आकार पटेल का लेख: रिहाना-ग्रेटा के ट्वीट पर तो हंगामा, पर इकोनॉमिस्ट के डेमोक्रेसी इंडेक्स पर चुप्पी क्यों!

द इकोनॉमिस्ट ने, “भारत में बोलने से पहले ही सेंसर किए जा रहे लोग” शीर्षक से स्टोरी प्रकाशित की है। इसमें ईदी अमीन के उस बयान का जिक्र है, जिसमें ईदी ने कहा था कि वह बोलने की आजादी का सम्मान करता है, लेकिन बोलने के बाद की आजादी की गारंटी नहीं देता।

फोटो : Getty Images
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आकार पटेल

द इकोनॉमिस्ट एक पत्रिका है, लेकिन यह खुद को अखबार मानती है। करीब 175 साल पुरानी इस पत्रिका की हर सप्ताह 10 लाख से ज्यादा प्रतियां बिकती हैं। इसके पाठकों में पेशेवर, उच्च शिक्षित और उच्च आय वाले लोग हैं। यह दुनिया की उन बहुत कम पत्रिकाओं में से एक है, जिसकी कमाई विज्ञापन की तुलना में सदस्यता से अधिक होती है। यानी इसके पाठक इस पत्रिका में प्रकाशित होने वाली सामग्री के लिए इसे खरीदते हैं। एक वर्ष की सदस्यता की लागत अमेरिका में करीब 15,000 रुपये है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक अंक 300 रुपये है।

पत्रिका आम तौर पर रूढ़िवादी, यानी दक्षिणपंथी दलों से जुड़ी खुले बाजार की नीतियों को बढ़ावा देती है। पत्रिका का शोध और विश्लेषण विभाग इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट कहता है। हर साल यह पत्रिका दुनिया भर से लोकतंत्र को दर्शाने वाले आंकड़े एकत्रित करती है और बताती है कि कौन सा देश लोकतंत्र के पैमाने पर कहां खड़ा है। इस महीने पत्रिका ने 2020 के डेमोक्रेसी इंडेक्स को जारी किया है। आए देखते हैं कि पत्रिका ने भारत के बारे में क्या लिखा है।

इसके मुताबिक हम वैश्विक रैंकिंग में 2015 में 27वें नंबर थे जो कि 2020 में गिरकर 53वें नंबर पर पहुंच गए हैं। द इकोनॉमिस्ट का शोध विभाग कहता है कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि “भारत में 2015 से ही लोकतांत्रिक नियमों पर दबाव डाला जा रहा है और नतीजतन “भारत की रैंकिंग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 27 से फिसलकर 53 पर पहुंच गई है।”

लोकतांत्रिक मूल्यों की यह गिरावट चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक भागीदारी में नहीं आया है, क्योंकि हम सब मानते हैं कि भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है। समस्या तो राजनीतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता से है जिसमें मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार गिरावट आ रही है। जनवरी 2014 में, जब यूपीए शासन के आखिरी महीने चल रहे थे, इकोनॉमिस्ट ने भारत को सर्वाधिक उच्चतम रैंकिंग 7.92 पर रखा था। 2015 में यह अंक गिरकर 7.74, 2017 में 7.23 और 2019 में 6.9 पर पहुंच गए। 2020 में तो भारत के अंक 6.61 पर हैं। इस नाते इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने भारत को एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में वर्गीकृत किया है।

त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र की परिभाषा इकोनॉमिस्ट के मुताबिक ऐसे देश हैं जहां चुनाव तो स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं और (मीडिया की स्वतंत्रता पर पहरे के बाद भी) बुनियादी नागरिक स्वतंत्रता का सम्मान होता है। लेकिन, “लोकतंत्र के अन्य मानकों में जबरदस्त कमजोरी देखी जाती है, मसलन शासन की समस्या, अविकसित राजनीतिक संस्कृति और राजनीति में कम भागीदारी होती है।“

बीते कुछ सालों में भारत में, “मोदी के प्रधानमंत्रित्व में धार्मिक प्रभाव बढ़ा है, जिसके कारण मुस्लिम विरोधी भावनाओं में इजाफा हुआ है, धार्मिक दमन बढ़ा है, और इससे देश के राजनीतिक तानेबाने को नुकसान पहुंचा है।” ध्यान रहे कि यह वह पत्रिका है जिसे दुनिया के शीर्ष कार्पोरेट एक्जीक्यूटिव और नीति निर्धारक पढ़ते हैं। हमारी सरकार ने रिहाना और ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट पर तो तीखी प्रतिक्रिया दी, यहां तक कि हमारे विदेश मंत्रालय तक ने बयान जारी किया, लेकिन द इकोनॉमिस्ट की रैंकिंग में भारत की फिसलती साख पर सन्नाटा है, जबकि इसे कहीं अधिक लोग पढ़ते हैं और ट्वीट के मुकाबले काफी गंभीरता से लेते हैं।

द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित भारत पर स्टोरी का स्क्रीनशॉट
द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित भारत पर स्टोरी का स्क्रीनशॉट

इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट ने कहा है कि दिसबंर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून बनाए जाने के बाद “फरवरी 2020 में राजधानी में दंगे हुए, जिसमें काफी लोगों की जान गई। कानून में नागरिकता को लेकर धर्म को आधार बनाया गया, यह ऐसा कदम है जिसे भारत की धर्मनिरपेक्ष अवधारणा को कम करने की कोशिश माना जाता है।”

पत्रिका ने माना है कि मोदी की लोकप्रियता बरकरार है लेकिन यह जिन आधारों पर बनी हुई है, उन्हें लेकर पत्रिका ने चिंता जाहिर की है। पत्रिका ने कहा है कि मोदी ने उस जगह भूमिपूजन में हिस्सा लिया जहां बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था। पत्रिका कहती है, “मंदिर निर्माण से मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी आधार को और मजबूत करेगा।“ दुर्भाग्य से हमारे लिए यह कोई लोकप्रियता का मुकाबला नहीं है। इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट का कहना है कि, “इसके अलावा सरकार द्वारा कोरोना वायरस से निपटने के तौरतरीकों से भी 2020 में नागरिक स्वतंत्रता में गिरावट आई है।” और अंत में इसने कहा है कि, “इसके बरअक्स बांग्लादेश, भूटान और पाकिस्तान जैसे भारत के कुछ पड़ोसी देशों की रैंकिंग में सुधार हुआ है।”

ऐसे लोग जो समझते हैं कि भारत में सबकुछ ठीकठाक है और बीते सालों में कुछ नहीं बदला है, उन्हें शायद इन मुद्दों को गौर से देखने-समझने की जरूरत है। सबसे पहले इलेक्टोरल बॉन्ड के मुद्दे को देखना होगा। यह ऐसा तरीका है जिसमें कार्पोरेट, और विदेशी इकाइयां तक गुपचुप तरीके से राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं। पाठकों को शायद नहीं मालूम होगा कि बॉन्ड के दो साल पहले जारी होने के बाद से जितने भी बॉन्ड खरीदे गए हैं, उनमें से 90 फीसदी एक करोड़ या अधिक मूल्य वाले बॉन्ड खरीदे गए हैं। यानी, इसे खरीदने वाले सामान्य नागरिक या लोग नहीं हैं जो राजनीतिक दलों को चुपके से चंदा दे रहे हैं।

दूसरी बात यह कि मोदी सरकार ने आरटीआई कानून में बदलाव कर दिया और अब सूचना आयुक्त अपने वेतन के लिए सरकार की शर्तों पर आधारित हो गए हैं। तीसरी बात यह कि संविधान का लगातार उल्लंघन हो रहा है। बिलों को जिस तरह राज्यसभा में मनी बिल की तरह पास कराया जा रहा है वह इसकी मिसाल हैं। जिस तरह कृषि कानूनों को बिना वोटिंग के पास कराया गया, जबकि इन्हें तो मनी बिल के तौर पर भी नहीं पेश किया गया था, उससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत में लोकतंत्र की क्या स्थिति है।

द इकोनॉमिस्ट ने भारत पर एक स्टोरी भी प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है, “भारत में लोगों को टिप्पणी से पहले ही सेंसर किया जा रहा है।” इस स्टोरी में पत्रिका ने ईदी अमीन के वक्तव्य का जिक्र किया है। उगांडा के इस नेता ने कहा था कि वह बोलने की आजादी का सम्मान करता है, लेकिन बोलने के बाद की आजादी की गारंटी नहीं देता। पत्रिका ने कहा है, “भारत की सरकार लगता है इसी बात को एक कदम आगे ले जाना चाहती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठापित होने के बावजूद, इसकी छवि बोलने की आजादी कम करने वाले देश के रूप में बनती जा रही है।” शायद यही कारण है कि उत्तर प्रदेश सरकार सिद्दीकी कप्पन और मध्य प्रदेश सरकार मुव्वर फारुकी को जेल में डाल देती है।

अगर आपको सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर, विराट कोहली, अजय देवगन और अक्षय कुमार जैसों की तरह सिर्फ 6 शब्दों के ट्वीट से गुस्सा आ रहा है तो फिर आपको इस बात पर भी गुस्सा आना चाहिए कि उनकी सर्व सम्मानित और और सम्मानीय आवाज़े क्या कह रही हैं।

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