खरी-खरीः आखिर यह पाकिस्तान, पाकिस्तान का तमाशा क्यों!

सच ये है कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार पूरी तरह से विफल रही है। अब महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यदि वोटर को अपनी आर्थिक दुर्दशा याद रही, तो फिर वह बीजेपी के खिलाफ वोट डालेगा। इसलिए पाकिस्तान की यह रट बहुत सोच समझकर लगी हुई है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

पाकिस्तान, पाकिस्तान, पाकिस्तान! प्रधानमंत्री का भाषण सुनो तो पाकिस्तान। किसी भी टीवी चैनल पर खबर खोलो, तो एंकर गला फाड़कर पाकिस्तान का नारा लगाता नजर आता है। समाचार पत्र खोलो, तो पाकिस्तान! अरे भाई, यह हो क्या रहा है और क्यों हो रहा है! क्या पाकिस्तान भारत पर आक्रमण करने वाला है? क्या भारत को वाकई पाकिस्तान से कोई बड़ा खतरा है! मानिए की कल को पाकिस्तान भारत परआक्रमण कर भी दे, तो क्या भारत का विनाश हो जाएगा?

अरे क्या मजाल कि पाकिस्तान, भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत कर सके। स्वयं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अभी हाल में यह कह चुके हैं कि अगर भारत-पाक युद्ध होता भी है, तो पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ेगी। भाई, जो देश भारतीय सेना के हाथों 1971 के युद्ध में दो टुकड़े हो चुका है, क्या वह देश अब भारत की तरफ आंख उठाकर देख सकता है?

जब पाकिस्तानी फौज ने भारतीय सेना के आगे 1971 में ढाका में आत्मसमर्पण किया था, तो भारत ने 90 हजार पाकिस्तानी फौजियों को बंदी बनाया था। स्पष्ट है कि भारत से युद्ध के नाम पर अब पाकिस्तानी सेना के पांव कांप उठेंगे। पाकिस्तान भारत के विरुद्ध कोई युद्ध करने वाला नहीं है। लेकिन फिर भी पाकिस्तान, पाकिस्तान, पाकिस्तान की गूंज पिछले लोकसभा चुनाव से अब तक भारतीय राजनीति में छाई हुई है। आखिर क्या कारण है कि भारत जैसा महान और महाबली देश पाकिस्तान जैसे ‘पिद्दी न पिद्दी का शोरबा’ जैसे देश की रट लगाता रहे। क्या हमारी कोई समस्या नहीं कि प्रधानमंत्री से लेकर मीडिया तक हर कोई हमारी परेशानियां भूलकर, केवल पाकिस्तान की माला जपते रहें।

कटु सत्य तो यह है कि पिछले तीन महीनों में भारत भीषण आर्थिक समस्या से घिर गया है। भारत की जीडीपी तेजी से गिर रही है। विश्व बैंक के अनुसार इस वर्ष भारत की जीडीपी दर छह प्रतिशत से भी नीचे जा सकती है। रोजगार का यह हाल है कि अकेले एक पार्लेजी बिस्कुट फैक्ट्री ने 10 हजार लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। कार और ट्रक की बिक्री लगभग ठप है। मकानों का कारोबार पिछले पांच सालों से रो रहा है। आए दिन कारखाने बंद हो रहे हैं। इसी सप्ताह हमारे एक उद्योगपति मित्र मिले, हमने पूछा शर्माजी कारोबार कैसा चल रहा है। बोले- ‘पूछो मत, बस कारखाने में रोज छंटनी कर रहे हैं, फिर भी घाटा खत्म नहीं होता’। कुछ रुककर वह बोले, ‘ऐसा बुरा हाल कभी देखा नहीं। अगर यही हाल रहा, तो लूटमार शुरू हो जाएगी।’


अरे, शुरू होगी क्यों, भारत की राजधानी में रोज राह चलते औरतों के जेवर, लोगों के मोबाइल फोन और पर्स छीने जा रहे हैं। हद यह है कि पिछले सप्ताह स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी का पर्स छीन लिया गया। दिल्ली के भरे जनपथ बाजार में एक व्यक्ति के हाथ से मोबाइल फोन लेकर एक मोटरसाइकिल सवार चलता बना। अब चोर भी उचक्के नहीं रहे। वह भी लूटपाट करने मोटरसाइकिल पर सवार होकरआते हैं। जब काम करता नौजवान रोजगार से बेकार होगा और उसके बच्चों की स्कूल की फीस नहीं जाएगी, तो फिर वह चोरी-चकारी पर उतरेगा ही।

एक कारखाने का क्यों रोना! किसानों की खुदकुशी तो पुरानी कहानी हो गई। पर खेती है कि संभलने का नाम ही नहीं लेती। गांव सगे-संबंधियों को फोन कर खेती का हाल पता लगाया, बस रोना शुरू हो गया। अरे बचवा, धान की खड़ी फसल पानी में डूबकर सड़ रही है। तिलहन का हाल बुरा है। समझो, दिवाली भी कोरी चली गई। खेती को इस बार अधिक बरसात ने मार डाला। अब बताइए किसान भी मारा गया। कारोबार तो नोटबंदी के समय से ही रो रहा है। जिधर देखिए उधर एक भीषण समस्या। परंतु न तो प्रधानमंत्री इस संबंध में कोई बात करते हैं, न ही टीवी प्राइम टाइम पर कभी देश की आर्थिक दुर्दशा पर चर्चा होती है। पंजाब महाराष्ट्र बैंक डूब गया। इस लेख के लिखे जाने तक इस बैंक के तीन खाताधारकों ने आत्महत्या कर ली थी। इसका कहीं जिक्र नहीं। बस एक पाकिस्तान है कि जिसकी रट से फुर्सत नहीं मिलती। क्या इसके पीछे कोई रहस्य है!

जी हां, यह पाकिस्तान की रट बहुत सोच-समझकर लगी हुई है। कारण यह है कि देश में चल रही आर्थिक मंदी से अब छोटा-बड़ा और अमीर-गरीब हर व्यक्ति विचलित है। स्पष्ट है कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार पूरी तरह से विफल हो चुकी है। परंतु बीजेपी को चुनाव किसी न किसी तरह जितना है। लोकसभा चुनाव बालाकोट के मुद्दे पर जीत लिया। अब अगले माह महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव हैं। वह भी बीजेपी को जीतने ही हैं। यदि वोटर को अपनी आर्थिक दुर्दशा याद रही, तो फिर तो वह बीजेपी के खिलाफ ही वोट डालेगा। क्योंकि पिछले पांच वर्षों में स्वयं केंद्र और इन दोनों प्रदेशों में बीजेपी का ही शासन है।

स्पष्ट है कि ‘एंटी इन्कम्बन्सी’ के चलते बीजेपी को महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों चुनाव हारने चाहिए। परंतु बीजेपी ने तो हर हाल में चुनाव जीतने का फार्मूला ढूंढ लिया है और वह फार्मूला 2019 के लोकसभा चुनाव के समय से ‘पाकिस्तान’ है। लेकिन इसमें फार्मूला है क्या! दरअसल, पहले पाकिस्तानी हौव्वा खड़ाकर भूखी जनता को डराओ। फिर जनता के ‘अंगरक्षक’ बन जाओ। जनता को मनोवैज्ञानिक स्तर पर लगने लगे कि मोदीजी ही उसके संरक्षक हैं। इस मायाजाल का इतना शोर मचाओ कि जनता अपना दुख-दर्द भूलकर मोदी जैसे संरक्षक के आगे आत्मसमर्पण कर बीजेपी को ही वोट डाल दे।


पर इस मायाजाल को जन-जन तक पहुंचाया कैसे जाए! इस कार्य के लिए मीडिया, विशेषतः टीवी का उपयोग होता है। यदि आप पिछले दो-तीन महीनों में टीवी प्राइम टाइम फॉर्मेट का विश्लेषण करें, तो आपको यह स्पष्ट नजर आ जाएगा कि टीवी पर हर शाम भारत और पाकिस्तान का एक युद्ध जैसा माहौल होता है। टीवी डिबेट में या तो हिंदू-मुस्लिम मुद्दा होता है या फिर भारत-पाक मुद्दा छाया रहता है।

दरअसल बहुत सोच-समझकर एक काल्पनिक युद्ध जैसी स्थिति खड़ी की जाती है। एक ओर हिंदू अथवा भारत पार्टी होती है, तो दूसरी ओर एक मुस्लिम अथवा पाकिस्तानी पार्टी होती है। एंकर बहुत चतुराई से इन दोनों पार्टियों की आपस में बहस करवाता है। एंकर का काम इन दोनों पार्टियों के बीच बहस को अंततः इस चरम सीमा पर पहुंचाना होता है कि प्रोग्राम देखने वाले को लगे कि दोनों के बीच युद्ध हो रहा है। फिर वह (एंकर) प्रोग्राम को इस प्रकार समाप्त करता है कि यह महसूस हो कि हिंदू/भारतीय पार्टी की विजय हो गई। जबकि मुस्लिम/पाकिस्तानी पार्टी की नाक रगड़ दी गई।

इस पूरे कार्यक्रम का उद्देश्य यह होता है कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर टीवी प्रोग्राम देखने वाले हिंदू/भारतीय पार्टी और मुस्लिम/पाकिस्तानी पार्टी में विभाजित हो जाए। उधर एंकर प्रोग्राम देखने वालों की जमात को इतना भड़काता है कि देखने वालों को यह प्रतीत होता है कि वह टीवी के काल्पनिक युद्ध का हिस्सा हैं। अंततः उसको इतना मजा आता है कि जब हिंदू/भारतीय पार्टी की विजय होती है, तो उस पर स्वयं अपनी विजय का नशा छा जाता है। वह अपने आर्थिक कष्ट भूलाकर अपने अंगरक्षक नरेंद्र मोदी की पार्टी का आभारी होकर चुनाव में फूल पर मोहर लगा आता है।

अब आप समझे यह पाकिस्तान, पाकिस्तान, पाकिस्तान का इन दिनों इतना तमाशा क्यों है। जी हां, हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव तक यह काल्पनिक युद्ध ऐसे ही चलता रहेगा। यदि आपने आंख बंद कर वैसे ही वोट डाल दिया, जैसे लोकसभा चुनाव के समय, तो जो थोड़ा-बहुत रोजगार और काम-धंधा बचा है वह भी जाता रहेगा। अंतः होशियार रहिए, पाकिस्तानी मायाजाल से उबरकर अपने और देश के हित में सोचने और वोट डालने की आदत डालिए।

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