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प्रेमचंद के ‘गोदान’ का अंश: जेठ के दिन हैं, अभी तक खलिहानों में अनाज मौजूद है, मगर किसी के चेहरे पर खुशी नहीं

शख्सियत

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ईरान: सड़क पर किताब खरीदने के लिए लगी कतार कोई पुरानी तस्वीर नहीं है 

किताबें

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