जयंती स्मरण: मुंशी प्रेमचंद, इक्कीसवीं सदी और आज का भारत

प्रेमचंद के किसान होरी की त्रासदी आज भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। ऋण का स्वरूप बदल गया है, साहूकार की जगह बैंक, माइक्रोफाइनेंस कंपनियां और कॉरपोरेट संरचनाएं आ गई हैं, लेकिन आर्थिक असुरक्षा समाप्त नहीं हुई।

मुंशी प्रेमचंद की पुरानी तस्वीर
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31 जुलाई केवल हिंदी-उर्दू के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती भर नहीं है; यह भारतीय समाज के आत्मावलोकन का भी दिन है। प्रेमचंद उन विरल रचनाकारों में हैं जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ क्षीण नहीं हुई, बल्कि और अधिक गहरी हुई है। उनकी रचनाएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत सामाजिक दस्तावेज हैं। किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, निम्न मध्यवर्ग, बेरोजगार युवा, नौकरशाही, धर्म, राजनीति और नैतिकता—ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसे प्रेमचंद ने अपनी दृष्टि से अछूता छोड़ा हो। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही में हुआ था और आज भी उन्हें "उपन्यास सम्राट" के रूप में स्मरण किया जाता है।

प्रेमचंद का साहित्य उस भारत का आख्यान है जो औपनिवेशिक शासन, सामंती शोषण और सामाजिक विषमता से जूझ रहा था। इक्कीसवीं सदी का भारत औपचारिक रूप से स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और तकनीकी दृष्टि से कहीं अधिक विकसित है, किंतु यदि सामाजिक संरचनाओं का परीक्षण किया जाए तो अनेक प्रश्न आज भी वही हैं जिनसे प्रेमचंद का साहित्य जूझता दिखाई देता है। इसलिए प्रेमचंद को पढ़ना केवल अतीत का अध्ययन नहीं, वर्तमान को समझने का भी एक सशक्त माध्यम है।

प्रेमचंद ने साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं माना। उनके लिए साहित्य मनुष्य की चेतना का विस्तार था। वे लिखते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण भर नहीं, उसका पथप्रदर्शक भी होना चाहिए। इसीलिए उनके कथा-संसार में आदर्शवाद और यथार्थवाद का संतुलन दिखाई देता है। वे मनुष्य की पीड़ा को केवल चित्रित नहीं करते, उसके कारणों की पहचान भी करते हैं।

आज का भारत तीव्र आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का भारत है। लेकिन इसी भारत में किसानों की आत्महत्याएं, बेरोजगारी, बढ़ती आर्थिक असमानता, शिक्षा और स्वास्थ्य का बाजारीकरण, सांप्रदायिक तनाव, जातीय हिंसा तथा पर्यावरणीय संकट भी मौजूद हैं। प्रेमचंद के किसान होरी की त्रासदी आज भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। ऋण का स्वरूप बदल गया है, साहूकार की जगह बैंक, माइक्रोफाइनेंस कंपनियां और कॉरपोरेट संरचनाएं आ गई हैं, लेकिन आर्थिक असुरक्षा समाप्त नहीं हुई।

'गोदान' में होरी केवल एक व्यक्ति नहीं, भारतीय कृषक जीवन का प्रतीक है। आज भी खेती लाभ का नहीं, जोखिम का व्यवसाय बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत, बाजार की अनिश्चितता और भूमि के छोटे होते आकार ने किसान की चुनौतियों को और जटिल बनाया है। प्रेमचंद की दृष्टि से देखें तो समस्या केवल कृषि की नहीं, न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था की भी है।

इसी प्रकार 'रंगभूमि' का सूरदास सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के सामने खड़े उस सामान्य मनुष्य का प्रतिनिधि है जिसकी आवाज़ विकास की चमक में दब जाती है। इक्कीसवीं सदी में भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, औद्योगिक परियोजनाएँ और शहरी विस्तार अनेक बार इसी प्रश्न को नए रूप में सामने लाते हैं कि विकास किसके लिए और किस कीमत पर?


प्रेमचंद का स्त्री-विमर्श भी उल्लेखनीय है। 'निर्मला', 'सेवासदन' और अनेक कहानियों में उन्होंने स्त्री की सामाजिक पराधीनता, दहेज, बाल विवाह और पितृसत्ता की निर्ममता को उजागर किया। आज स्त्रियों की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पहले से कहीं अधिक है, परंतु लैंगिक हिंसा, घरेलू उत्पीड़न, वेतन असमानता और सामाजिक पूर्वाग्रह अब भी मौजूद हैं। इस दृष्टि से प्रेमचंद का स्त्री-विमर्श केवल ऐतिहासिक महत्व का नहीं, समकालीन विमर्श का भी आधार है।

जाति का प्रश्न प्रेमचंद के साहित्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 'सद्गति', 'ठाकुर का कुआँ', 'कफन' और अन्य रचनाओं में उन्होंने सामाजिक बहिष्कार, अपमान और असमानता को गहरी मानवीय संवेदना के साथ चित्रित किया। संविधान ने समानता का अधिकार दिया, सामाजिक चेतना भी विकसित हुई, लेकिन जाति आज भी भारतीय लोकतंत्र, राजनीति और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करती है। प्रेमचंद इस प्रश्न को नैतिक और मानवीय दृष्टि से देखते हैं; यही उनकी स्थायी शक्ति है।

धर्म और सांप्रदायिकता के प्रश्न पर भी प्रेमचंद की दृष्टि अत्यंत संतुलित थी। वे धार्मिक आस्था के विरोधी नहीं थे, लेकिन धर्म के राजनीतिक उपयोग और अंधविश्वास के आलोचक थे। आज जब पहचान की राजनीति और धार्मिक ध्रुवीकरण सार्वजनिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, प्रेमचंद की मानवीय दृष्टि पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उनके लिए मनुष्य की गरिमा किसी भी धार्मिक या राजनीतिक पहचान से बड़ी थी।

प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे सत्ता के नहीं, समाज के लेखक हैं। वे किसी विचारधारा के प्रचारक नहीं, मनुष्य की गरिमा के पक्षधर हैं। इसलिए उनके पात्र पूर्णतः देवता या खलनायक नहीं होते। उनमें मानवीय दुर्बलताएँ भी हैं और नैतिक संघर्ष भी। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी जीवंत प्रतीत होता है।

इक्कीसवीं सदी के भारत में सूचना-प्रौद्योगिकी ने अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं। सोशल मीडिया ने संवाद को लोकतांत्रिक भी बनाया है और अनेक बार सतही भी। सूचना की तीव्रता ने विचार की गहराई को चुनौती दी है। ऐसे समय में प्रेमचंद का साहित्य धैर्य, संवेदना और विवेक की शिक्षा देता है। वे हमें सिखाते हैं कि समाज को समझने के लिए आँकड़ों से अधिक मनुष्य को पढ़ना आवश्यक है।

आज शिक्षा भी रोजगार-केंद्रित होती जा रही है। साहित्य और मानवीय अध्ययन को अक्सर अनुपयोगी समझा जाता है। प्रेमचंद इस सोच का सबसे प्रभावी प्रतिवाद हैं। उनका साहित्य बताता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल सकल घरेलू उत्पाद से नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संवेदना, न्याय और मानवीयता से मापी जाती है।

प्रेमचंद का राष्ट्रवाद भी उल्लेखनीय है। उसमें किसी प्रकार की आक्रामकता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों का आग्रह है। वे ऐसे भारत का स्वप्न देखते हैं जहाँ मनुष्य की पहचान उसकी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति से नहीं, उसके मनुष्य होने से हो। आज जब लोकतंत्र अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, प्रेमचंद का यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है।


प्रेमचंद की भाषा उनकी सबसे बड़ी ताकतों में है। उन्होंने हिंदी और उर्दू की साझा लोकभाषा को साहित्य की प्रतिष्ठित भाषा बनाया। उनकी भाषा में कृत्रिम अलंकरण नहीं, जीवन की सहजता है। आज जबकि भाषा भी वैचारिक खेमों में बाँटने का प्रयास किया जाता है, प्रेमचंद का भाषिक दृष्टिकोण भारतीय बहुलता और साझी सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाता है।

प्रेमचंद को केवल श्रद्धांजलि देने से उनका सम्मान पूरा नहीं होता। उनकी जयंती का वास्तविक अर्थ है—उनके उठाए प्रश्नों से संवाद करना। क्या हमारा विकास न्यायपूर्ण है? क्या लोकतंत्र वास्तव में सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुँचा है? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं? क्या हम मनुष्य को उसकी गरिमा के साथ देख पा रहे हैं? ये प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्रेमचंद के समय थे।

प्रेमचंद का साहित्य हमें निराशा नहीं, नैतिक साहस देता है। वे बताते हैं कि समाज परिवर्तन केवल सत्ता से नहीं, संवेदना, विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी से भी संभव होता है। इसलिए इक्कीसवीं सदी का भारत यदि अधिक मानवीय, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक न्यायपूर्ण बनना चाहता है, तो उसे प्रेमचंद को केवल पाठ्यक्रम में नहीं, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक चेतना में भी पुनः पढ़ना होगा।

मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उन्हें स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि हम उनकी रचनाओं को अतीत का संग्रहालय न मानें, बल्कि वर्तमान का जीवित दस्तावेज़ समझें। समय बदल गया है, तकनीक बदल गई है, अर्थव्यवस्था बदल गई है, लेकिन मनुष्य की गरिमा, न्याय और समानता के प्रश्न अब भी वही हैं। इसी कारण प्रेमचंद केवल अपने समय के लेखक नहीं, हमारे समय के भी सबसे विश्वसनीय साहित्यिक साक्षी हैं।