकता है और अगर आप उनके धर्म के नहीं हैं तो चार या पांच साल जेल में डाला जा सकता है। आवाज़ दोगे तो कोई नहीं सुनेगा।


अब सम्मानितों की नई सूची बाजार में आ चुकी है। उसमें वे सब शामिल हैं, जो कल तक खलनायक थे। कल के गुंडे, कल के लुटेरे, कल के झूठे आज के आदरणीय, सम्माननीय, महामहिम हैं। वे बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई उन्हें उनके असली रूप से संबोधित करे। जो जितना मूर्ख और दंभी है, वह उतना ही अधिक सम्मानित है। जिसमें दूसरे धर्मों के लोगों के मन में नफ़रत है, वह उतना ही बड़ा राष्ट्रवादी है। जो जितना खोखला है, उसमें उतनी ही गहराई खोजी जा रही है।

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