मृणाल पाण्डे का लेखः सरकारी स्वर्ग निर्माण से स्वर्गवासी होते हम लोग

अचानक सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को एक झटके में हजार रुपये के नोट की तरह खत्म कर दिया। देश के जीवन को हिला देने वाले कई फैसले मानसून सत्र में किए गए और भक्तों की फौज ने इन पर सवाल करने को सीधे देशद्रोह के बराबर बना दिया।

रेखाचित्रः डीडी सेठी
रेखाचित्रः डीडी सेठी

मृणाल पाण्डे

सत्ता में अपनी धमाकेदार वापसी के बाद से सरकार कभी अच्छे दिनों के पुराने सपने जगाती है, कभी देशभक्ति की दुहाई देकर जनता से आर्थिक बदहाली और सांप्रदायिक तनाव के दु:स्वप्नों को झेल ले जाने का दुलार भरा अनुरोध करती है। अरे आप चिंता क्यों करते हैं? देशद्रोह कानून को व्यक्तिश: लागू करने की बहस के बीच मुस्कुराते मंत्रीजी ने संसद से सबको आश्वासन दिया, “अगर आप कुछ नहीं करोगे तो आपको भी कुछ नहीं होगा।” यानी चुपई मारो दुलहन, मारा जाई कौव्वा!

जब रुपया लगातार लुढ़क रहा है और कॉरपोरेट क्षेत्र लहूलुहान हो रहा है, बेरोजगारी दर अभूतपूर्व बन गई है, अचानक केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को एक झटके में हजार रुपये के नोट की तरह खत्म कर दिया है। यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को एक विशेष दर्जा देता था। विधानसभा बर्खास्तगी के बाद से केंद्र ने लगातार अधिकाधिक अशांत हो रहे इस राज्य को पहले तो सेना की टुकड़ियां भेजकर घेरा, फिर कश्मीरी नेताओं को नजरबंद कर घाटी के शेष देश और मीडिया से सारे संपर्क सूत्र काट दिए। फिर पांच अगस्त को इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का फैसला घोषित किया गया।

सरकार ने इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया है, जबकि विपक्ष ने इसे संविधान के साथ मखौल करार दिया है। कई आलोचक इस घोषणा के खिलाफ घाटी में कूदने की ताक में बैठे पाकिस्तान तथा अमेरिका की दखलंदाजी की राह खोलने वाला कदम बता रहे हैं। सरकार की दलील है कि कश्मीर के राजा हरी सिंह के साथ जो समझौता ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ से हुआ था, वह वैसा ही था जैसा मैसूर, टिहरी गढ़वाल या किसी भी अन्य रियासत के साथ। लेकिन जहां बाकी रियासतों ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ मर्जर’ पर भी दस्तखत किए, वहीं कश्मीर के साथ भारत के संबंध उलझ गए।

वजह थी कश्मीर में जनमत संग्रह का वह वादा जिसकी पेशकश लार्ड माउंटबेटन ने की थी। बीजेपी ने 2019 चुनाव से पहले जिस तरह सर्जिकल स्ट्राइक से वोट बटोरे, उसी तरह उसे आसन्न असेंबली चुनावों में कश्मीर को दो नए केंद्रशासित राज्यों में तब्दील करने से भी उम्मीद है। पर अभी तो हाल यही है कि हर संपर्क से काट दी गई घाटी में मरघट का सन्नाटा पसरा हुआ है। दबिश का घेरा उठने के बाद जब यह सन्नाटा टूटेगा, तो सरकार तमाम संभावनाओं और विदेशी हस्तक्षेप से कैसे निबटेगी, यह अस्पष्ट है।

लेकिन हमारी ठोस चिंता, छंटनी और आर्थिक संकटों का यह निदान निश्चित ही नहीं बन सकता। बाजार में रुपये में तेज गिरावट एक अशनि संकेत है, जो दिखा रहा है कि राजनीति में ऐसा जोखिम उठाने की देश को घर के भीतर और ग्लोबल दुनिया, दोनों में ही बड़ी कीमत देनी पड़ सकती है।

भारत की आजादी का मतलब आज भारत के मध्य वर्ग के लिए अलग और उस पर राज करने वालों के लिए अलग क्यों बनता जा रहा है? हालिया भारतीय दंडविधान के कुछ कानूनों में तरमीम के बाद कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) का जो सरकारी मतलब उद्योग जगत को और अभिव्यक्ति की आजादी का जो जमीनी अर्थ मीडिया को दिखाई दे रहा है, वह पुरानी व्यवस्था का संशोधन या नए का आगाज नहीं करता। यह एक ऐसा चुप्पा सरकार का ताबेदार सफेदपोश स्वर्ग बनाने की कोशिश प्रतीत होता है जिसमें ईमानदारी से काम करना और मुनाफा कमाना दोनों महापाप बन जाएंगे।

यही नहीं, इसी बीच रिजर्व बैंक के दो पूर्व गवर्नरों और सरकार के शीर्ष वित्तीय सलाहकार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि बैंकिंग क्षेत्र की हालत बहुत नाजुक है, लेकिन सरकार अपने अड़ियल तरीकों से वित्त शास्त्रियों की सलाह अमान्य कर मनमाने तरीके से सब्सिडियां और लोन बांटने पर अड़ी हुई है। आठ प्रमुख उत्पादक सेक्टर बीमार हैं, 300 छोटी इस्पात इकाइयां बंद हो रही हैं। पर वित्तमंत्राणी के पास मीडिया की ब्रीफिंग के लिए वक्त या इच्छा नहीं है। कहा गया है कि मीडिया मनमाने सवाल पूछने या पहले की तरह मंत्रालय में अब नहीं आ-जा सकता। उधर सरकार कश्मीर में सैनिक भेजने में व्यस्त नजर आती है या फिर नए सांसदों की क्लास लगाती हुई। शेयर बाजार कितना गिरा आज उसके तईं यह बड़ी खबर नहीं, बाघों की तादाद बढ़ गई यह शायद अधिक बड़ी खबर बनती है।

बेशक देश की बहुत बड़ी ग्रामीण या शहरी मलिन बस्तियों में सर छुपाये विस्थापित लोगों की वह आबादी जो मध्य वर्ग में नहीं आती उसे इस सफेद पोश स्वर्ग में जबरन स्वर्गवासी बनाए जा रहे मध्यवर्ग की आह-कराह से कोई आत्यंतिक दार्शनिक परेशानी नहीं होगी। यह वर्ग तो बस अपने नारकीय जीवन की यातनाओं से उतनी भर राहत चाहते हैं जितना युधिष्ठिर के नरक के द्वार पर खड़े होने भर से रौरव नरक के वासियों को मिल रही थी। वे बेजुबान हैं, असंगठित और राजनीतिक चालों से विरक्त हैं। वे इस तरह वोट देते हैं जैसे नरक वासियों से कहा गया होता तो वे युधिष्ठिर को दे देते। तृप्ति को वह अपना अधिकार नहीं मानता तभी नोटबंदी के बाद भी बालाकोट की हुंकार की छांव से पल भर को राहत पाकर वह फिर मोदीजी को वोट डाल आया।

पर सरकार को चिंता करनी चाहिए उस मुखर मध्यवर्ग की जिसमें क्लर्कों, चपरासियों से लेकर शिक्षक, कुलक किसान, व्यापारी, किरानी और उनके करोड़ों यूनिवर्सिटी पास बेटे-बेटियां भी शामिल हैं। कुछ सबक अभी दोनों पक्षों को सीखने हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं तथ्य जुटाने में मेहनत करना और लोकतंत्र में सर्वसम्मति का सम्मान। जरूरी है कि मीडिया की आजादी से सरोकार रखने वाले सारे लोग वर्तमान सरकार और विपक्ष के साथ-साथ भोली जनता को भी यह याद दिलाते रहें कि राजधानी की लक्जरी जोन- लुटियन जोन, जिसे पानी पी-पी कर कोसा जा रहा है, भारतीय राजनीति के हर दल के बड़े खिलाडियों की वह सर्वाधिकार सुरक्षित आरक्षित आवासीय जोन रही है। वहीं से वे सब लगातार अपने तमाम हाकिम हुक्कामों, दलीय चाणक्यों और चिरकुटों समेत राजकाज या उसके प्रतिरोध की भली बुरी योजनाएं बनाते चलाते हैं। दामन किसी का पाक नहीं।

मई 2019 में मौजूदा सरकार इसी तरह चुनाव प्रचार के दौरान पाकिस्तान के घर में घुसकर उसको मारने की एक कथित कार्रवाई और कांग्रेसी वंशवाद के गिर्द मुखर और चतुराई से संयोजित मुहिम चलाकर नोटबंदी, बढ़ती बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोपों को जमीन में गाड़कर दिल्ली के तख्त पर दोबारा बैठी है। फटेहाल बीमारू (बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) राज्यों के बहुसंख्य हिंदी भाषी मतदाताओं ने नई सरकार की देसी बानी और चोले को, संविधान की किताब पर मत्था टेकने और हिंदी की पीठ थपथपाई को फिर से एक जनोन्मुखी नैतिकता और उजलेपन की निशानी मान लिया और उम्मीद की कि अब पाकिस्तान की नाक रगड़वाने में सक्षम नेता दिल्ली की उच्चभ्रू (हाई ब्राउ) वंशवादी रीति-नीति को बदलकर समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े आम आदमी को सरकार की पहली प्राथमिकता बनाएंगे।

लेकिन न तो क्षेत्रीय क्षत्रपों का वंशवाद गया और अब तो सूटबूटवाला इलीट कॉरपोरेट वर्ग भी भड़क गया है। बिना उसे या विपक्ष को भरोसे में लिए अचानक देश के जीवन को हिला देने वाले कई फैसले मानसून सत्र में लागू करा लिए गए और भक्तों की एक मुखर फौज ने इनपर कोई भी सवाल खड़ा करने को सीधे देशद्रोह और भ्रष्टाचार का समानार्थक बना दिया। देशद्रोह को संज्ञेय गैरजमानती बनाया ही जा चुका है।

2019 का चुनाव मीडिया को किस तरह प्रभावित करवा कर लड़ा गया, यह बात एशिया में सब जान गए हैं। इसीलिए मीडिया के किसी अंग्रेजी पत्रकार की बजाय, दुष्प्रचार की आंधी के बीच एक निष्कंप लौ की तरह खड़े होकर सरकार से लगातार कष्टकर सवाल पूछने वाले रवीश कुमार को मैगसेसे पुरस्कार देकर एशिया की शीर्ष मीडिया ने साफ जता दिया है कि दुनिया की नजरों में भारत का सच किस तरफ खड़ा है। सत्तारूढ़ सरकार को अगर इस नाजुक घड़ी में अपनी छवि की चिंता है, तो उसे आलोचना सुनकर बिना जामे से बाहर हुए भरोसेमंद तरीके से वित्तीय संकटों और इन तमाम किंवदंतियों से मुक्ति पानी होगी कि वह बौद्धिक विरोधी है।

आग लगा दूंगा, भूचाल ला दूंगा का शोर मचाकर सरकार ने हर कदम पर जरूरत से ज्यादा आक्रामकता दिखाते हुए खुली बहस पर ढक्कन लगाने की कोशिश की है। संसद अमुक नियम की तहत बहस मांगे तो ढक्कन, टीवी पर बहस हो, तो पार्टी विशेष के प्रवक्ता के साथ बहस को अपनी पार्टी का प्रवक्ता न भेजने का ढक्कन, संसदीय कमेटी की जांच पर हीलाहवाला, दिल्ली के राज्यस्तरीय मसलों पर चुनी हुई विधानसभा के हर फैसले पर ढक्कन और गवर्नर विपक्षी दल की निर्वाचित सरकार बरखास्त करे तो इस पर सार्वजनिक नाच-गाना, लड्डू बंटाई, समझदार मध्यवर्ग तथा मीडिया दोनों इससे आजिज हैं। वे चाहते हैं कि समाजवाद का नकली ढोल न पीटा जाए और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का अब जो खेल हो, वह खुला फर्रुखाबादी हो।

जिस तरह के सामंतवादी और हिंदू परंपरावादी समाजवाद की बातें सरकार इन दिनों कर रही है, वे उसके मूल दर्शन से कतई मेल नहीं खातीं। यह कल्पना साम्राज्यवादी भी है क्योंकि इसके तहत शीर्ष नेता से संत्री तक हर कोई उपनिवेशवादी तेवर धारण किए जंगल में हैटधारी जिम कार्बेट बना नजर आ रहा है। समाजवाद का यह प्रकार कहीं न कहीं लिंग भेदी और जातिवादी भी है क्योंकि उसमें औरतों और दलितों के लिए संसद तो दूर थाने या पंचायतों में भी न्याय नहीं है। और ज्ञान विरोधी भी, जभी प्राथमिक शिक्षा संस्थाएं बेहाल हैं और सारा विमर्श उच्च शिक्षा पर केंद्रित कर दिया गया है। जहां शीर्ष नेता ज्ञान के लिए खुद कभी पसीना बहाए बिना किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट पा जाते हैं और कन्वोकेशन में शानदार ज़रीवाला चोगा पहिन कर डिग्रियां बांट कर छात्रों से चरण छुलवाते हैं। ऐसा समाजवाद कोई दर्शन नहीं, एक आत्म मोहग्रस्त सामंतवादी नेतृत्व की पगड़ी का तुर्रा मात्र है।

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