जब देश में ही बन जाएं दो अलग-अलग दुनिया तो फिर कैसी आजादी?

आजाद भारत को घेरे गुलामी की दीवारों पर जब हम 76 वें साल की लकीर खींच रहे हैं, तो ऐसे मौके पर दो मुस्लिम नागरिक याद दिला रहे हैं कि आजादी की इस यात्रा में हमने मूक दर्शक बनकर उनके भरोसे को तोड़ा है। आपने सबिका नकवी के विचार पढ़े। अब पढ़िए हुसैन हैदरी को।

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हुसैन हैदरी

अभी हाल ही में एक दोस्त से फोन पर लंबी बात हुई। उसने बताया कि कैसे पिछले कुछ दिनों से मुस्लिम विरोधी खबरों की वजह से वह लगातार अपने सीने पर बोझ महसूस कर रहा है। मैंने उनसे कहा कि तनाव की वजह से मुझे अपने माथे की नसें उभरी हुई महसूस होने लगी हैं और पिछले कुछ हफ्तों में मैं बमुश्किल सो पाया हूं।  

मैंने कहा कि कुछ महीने पहले मैं एक मनोचिकित्सक के पास जाने के बारे में सोचने लगा था लेकिन नहीं गया क्योंकि मनोचिकित्सक मेरे किसी मित्र या रिश्तेदार का नंबर मांग रहे थे और मुझे इसके लिए किसी को कहने में झेंप महसूस हो रही थी। लिहाजा, अब मैंने उन्हें सुझाव दिया कि हम दोनों किसी मनोचिकित्सक के पास जाएं और रेफरेंस के तौर पर एक-दूसरे का नाम दे दें।

मेरे मित्र ने कहा कि उनके लिए मनोचिकित्सक का खर्च वहन करना संभव नहीं हो सकेगा। फिर मैंने भी मन ही मन गुणा-भाग किया और पाया कि कुछ महीनों के लिए तो मैं मनोचिकित्सक की फीस और दवा का खर्च उठा लूंगा लेकिन आखिरकार इसका खर्च मेरे मासिक किराये के आसपास हो जाएगा।... इसलिए शायद मुझे इसके बिना ही काम चलाना पड़ेगा।   

पिछले छह महीनों के दौरान मैंने लगभग सात से आठ कविताएं लिखीं लेकिन उन्हें सोशल मीडिया पर नहीं डाला। मैं जहां भी देखता हूं, मुझे वैसी ही सामग्री दिखाई देती है और फिर इस सोच में पड़ जाता हूं कि कहीं मैं अपनी कविताओं के जरिये ‘नकारात्मक विचार’ को ही तो बढ़ावा नहीं दे दूंगा? मैं हर दिन पांच से छह ट्वीट लिखता हूं लेकिन उन्हें पोस्ट नहीं करता क्योंकि मैं उन पर होने वाली संभावित प्रतिक्रियाओं से डरता हूं- सरकार या मेरे संभावित हमलावरों से नहीं बल्कि मेरे दोस्तों और सहकर्मियों से जो मेरा मूल्यांकन करेंगे, और अपनी बात रखते हुए मैं उन्हें जाने-अनजाने नाराज न कर दूं क्योंकि इससे मुझे मिल रहा काम रुक सकता है या सामाजिक रूप से मुझे अलग-थलग हो जाना पड़ सकता है।

पिछले साल मुझे ‘एडाप्टेड स्क्रीनप्ले’ श्रेणी में आईफा अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था और पिछले महीने मेरे पांच गाने रिलीज हुए। लेकिन मैंने उनमें से किसी के बारे में इंस्टाग्राम पर नहीं लिखा क्योंकि मुस्लिम विरोधी नफरत की बहती धारा में मेरी किसी भी उपलब्धि के बारे में बात करने का यह सही वक्त नहीं लगता।  

मैं ट्विटर पर मुसलमानों की हत्या का आह्वान करने वाले लगभग हर नफरत भरे वीडियो को देखता हूं क्योंकि मेरी आदत है। मैं यह भी देखता हूं कि कैसे लोग इंस्टाग्राम पर अपनी लापता बिल्लियों को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं।


जैसे खाना पकाना, घर की सफाई करना, बैठकों में भाग लेना और अपना व्यावसायिक काम करना मेरी रोजाना की जिंदगी का हिस्सा हैं, वैसे ही यह डिजिटल अग्निपरीक्षा भी। जब मुझे स्क्रीनप्ले या डायलॉग लिखना होता है तो मुझे एक-दो दिन के लिए फोन बंद करना पड़ता है क्योंकि मैं जानता हूं कि एक भी नफरती वीडियो या ट्वीट देखकर मैं सदमे, गुस्से और बेचारगी के भंवर में फंस जाऊंगा। मैं खुद से कहता हूं, मैं एक पेशेवर लेखिक हूं और जब कोई मुझे लिखने के लिए भुगतान करता है तो मेरी भावनाएं आंशिक रूप से किराये पर होती हैं। यह मेरे लिए गैर-पेशेवर होगा कि अपनी भावनाओं को कहीं और गलत तरीके से व्यक्त करूं।

अगर दोपहर में बैठक हुई और मुझसे किसी जोड़े के लिए एक आकर्षक, हिंग्लिश, मजेदार, रोमांटिक गीत लिखने के लिए कहा जाता है, तो मुझे वह करके देना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उस दिन सुबह मैंने एक सैन्य अधिकारी द्वारा ट्रेन में तीन मुस्लिम व्यक्तियों को गोली मारने के वीडियो देखे या सैकड़ों मुस्लिम घरों पर बुलडोजर चलाए जाने की खबरें पढ़ीं।  

मैंने खुद को समझा दिया है कि हिंसा और नरसंहार की बातें रोजमर्रा दफ्तरों में कॉफी-ब्रेक के दौरान होने वाली ‍इधर-उधर की बातों जैसी ही हैं। ज्यादातर नेक इरादे वाले लोग भी ऐसी बातों का जिक्र ‘यह बहुत बुरा हुआ’ से शुरू करते हैं और ‘चलो, काम पर चलते हैं’ के साथ खत्म कर देते हैं। मैं उन्हें यह नहीं बता पाता कि चूंकि ‘ऐसा बुरा घट गया है’ कभी-कभी मैं लौटकर काम करने की हालत में नहीं होता। लेकिन मुझे काम करना चाहिए—और ये नेक इरादे वाले लोगों में से तमाम ने जो 2014 में किया, उसे अब भला वे कैसे पलट सकते हैं?  

मेरे फोन पर जो दिखता है और जो सामने है, उसके बीच यह विसंगति कभी-कभी भटकाव पैदा करती है। जब मैं किसी महंगे कैफे या रेस्तरां में जाता हूं, तो दुनिया जल नहीं रही होती। जब मैं किसी शॉपिंग मॉल में जाता हूं तो कोई किसी को मार नहीं रहा होता। जब मैं एक आलीशान दफ्तर के भीतर होता हूं तो वहां ‘आतंकवादी’ के नारे लगाने वाली भीड़ नहीं होती।


ई-मेल, एयर-कंडीशनर, बैंक ट्रांसफर जैसी आधुनिक पूंजीवादी दुनिया को चलाने वाली हर चीज सामान्य तरीके से काम कर रही होती है। यह मुझे हर दिन खुद से सवाल करने पर मजबूर करती है: इन दोनों दुनिया में कौन असली है? और, अगर ये दोनों असली हैं तो कब आपस में टकराएंगी? और जब वे टकराएंगी, तो मैं जिंदा रहने के लिए किस हद तक जाऊंगा?

मैं इनमें से किसी भी सवाल का जवाब नहीं जानता। मैं अपनी हड्डियों में ‘विनम्रता’ के उस बोझ को महसूस करता हूं जिसे मैं रोजाना की हिंसा के पागलपन और इसकी वजह से आंखों में उभर आए खून के बावजूद ढोने के लिए मजबूर हूं। जो लोग सुनना चाहते हैं, उनमें से भी ज्यादातर की सहानुभूति से मेरा गहरा मोहभंग हो रहा है। इसलिए अगर मुझे ऊपर दिए गए सवालों में से किसी का जवाब पता भी होता तो भी मैं बड़ी विनम्रता के साथ मुस्कुराते हुए कहता- चलो काम पर वापस चलते हैं।

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