जयंती विशेषः ऋषिकेश मुखर्जी की वो 5 फिल्में, जिन्होंने बदल दी हिंदी सिनेमा की तस्वीर
बिमल रॉय के साथ काम करते हुए ऋषिकेश मुखर्जी ने 'दो बीघा जमीन', 'देवदास' और 'मधुमती' फिल्म की एडिटिंग की। इसके बाद दोस्त दिलीप कुमार के कहने पर उन्होंने निर्देशन की ओर कदम बढ़ाया। उनकी पहली फिल्म 'मुसाफिर' 1957 में आई, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई। उनकी फिल्मों में मध्यवर्गीय जीवन की छोटी-छोटी उलझनें, पति-पत्नी के रिश्ते, गहरी दोस्ती, दफ्तर के किस्से और आम इंसान की परेशानियां बेहद खूबसूरती से दिखाई देती थीं। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद कहा था कि वो एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे और उसी दुनिया को सबसे बेहतर समझते थे। यही वजह है कि उनके सिनेमा में आम परिवारों की कहानियां बार-बार देखने को मिलती हैं। उन्होंने करीब 50 फिल्मों का निर्देशन किया और 'आनंद', 'सत्यकाम', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'चुपके चुपके', 'मिली' और 'गोल माल' जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई।
ऋषिकेश मुखर्जी का जन्म 30 सितंबर 1922 को हुआ था। शुरुआत में वह गणित और विज्ञान पढ़ाते थे और उनका सपना कैमरा संभालने का था। फिल्म इंडस्ट्री में आने के लिए उन्होंने लैब असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया। इसके बाद वह एडिटिंग से जुड़े और महान फिल्मकार बिमल रॉय के साथ काम करने का मौका मिला। ऋषिकेश दा ने बिमल रॉय की कई फिल्मों की एडिटिंग की और इसी दौरान फिल्म बनाने की बारीकियां सीखीं। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में बिमल रॉय को अपना 'फिल्मी पिता' बताया था।
बिमल रॉय के साथ काम करते हुए ऋषिकेश मुखर्जी ने 'दो बीघा जमीन'', 'देवदास' और 'मधुमती' जैसी फिल्मों की एडिटिंग की। इसके बाद दोस्त दिलीप कुमार के कहने पर उन्होंने निर्देशन की ओर कदम बढ़ाया। उनकी पहली फिल्म 'मुसाफिर' 1957 में आई, जिसमें एक ही घर में रहने वाले अलग-अलग परिवारों के जरिए जिंदगी के तीन पड़ाव जन्म, शादी और मौत को दिखाया गया था। ऋषिकेश दा ने बाद में बताया था कि लोग उन्हें इस कहानी पर फिल्म बनाने से रोक रहे थे, लेकिन दिलीप कुमार के भरोसे ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
इसके बाद 'अनाड़ी', 'अनुराधा', 'अनुपमा', 'आशीर्वाद', 'सत्यकाम' और 'गुड्डी' जैसी फिल्मों ने उनकी अलग पहचान बना दी। 1971 में आई 'आनंद' ने तो हिंदी सिनेमा में उनकी जगह और मजबूत कर दी। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की इस फिल्म को आज भी दोस्ती और जिंदगी को देखने के अलग नजरिए की कहानी के तौर पर याद किया जाता है। 'आनंद' के लिए ऋषिकेश मुखर्जी को फिल्मफेयर में बेस्ट स्टोरी और बेस्ट एडिटिंग के सम्मान मिले। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
प्रमुख फिल्मेंजो उनके करियर और हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुईं
सत्यकाम- 1969 की 'सत्यकाम' में धर्मेंद्र ने सत्यप्रिय आचार्य का किरदार निभाया था। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जो हर हालत में सच और ईमानदारी के साथ जीना चाहता है। लेकिन जैसे-जैसे वह दुनिया को देखता है, उसे पता चलता है कि हर जगह उसके आदर्शों के हिसाब से चीजें नहीं चलतीं। ऋषिकेश मुखर्जी ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वह इस कहानी से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्हें समाज में बढ़ती गलत चीजों पर गुस्सा आता था और वह फिल्म के जरिए अपनी यह भावना दिखाना चाहते थे। फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी का सम्मान मिला।
आनंद - 1971 में आई इस फिल्म में राजेश खन्ना ने आनंद सहगल और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर का किरदार निभाया था। कहानी ऐसे व्यक्ति की है जिसे पता है कि उसकी जिंदगी बहुत लंबी नहीं है, लेकिन वह अपने बचे हुए समय को दुख में बिताने के बजाय हर पल खुशी से जीना चाहता है। दूसरी तरफ डॉक्टर भास्कर जिंदगी और मौत को बहुत गंभीर नजर से देखते हैं। दोनों के बीच हुई दोस्ती से भास्कर की सोच बदलती है। 'बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' जैसे फिल्म के डायलॉग आज भी याद किए जाते हैं। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी का सम्मान मिला और फिल्मफेयर में भी बेस्ट फिल्म, बेस्ट कहानी, बेस्ट एडिटिंग और कई दूसरे पुरस्कार मिले।
बावर्ची- 1972 में आई 'बावर्ची' में राजेश खन्ना ने रघु का किरदार निभाया था। वह एक ऐसे घर में बावर्ची बनकर आते हैं जहां परिवार के लोग छोटी-छोटी बातों पर आपस में उलझते रहते हैं। खाना कौन बनाएगा, घर का कौन सा काम कौन करेगा और किस बात पर किससे नाराज होना है, इन्हीं चीजों में पूरा परिवार उलझा रहता है। रघु धीरे-धीरे अपने अच्छे व्यवहार से घर का माहौल बदल देता है। जया भादुड़ी, असरानी, ए.के. हंगल और दुर्गा खोटे जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा थे। यह उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही। ऋषिकेश ने इस फिल्म के जरिए परिवार के साथ रहने की अहमियत समझाई।
अभिमान - 1973 की 'अभिमान' में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने पति-पत्नी का किरदार निभाया है। सुबीर एक सफल गायक है और उसकी पत्नी उमा भी बहुत अच्छा गाती है। शुरुआत में सुबीर ही उमा को गाने के लिए आगे बढ़ाता है, लेकिन जब उमा की लोकप्रियता उससे ज्यादा होने लगती है तो पति के मन में जलन और अहंकार आने लगता है। यहीं से उनके रिश्ते में परेशानी शुरू होती है। फिल्म की कहानी में पति-पत्नी के बीच बराबरी और सफलता को लेकर पैदा होने वाली परेशानी को दिखाया गया था। फिल्म में अमिताभ, जया, बिंदू और असरानी जैसे कलाकार थे। यह उस वक्त की बड़ी सफल फिल्मों में शामिल थी।
मिली- 1975 आई इस फिल्म में जया बच्चन ने मिली का किरदार निभाया था और अमिताभ बच्चन उनके साथ नजर आए। मिली एक खुशमिजाज लड़की है, लेकिन उसे गंभीर बीमारी है। वह अपने आसपास के लोगों में खुशियां बांटती है, जबकि उसकी अपनी जिंदगी मुश्किलों से भरी है। फिल्म में बीमारी के साथ प्यार और उम्मीद को बहुत आसान तरीके से दिखाया गया। ऋषिकेश मुखर्जी ने बताया था कि इस कहानी का विचार उन्हें एक ऐसी लड़की की कहानी से मिला था जिसे गंभीर बीमारी थी। उन्होंने कहानी को फिल्म के जरिए उतारा।
ऋषिकेश दा की फिल्मों की खासियत यह थी कि वह छोटे से छोटे किरदार को भी महत्व देते थे। 'आनंद' को लेकर उन्होंने कहा था कि फिल्म में हर किरदार जरूरी है, ठीक वैसे ही जैसे एक परिवार में हर सदस्य की अपनी जगह होती है। इसी सोच की वजह से उनकी फिल्मों में मुख्य कलाकारों के साथ सहायक कलाकार भी याद रह जाते हैं।
'बावर्ची', 'अभिमान', 'नमक हराम', 'मिली', 'चुपके चुपके', 'गोलमाल' और 'खूबसूरत' जैसी फिल्मों ने उनके करियर को और मजबूत किया। वह गंभीर कहानियों के साथ कॉमेडी भी उसी सहज अंदाज में बना सकते थे। 'गोलमाल' और 'खूबसूरत' इसकी बड़ी मिसाल हैं। उनकी फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवार और रोजमर्रा की जिंदगी बार-बार दिखाई देती थी, क्योंकि वह खुद भी इसी दुनिया को सबसे करीब से समझते थे।
अपने लंबे करियर में ऋषिकेश मुखर्जी ने करीब 50 फिल्मों का निर्देशन किया। उन्हें 2000 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मानों में से एक दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आखिरी दौर में उन्होंने फिल्मों के साथ टेलीविजन पर भी काम किया और करीब 84 सीरियल एपिसोड निर्देशित किए। ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्मों के अलावा 'तलाश', 'हम हिंदुस्तानी' और 'उजाले की ओर' जैसे टीवी धारावाहिकों का भी निर्देशन किया था। 1998 में 'झूठ बोले कौवा काटे' के साथ उन्होंने लंबे अंतराल के बाद फिल्म निर्देशन में वापसी की थी।
27 अगस्त 2006 को 83 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी फिल्मों के किरदार और उनकी बनाई दुनिया आज भी दर्शकों के बीच जिंदा है।
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