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Democracy


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सिर्फ सत्ता नहीं, व्यवस्था भी बदलनी चाहिए

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विष्णु नागर का व्यंग्यः खुशफहमी में जीनेवालों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए, खुद एक दिन जमीन पर आ जाएंगे!

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भारत की जनता को स्वाभाविक तौर पर गुलामी पसंद, इसीलिए सत्ता के हाथों लगातार कुचले जाने के बाद भी खामोश

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जंतर-मंतर की पुकारः असंतोष को सत्ता के गलियारों से दूर धकेलना, विरोध की आवाजों को कुचलने की साजिश

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हुकूमत की नजर में दुश्मन, पर एक-दूसरे के हमदर्द

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SIR में करोड़ों नाम घटे, लेकिन कितने घुसपैठिये मिले? अमित शाह के आरोप पर आंकड़ों से उठते सवाल

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विरोध और असहमति की दृश्यता के बिना कैसा लोकतंत्र !

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आकार पटेल / दमन और मनमानी का नया दौर, बैलेट हो गया अतीत

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विरोध के सिवा जनता के पास रास्ता ही क्या बचा?

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बेख़ौफ, बेबाक, आज़ाद 'एंग्री यंग वीमेन' का नया दौर

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विष्णु नागर का व्यंग्यः वह पागल नहीं है, पागल है वह जनता जिसने इन्हें अपनी बर्बादी के लिए चुना!

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