नहीं रहीं शीला संधू : हिंदी साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाने वाली कर्मठ महिला

हिंदी साहित्य को आम लोगों तक सुलभ कराने में शीला जी के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। राजकमल प्रकाशन के माध्यम से बड़े-बड़े साहित्यकारों की रचनाओं को आमजन के बीच लोकप्रिय बनाने में शीला संधू ने जिस जीवट से काम किया, वह सदा याद किया जाएगा।

फोटो :सोशल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

शीला संधू नहीं रहीं। हिंदी प्रकाशन के शुरुआती दौर में स्तरीय साहित्य सुरुचिपूर्ण तरीके से छापने, पेपर बैक किताबों को भी राजकमल प्रकाशन की तहत बेहतरीन कलेवर में जाने-माने चितेरों से आवरण बनवा कर बाज़ार में उपलब्ध कराने में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

जब 80 के दशक में मैंने टाइम्स समूह की हिंदी महिला पत्रिका वामा लांच की तब हमारा दफ्तर दरियागंज में हुआ करता था। वहीं राजकमल प्रकाशन भी था। शीला जी का स्नेह और भरपूर सहारा जो मुझे तब मिला वह आज भी याद है। हर दोपहर उनका प्रकाशन के आफिस में दरबार लगता था और बहुतेरे महत्वाकांक्षी हिंदी सिपहसालार और दरबारी वहां नियमित जाते थे। दरबारबाज़ी मेरे स्वभाव के अनुकूल न थी, सो वहां तो नहीं, पर साहित्यिक जमावड़ों में उनसे मिलती रहती थी।

देवराज द्वारा 1947 में स्थापित राजकमल प्रकाशन समूह एक प्राइवेट लिमिटेड संस्था है। किसी की निजी या पैतृक संपत्ति नहीं रही, इसका स्वामित्व शेयरों के आधार पर निर्धारित होता था। शुरू में में इसका स्वामित्व अरुणा आसफ अली के पास था। जब वे प्रकाशन को लेकर कठिनाई महसूस कर रही थीं, तभी शीला संधू के पति हरदेव संधू ने उनसे इस प्रकाशन के अधिकांश शेयर खरीद लिये। शीला जी ने अप्रैल 1965 में प्रबंध निदेशक का पद सँभाला। लोगों को लगा था कि शीला संधू के राजकमल का प्रबंध निदेशक होने से यह प्रकाशन संस्थान बंद हो जाएगा, लेकिन अपनी कर्मठता एवं दृढ़ संकल्पशीलता से शीला संधू ने न केवल यह आशंका दूर की, बल्कि सुमित्रानंदन पंत, भगवती चरण वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, शिवमंगल सिंह सुमन, बाबा नागार्जुन और फणीश्वरनाथ रेणु का विश्वास भी अर्जित किया और इस प्रकार राजकमल का विस्तार किया।


हिंदी लेखकों की तंगदस्ती से परिचित शीला संधू हस्तलिखित पांडुलिपियां स्वीकार करती थीं। उन्हें टाइप किया जाता था, फिर उससे लेटर प्रेस में प्रूफ बनाया जाता और तब लेखक उन पर अपनी अनुशंसा देते। लेखकों से पुस्तकों के मुख्यांश, विज्ञापन तथा कवर के लिए संपर्क किया जाता। लेखकों को कभी भी उनकी पुस्तक के प्रकाशन की प्रक्रिया में भाग लेने से हतोत्साहित नहीं किया जाता था। रॉयल्टी नियमित मिलती थी, ज़रूरतमंद लेखकों को यथासंभव अग्रिम भुगतान भी।

30 वर्ष तक इस प्रकाशन संस्थान के सफल संचालन के बाद शीला संधू इससे अलग हुईं । लंबे समय से वे शैयागत थीं। और उनकी बेटी तान्या से बीच बीच में जो हालचाल मिलते रहे वे इस कर्मठ, हंसमुख और बुद्धिमती महिला के संदर्भ में तकलीफदेह थे। रोग के भवजाल से वे मुक्त हुईं। हिंदी प्रकाशन, हम लेखक और आलोचक उनके चिरऋणी हैं । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।

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