विजयदान देथा: लोककथा के भीतर छिपे आधुनिक मनुष्य की खोज

आज मशहूर साहित्यकार विजयदान देथा की जन्मशती है। आखिर वह क्या है जो देथा को आधुनिक साहित्य से अलग करता है।

प्रसिद्ध कथाकार  विजयदान देथा
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विजयदान देथा को हिंदी साहित्य में प्रायः राजस्थान की लोककथाओं को आधुनिक रूप देने वाले कथाकार के रूप में याद किया जाता है। यह पहचान सही होते हुए भी उनके रचनात्मक महत्त्व को पूरा व्यक्त नहीं करती। देथा का वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने लोककथा को केवल संरक्षित नहीं किया, उसका पुनर्सृजन किया। उन्होंने लोक-स्मृति में सुरक्षित कथाओं को आधुनिक संवेदना, आधुनिक प्रश्नाकुलता और आधुनिक मनुष्य की आकांक्षाओं से जोड़ा। इस प्रक्रिया में उनकी कहानियां अतीत की कथाएं न रहकर अपने समय और हमारे समय के बीच संवाद करने वाली रचनाएं बन गईं।

देथा के सामने मूल प्रश्न यह नहीं था कि लोककथा को साहित्य में किस तरह बचाया जाए, बल्कि यह था कि लोक के भीतर मनुष्य ने अपने अनुभवों, इच्छाओं और प्रतिरोधों को किस तरह बचाकर रखा है। इसलिए उनकी कहानियों में लोक केवल विषय नहीं है; वह जीवन-दृष्टि है। लोकपात्र केवल पात्र नहीं हैं; वे उन लोगों की सामूहिक कल्पना के प्रतिनिधि हैं जिनकी आवाज इतिहास और सत्ता के औपचारिक दस्तावेजों में बहुत कम दर्ज हुई।

विजयदान देथा का रचनाकाल स्वतंत्रता के बाद का वह समय था जब भारतीय समाज औपनिवेशिक शासन से मुक्त होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रवेश कर रहा था, लेकिन सामाजिक जीवन पर सदियों पुरानी सामंती और जातिगत संरचनाओं की पकड़ बनी हुई थी। राजस्थान का ग्रामीण समाज विशेष रूप से इस संक्रमण को तीव्रता से अनुभव कर रहा था। राजसत्ता समाप्त हो रही थी, लेकिन सामंती मानसिकता तत्काल समाप्त नहीं हुई। जाति सामाजिक संबंधों का महत्त्वपूर्ण नियामक बनी हुई थी। स्त्री के लिए परिवार और सामाजिक मर्यादा की सीमाएं कठोर थीं। आर्थिक विषमता और संसाधनों पर प्रभुत्व के पुराने रूप मौजूद थे।

देथा ने इसी संक्रमणशील समाज को अपनी कथा का आधार बनाया। लेकिन उन्होंने समाजशास्त्रीय रिपोर्ट नहीं लिखी। उन्होंने लोककथा का सहारा लिया। यही उनकी रचनात्मक रणनीति थी।

लोककथा में राजा, रानी, भूत, चुड़ैल, चोर, व्यापारी, किसान, चरवाहा, साधु, स्त्री और गरीब आदमी आते हैं। देखने में ये सब पारंपरिक पात्र हैं। लेकिन देथा के हाथ में पहुँचते ही इनके अर्थ बदलने लगते हैं। राजा सत्ता का प्रतिनिधि होने के बावजूद मूर्ख हो सकता है, गरीब आदमी अपनी बुद्धि से शक्तिशाली को परास्त कर सकता है, स्त्री पुरुष से अधिक स्वतंत्र और विवेकशील हो सकती है और भूत मनुष्य से अधिक मानवीय सिद्ध हो सकता है।

यही उलटाव देथा की कथा-दृष्टि का केंद्रीय तत्व है।

उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘दुविधा’ को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। कहानी की लोकभूमि में एक व्यापारी परिवार, नवविवाहिता स्त्री और एक भूत की कथा है। किंतु कहानी की वास्तविक शक्ति भूत के अस्तित्व में नहीं, उस सामाजिक दुविधा में है जो स्त्री की इच्छा और सामाजिक व्यवस्था के बीच पैदा होती है। विवाह यहां केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, सामाजिक संस्था और नैतिक नियंत्रण की व्यवस्था है। भूत इस व्यवस्था के बाहर स्थित उस आकांक्षा का रूपक बन जाता है जिसे समाज स्वीकार नहीं करता।

कहानी का आकर्षण इसीलिए केवल रहस्य या लोकविश्वास से नहीं पैदा होता। वह पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि सामाजिक रूप से स्वीकृत संबंध और मानवीय रूप से सार्थक संबंध क्या हमेशा एक ही होते हैं?

यहीं देथा लोककथा को आधुनिक बनाते हैं।


उन्होंने लोककथा की नैतिकता को जस का तस स्वीकार नहीं किया। वे उसके भीतर छिपे प्रश्न को खोजते हैं। यह फर्क अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। परंपरा को दोहराना और परंपरा की रचनात्मक पुनर्व्याख्या करना एक बात नहीं है। देथा का काम दूसरी श्रेणी का है।

‘दुविधा’ में स्त्री की इच्छा को केंद्र में लाने से कथा का अर्थ बदल जाता है। वह केवल पति-पत्नी या मनुष्य-भूत की कहानी नहीं रहती। वह स्त्री की स्वायत्तता, देह, प्रेम और सामाजिक मर्यादा के प्रश्नों से जुड़ जाती है। इसीलिए आज भी इसे पढ़ते हुए समकालीन स्त्री-विमर्श की अनेक समस्याएँ सामने आती हैं।

देथा की स्त्रियां उनकी कथा-दृष्टि का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। लोककथाओं में स्त्री अक्सर इच्छा, सौंदर्य, छल, त्याग या परीक्षा की वस्तु बनाकर प्रस्तुत की जाती रही है। देथा इस संरचना को कई जगह उलट देते हैं। उनकी स्त्री केवल पुरुष की कथा में उपस्थित चरित्र नहीं रहती, बल्कि अपनी इच्छा और निर्णय वाली स्वतंत्र सत्ता बनती है।

उनकी कहानियों में जाति और सामाजिक हैसियत का प्रश्न भी इसी तरह अप्रत्यक्ष रूप से आता है। देथा किसी घोषणात्मक सामाजिक यथार्थवाद के कथाकार नहीं हैं। वे जाति-व्यवस्था पर निबंध नहीं लिखते। लेकिन उनके पात्रों के बीच संबंधों में सामाजिक ऊंच-नीच की संरचना बार-बार उपस्थित होती है। लोक की दुनिया में जो व्यक्ति सामाजिक सीढ़ी के नीचे है, वह कई बार नैतिक और बौद्धिक स्तर पर ऊपर दिखाई देता है। और जो व्यक्ति पद, धन या सत्ता से ऊपर है, वह अपनी मनुष्यता में छोटा सिद्ध हो सकता है।

यह मूल्य-व्यवस्था का उलटाव है।

इसी कारण देथा के यहां लोक लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में दिखाई देता है। लोक के पास औपचारिक सत्ता नहीं है, लेकिन उसके पास कहानी है। वह कहानी के माध्यम से राजा का मजाक उड़ा सकता है, सामंती अहंकार को नंगा कर सकता है और शक्तिशाली को कठघरे में खड़ा कर सकता है। लोककथा इस अर्थ में जनता की वैकल्पिक स्मृति है।

देथा ने इसी वैकल्पिक स्मृति को आधुनिक साहित्य की शक्ति में बदला।

‘बातां री फुलवारी’ का महत्त्व इसी संदर्भ में विशेष है। यह केवल लोककथाओं का संग्रह नहीं है। यह राजस्थान के सामाजिक जीवन, लोकविश्वास, मानवीय संबंधों, हास्य, व्यंग्य और कल्पनाशीलता का विस्तृत संसार है। यहां कथा कहने की परंपरा स्वयं साहित्यिक अनुभव का हिस्सा बन जाती है। कथाकार पाठक को केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसे उस लोक-संसार में ले जाता है जहां भाषा, मुहावरा, लोकबुद्धि और अनुभव मिलकर अर्थ बनाते हैं।

देथा की भाषा पर अलग से बात करना इसलिए आवश्यक है कि उनकी आधुनिकता का एक बड़ा हिस्सा उनकी भाषा में ही निर्मित होता है।

उन्होंने लोकभाषा को हिंदी की ‘अशुद्ध’ या ‘अपरिष्कृत’ सीमा से निकालकर साहित्य की रचनात्मक शक्ति बनाया। मारवाड़ी की लय, कहावतें, मुहावरे और बोलचाल उनकी कथाओं को उस जीवन के निकट ले जाते हैं जिससे वे पैदा हुई हैं। यह केवल भाषिक प्रामाणिकता का मामला नहीं है। लोकभाषा के साथ लोक की दृष्टि भी आती है।


मानक साहित्यिक भाषा कई बार सत्ता और शिक्षित वर्ग की भाषा बन जाती है। लोकभाषा उस केंद्रीकरण को तोड़ती है। वह अपने साथ उन लोगों का अनुभव लाती है जिनकी दुनिया साहित्य के केंद्रीय आख्यानों में कम दिखाई देती रही है।

इसलिए देथा का लोकभाषा प्रयोग स्वयं एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। देथा सीधे उपदेश नहीं देते। वे कई बार ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जिसमें व्यवस्था स्वयं हास्यास्पद दिखाई देने लगती है। राजा की मूर्खता, पंडित की चालाकी, व्यापारी की लालच, सामंती व्यक्ति का अहंकार या सामाजिक नैतिकता का दोहरापन—इन सबको वे लोक के हास्य के माध्यम से पकड़ते हैं।

यह हास्य निष्क्रिय मनोरंजन नहीं है। इसके भीतर सत्ता-विरोध की ऊर्जा है।

‘चरनदास चोर’ को इसी परंपरा में पढ़ा जा सकता है। चोर सामान्यतः अपराधी और नैतिक रूप से निम्न व्यक्ति माना जाता है। लेकिन देथा का चरनदास अपनी दुनिया की नैतिकता को उलट देता है। वह चोरी करता है, पर उसके भीतर कुछ ऐसे मानवीय मूल्य हैं जो तथाकथित सम्मानित समाज के पात्रों में नहीं मिलते। इस तरह चोर और सज्जन, अपराध और नैतिकता, कानून और न्याय के बीच स्थापित सरल विभाजन टूटने लगता है।

देथा यहां एक असुविधाजनक प्रश्न खड़ा करते हैं—क्या कानूनन अपराधी व्यक्ति नैतिक रूप से भी अपराधी होता है? और क्या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति अनिवार्य रूप से नैतिक होता है?

यह प्रश्न आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।

आज हमारे समाज में कानून, सत्ता, धन और नैतिकता के बीच संबंधों को लेकर लगातार बहस होती है। भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण, आर्थिक अपराध, संस्थागत पक्षपात और सामाजिक प्रतिष्ठा के अनेक उदाहरण बताते हैं कि ‘सम्मानित’ होना और ‘नैतिक’ होना दो अलग बातें हैं। देथा की लोककथा इस फर्क को बहुत पहले पहचान चुकी थी।

यहीं से देथा की कहानियों का आधुनिक जीवन से तादात्म्य स्थापित होता है।

आज का समाज तकनीकी रूप से देथा के समय से बिल्कुल अलग है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक बाजार और महानगरीय जीवन ने मनुष्य के अनुभव को बदल दिया है। लेकिन मनुष्य की बुनियादी दुविधाएं समाप्त नहीं हुईं। प्रेम और सामाजिक स्वीकृति का संघर्ष अब भी है। स्त्री की स्वतंत्रता पर नियंत्रण अब भी है। जाति और समुदाय की सीमाएं अब भी हैं। धन और सत्ता के सामने सामान्य मनुष्य की असहायता अब भी है। सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत इच्छा का संघर्ष भी बना हुआ है।

सिर्फ उनकी अभिव्यक्तियाँ बदल गई हैं।

जिस सामाजिक नियंत्रण को देथा के समय में परिवार, जाति और गांव की पंचायत लागू करती थी, उसके नए रूप आज सोशल मीडिया, भीड़ की राय, डिजिटल निगरानी और सार्वजनिक चरित्र-निर्णय में दिखाई दे सकते हैं। तब सामाजिक बहिष्कार गाँव में होता था; आज वह डिजिटल दुनिया में भी संभव है। तब लोक-अपवाद किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से अकेला कर सकता था; आज वायरल अफवाह वही काम कहीं अधिक तेजी से कर सकती है।

इस दृष्टि से देथा का लोकविश्वास और हमारा डिजिटल विश्वास उतने दूर नहीं हैं जितने पहली नजर में दिखाई देते हैं। दोनों में अफवाह, सामूहिक कल्पना और सामाजिक स्वीकृति की शक्ति काम करती है।


देथा की कहानियों का आधुनिक पाठ इसलिए हमें केवल अतीत में नहीं ले जाता, बल्कि वर्तमान की ओर वापस लौटाता है।

उनके साहित्य में ‘मनुष्य’ कोई तैयार अवधारणा नहीं है। वह संघर्ष में बनता है। उसकी मनुष्यता उसकी सामाजिक स्थिति से तय नहीं होती, बल्कि उसके व्यवहार, इच्छा, संवेदना और दूसरे मनुष्य के प्रति उसके संबंध से बनती है। यही कारण है कि देथा का साहित्य लोक से निकलकर मनुष्य तक पहुँचता है।

उनकी कथा-प्रक्रिया को ‘पुनर्लेखन’ कहना भी कुछ हद तक अपर्याप्त है। वे लोककथा का पुनर्लेखन नहीं, पुनर्रचना करते हैं। मूल कथा में वे आधुनिक प्रश्न डालते हैं, लेकिन उसे आधुनिक कहानी की तरह सपाट नहीं बनाते। उनके यहां यथार्थ और फैंटेसी के बीच कोई कठोर दीवार नहीं रहती।

यह उनकी आधुनिकता का विशिष्ट रूप है।

आधुनिकता का अर्थ केवल यथार्थवादी होना नहीं है। मनुष्य की गहरी सच्चाइयाँ कई बार मिथक और कल्पना के माध्यम से अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त होती हैं। देथा ने इस संभावना को पहचाना। उन्होंने भूत को सामाजिक प्रश्न बनाने के लिए इस्तेमाल किया, चोर को नैतिक प्रश्न बनाने के लिए, राजा को सत्ता का प्रश्न बनाने के लिए और लोककथा को मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रश्न बनाने के लिए।

इसलिए यह पूछना कि क्या विजयदान देथा ने अपने समय के मनुष्यों को ‘नया रूप’ दिया, साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत सार्थक प्रश्न है।

जिस समाज में गरीब व्यक्ति को केवल दया का पात्र समझा जाता है, वहां उसे बुद्धिमान और निर्णायक पात्र बनाना सामाजिक कल्पना को बदलता है। जिस समाज में स्त्री की इच्छा को नियंत्रित किया जाता है, वहां उसकी इच्छा को कथा का केंद्रीय प्रश्न बनाना सामाजिक कल्पना को बदलता है। जिस समाज में सत्ता को स्वाभाविक मान लिया जाता है, वहाँ राजा को हास्यास्पद बनाना सत्ता की छवि बदलता है।

इस अर्थ में देथा ने मनुष्य को नया रूप दिया। उन्होंने वास्तविकता को नहीं, वास्तविकता को देखने की हमारी दृष्टि को बदला। यही किसी बड़े लेखक की सबसे गहरी सामाजिक भूमिका है।

विजयदान देथा की कहानियां इसलिए आज भी प्रासंगिक हैं कि वे हमें किसी निश्चित राजनीतिक निष्कर्ष की ओर नहीं धकेलतीं, बल्कि हमारी सहज मान्यताओं पर संदेह करना सिखाती हैं। वे पूछती हैं कि जिसे हम नैतिक कहते हैं, वह किसके लिए नैतिक है? जिसे हम मर्यादा कहते हैं, उसकी कीमत कौन चुकाता है? जिसे हम प्रतिष्ठा कहते हैं, उसके पीछे किसकी इच्छा दबाई जाती है? जिसे हम अपराध कहते हैं, क्या वह हर बार अन्याय भी है? और जिसे हम व्यवस्था कहते हैं, क्या वह हमेशा न्यायपूर्ण होती है?

इन प्रश्नों की वजह से देथा की कहानियां समय से बाहर नहीं जातीं।

आज भी मनुष्य प्रेम करना चाहता है और समाज उसे नियंत्रित करता है। आज भी व्यक्ति अपनी पहचान से बाहर निकलना चाहता है और व्यवस्था उसे परिभाषित करना चाहती है। आज भी सत्ता अपने को स्वाभाविक मानती है और लोक उसे प्रश्नांकित करता है। आज भी सामाजिक प्रतिष्ठा और मानवीयता के बीच दूरी है। इसलिए विजयदान देथा को पढ़ना अतीत को पढ़ना नहीं है।

यह अपने वर्तमान की उन अदृश्य संरचनाओं को पहचानना है जिनमें हम स्वयं फंसे हुए हैं।

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