चीन सीमा की बात आते ही मोदी की दहाड़ हो जाती है म्याऊं-म्याऊं
अरुणाचल से लद्दाख तक चीनी टकराव, बढ़ते व्यापार घाटे और सीमा की हकीकत पर पर्दा डालने वाली सरकारी कूटनीति की खुली कलई।

नरेंद्र मोदी का राष्ट्रवाद दोहरे सुरों में बोलता है: पाकिस्तान और बांग्लादेश पर तेज, चीन पर धीमा। पाकिस्तान के खिलाफ छाती ठोकना और बांग्लादेश को नीचा दिखाना सत्ता-राष्ट्रवाद का सार्वजनिक प्रदर्शन बन गया है, जबकि चीन से जुड़े चिंताजनक घटनाक्रमों को सीधे झूठ और कूटनीतिक लफ्फेबाजी में लपेट दिया जाता है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) प्रमुख द्वारा हाल ही में किया गया यह खुलासा कि अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों के साथ टकराव जारी है, एक बार फिर सरकार द्वारा पेश किए गए द्विपक्षीय संबंधों और सीमा पर तैनात बलों की वास्तविक परिस्थितियों के बीच के अंतर को साबित करता है।
पाकिस्तान वाली तुलना में एक बात साफ करने की जरूरत है। मई 2025 के संघर्ष-विराम के बाद से पाकिस्तान के प्रति मोदी का रुख कुछ नरम हुआ है जबकि ट्रंप दावा करते रहे हैं कि उन्होंने उच्च टैरिफ की धमकी देकर लड़ाई रुकवाई थी। मोदी ने अब तक बाहरी मध्यस्थता के ट्रंप के बार-बार के दावों का कोई ठोस जवाब नहीं दिया है। इससे हर फैसले पर पूरा नियंत्रण रखने वाले एक सर्वसमर्थ नेता की जो छवि मीडिया ने गढ़ी थी, उस पर आंच आती है। चीन के साथ यह नरमी पिछले दशक में सबसे साफ दिखी जब पाकिस्तान और शेख हसीना के हटने के बाद कुछ हद तक बांग्लादेश के लिए भारत सरकार कड़ा रुख अपनाए रही।
आईटीबीपी के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने कई जगहों पर चीन से टकराव की पुष्टि की है। जुलाई से अरुणाचल प्रदेश के ताकसिंग सर्कल में असाफिला के आसपास तनाव की सूचना थी, जिसे सरकार ने नहीं माना। विदेश मंत्रालय ने अब एक अस्पष्ट बयान में आखिरकार माना है कि जब चीनी सैनिक तय तौर-तरीकों से हटकर गश्ती करते हैं तो टकराव होता है। ये स्वीकारोक्तियां किसी शांत सीमा का संकेत नहीं। फिर भी राजनीतिक नेतृत्व जोर देता है कि भारतीय सुधरते संबंधों का जश्न मनाएं, बिना यह स्पष्ट किए कि क्या अनसुलझा है, चीन क्या कर रहा है और भारत ने क्या हासिल किया या क्या गंवा दिया।
अत्यंत दुर्गम इलाकों में सैनिकों का साहस सरकार की इस टालमटोल का बचाव करना और मुश्किल बना देता है। भारतीयों को राष्ट्रीय सुरक्षा की समझ सीमा सुरक्षा अधिकारियों की छिटपुट टिप्पणियों और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गांवों के लोगों की शिकायतों से नहीं जोड़नी चाहिए। जो प्रधानमंत्री देश की ताकत की इतनी डींगें हांकते हैं, उनका फर्ज बनता है कि वह देश को चुनौतियों का हिसाब दें, जिनमें वे चुनौतियां भी शामिल हैं जो उनकी मजबूत छवि को जेन ज़ी के विरोध-प्रदर्शनों से भी अधिक तोड़ सकती हैं।
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खतरे के संकेत अक्तूबर 2026 में ही शुरू नहीं हुए। 2017 में भूटान और चीन के बीच ट्राई-जंक्शन के पास विवादित क्षेत्र डोकलाम में चीन के साथ हुई सैन्य तनातनी स्पष्ट करता है कि बीजिंग जोर-जबरदस्ती से अपने क्षेत्रीय दावों को आगे बढ़ाने की मंशा रखता है। इससे भी कहीं गंभीर संकट 2020 में पूर्वी लद्दाख में सामने आया।15 जून को गलवान घाटी की झड़प में कर्नल बी. संतोष बाबू सहित बीस भारतीय सैनिक शहीद हुए। चीन के साथ झड़प में सैनिकों की यह शहादत दशकों बाद हुई थी। फिर भी, 19 जून को मोदी ने ऐलान कर दिया कि न तो कोई भारतीय क्षेत्र में घुसा है और न ही किसी भारतीय चौकी पर कब्जा हुआ है।
जिस समय चीनी आक्रामकता की स्पष्ट जानकारी देने की जरूरत थी, प्रधानमंत्री ने सच पर पर्दा डालना चुना। अगर कोई चीनी घुसपैठ नहीं हुई थी, तो भारतीय सैनिकों ने किसलिए अपने प्राण दिए? मोदी के बयान ने बीजिंग के पक्ष को विश्वसनीयता दी और भारत की स्थिति को कमजोर किया।
यहां इतिहास का एक असहज अक्स दिखता है। कारगिल के दौरान परवेज मुशर्रफ के सैन्य नेतृत्व ने अपने सैनिकों की संलिप्तता से इनकार किया था, जिससे भारत को पाकिस्तानी मृतकों को दफनाना पड़ा। कारगिल में मुशर्रफ और गलवान में मोदी ने ‘इनकार’ के जरिये अपनी राजनीतिक स्थिति को बचाना चुना, जिसका खामियाजा सैनिकों को भुगतना पड़ा। जिस पाकिस्तान को मोदी और उनकी पार्टी हर उस चीज की कसौटी के रूप में देखती है जिसे भारत को धिक्कारना चाहिए, उसी से अपनी यह समानता मोदी को चुभनी चाहिए।
लद्दाख के एक प्रतिनिधिमंडल के अनुमान के आधार पर राहुल गांधी ने चिंता जताई है कि चीन ने लद्दाख में भारत-नियंत्रित लगभग 2,000 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। सरकार इससे इनकार करती है, और सीमा सड़क संगठन के एक पूर्व प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष के नेता की टिप्पणियों को चुनौती दी। विपक्ष की बात खारिज कर देने से मूल सवालों का जवाब नहीं मिल जाता: आज भारतीय सैनिक कहां तक गश्त कर सकते हैं और क्या पाबंदियां अब भी लागू हैं?
चीन से बातचीत छह साल से चल रही है, लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि भारत ने 2020 के संकट से पहले का क्षेत्रीय नियंत्रण और गश्ती पहुंच वापस पा ली है। 21 अक्तूबर 2024 के समझौते में देपसांग और डेमचोक में कुछ हद तक गश्त का समाधान किया गया, और सैन्य वार्ता 21वें दौर से आगे भी जारी रही, लेकिन यह स्थापित नहीं करता कि पूरे पूर्वी लद्दाख में पहले वाली व्यवस्थाएं बहाल हो गई हैं।
जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरण पर मोदी सरकार का रवैया इस चिंता को बढ़ाता है। पूर्व सेना प्रमुख की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के इंतजार में अप्रकाशित है। रणनीतिक रहस्यों की रक्षा के नाम पर सरकार ने संस्मरण को सामने आने से रोका। राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के दौरान लिए गए निर्णयों के महत्वपूर्ण विवरण तक जनता की पहुंच अनिश्चितकाल के लिए रोकने का बेहतर स्पष्टीकरण होना चाहिए।
नागरिकों को यह पूछने का हक है कि यह गोपनीयता सैन्य क्षमताओं की रक्षा करती है या उन लोगों की जिन्होंने राजनीतिक निर्णय लिए। ‘बैटल ऑफ गलवान’ फिल्म से जुड़ा विवाद, जिसका नाम बदलकर ‘मातृभूमि: मे वॉर रेस्ट इन पीस’ किया गया, ऐसे ही सवाल उठाता है। खबरों के अनुसार, फिल्मकार पर चीन के चित्रण को नरम करने का दबाव था। क्या सैनिकों का बलिदान कभी कूटनीतिक मेकओवर की सामग्री बनना चाहिए?
बीजिंग अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा पेश करता है, इसे दक्षिण तिब्बत कहता है और इसकी कई जगहों के चीनी नाम रख दिए हैं। उसका सीमावर्ती गांव कार्यक्रम सैन्य अभियानों को सहारा देने की उसकी मौजूदगी और क्षमता को मजबूत करता है। ब्रह्मपुत्र के ऊपरी प्रवाह में यारलुंग त्सांगपो पर चीन का विशाल जलविद्युत बांध निर्माण मौजूदा परेशानियों में एक और परीक्षा जोड़ता है। भारत और चीन के बीच जल-बंटवारे का कोई समझौता नहीं है। निचले बहाव की चिंताओं में तलछट, पारिस्थितिक व्यवधान, बांध की सुरक्षा और बाढ़ के पानी के छोड़े जाने की समय पर जानकारी शामिल है। भारत को ठोस सहयोग और भरोसेमंद आकलन की जरूरत है, न कि इस अस्पष्ट आश्वासन की कि उसके हितों की रक्षा की जा रही है।
भारत की आर्थिक निर्भरता भी बेड़ी का काम करती है। भारत ने 2025-26 में चीन से लगभग 131.6 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात लगभग 19.5 अरब डॉलर था। विदेश मंत्री जयशंकर की ‘आत्मसमर्पण’ की स्वीकारोक्ति कि चीन बड़ी अर्थव्यवस्था है, मोदी सरकार की पराजयवादी मानसिकता को दर्शाती है।
सवाल यह है कि मोदी के बारह वर्षों के शासन ने भारत की सौदेबाजी की ताकत को मजबूत करने के लिए क्या किया। विनिर्माण क्षमता, तकनीकी दक्षता और भरोसेमंद विदेश नीति की जगह राष्ट्रीय महानता के भाषण नहीं ले सकते।
एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए मोदी की 2025 की चीन यात्रा और दिल्ली में 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की मौजूदगी बचाव योग्य राजनयिक लोकाचार हैं। लेकिन जब टकराव जारी है, तो शिखर सम्मेलनों की तस्वीरें यह साबित नहीं कर सकतीं कि भारत की स्थिति में सुधार हुआ है। हमारी सरकार को वार्ता जारी रखने में सक्षम होना चाहिए, साथ ही चीनी की गतिविधियों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए और उसके साथ हो रही बातचीत के नतीजों की जानकारी देनी चाहिए।
अगर इसे मोदी की राजनीति के चश्मे से देखा जाए तो उनकी हिचकिचाहट समझ में आती है। एक ईमानदार चर्चा खोखली बयानबाजी और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर देगी। पाकिस्तान और बांग्लादेश ने देश में धर्म-आधारित राजनीतिक लामबंदी के मौके दिए हैं; चीन हमारी ‘झप्पी कूटनीति’ की सीमाओं को उजागर करता है और हमारी सैन्य तैयारी तथा आर्थिक निर्भरता पर मुश्किल सवाल उठाता है। नागरिकों को सामान्य स्थिति के धोखे में रखना और सैनिकों को सीमा की तपिश झेलने देना कितना आसान है! संदेह नहीं कि भारत को चीन के साथ शांति चाहिए। लेकिन उसे एक ऐसा प्रधानमंत्री भी चाहिए जो भारतीयों को यह बताने को तैयार हो कि उस शांति की कीमत क्या है, क्या अनसुलझा है और उनके 56-इंच के सीने वाले वादे पूरे क्यों नहीं हो पाए।
(अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं)
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