क्या सच में बीजेपी और मोदी का कोई विकल्प नहीं है?

लोकतंत्र में विकल्प के मौजूद नहीं होने का विचार सरासर गलत है। इस विचार के सफल होने की गुंजाइश उसी स्थिति में है जब लोकतांत्रिक तरीके से चुना हुआ नेता चुनाव समेत सभी विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगा दे।

भारतीय संसद/ फोटो: नवजीवन
भारतीय संसद/ फोटो: नवजीवन

सुरुर अहमद

वे लोग इतिहास और राजनीति दोनों से बेखबर हैं जो किसी विकल्प के नहीं होने का राग अलाप रहे हैं और इस तरह की सोच को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

न सिर्फ बीजेपी के समर्थक, बल्कि अक्सर कई निष्पक्ष माने जाने वाले विश्लेषक भी इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। हाल तक मोदी के कटु आलोचक रहे बिहार के मुख्य़मंत्री नीतीश कुमार ने भी कुछ दिनों पहले जोरदार ऐलान किया कि देश में मोदी का कोई विकल्प नहीं है।

कोई भी व्यक्ति अपनी राय बनाने और उसे जाहिर करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन एक लोकतंत्र में विकल्प के मौजूद नहीं होने का विचार सरासर गलत है। निस्संदेह इस विचार के सफल होने की गुंजाइश उसी स्थिति में है जब लोकतांत्रिक तरीके से चुना हुआ कोई नेता तानाशाह में बदल जाए और चुनाव समेत सभी विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगा दे। यहां उदाहरण के तौर पर हिटलर का नाम लिया जा सकता है।

लोकतांत्रिक तरीके से अगर चुनाव हो रहे हैं, तो हमेशा एक विकल्प के उभरने की संभावना बनी रहती है। यह अलग बात है कि हममें से ज्यादातर लोग इसे नहीं देखते हैं या नहीं देखने का दिखावा करते हैं।

वैकल्पिक शख्सियतों और संगठनों के उभरने और चुनाव जीतने के ढेरों उदाहरण मौजूद हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्हें 2010 से पहले तक ज्यादातर लोग नहीं जानते थे। यहां तक कि दिल्ली के पत्रकारों को भी उनके बारे में कुछ खास पता नहीं था। 2015 के चुनाव में बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री की उम्मीदवार रहीं किरण बेदी कहीं ज्यादा जाना-पहचाना चेहरा थीं। अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ, उसके बाद आम आदमी पार्टी का गठन और राजनीतिक अनुभव में बहुत अधिक मजबूत शीला दीक्षित जैसी बड़ी नेता की हार हुई।

आपातकाल के चरम पर 19 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने जब आम चुनावों की घोषणा की थी तो उन्होंने हार की कल्पना नहीं की थी, क्योंकि उस समय उनका कोई विकल्प मौजूद नहीं था। विपक्षी नेता जेल में थे और विपक्ष बिखरा हुआ था। लेकिन सिर्फ दो महीने बाद 21 मार्च को वह विभिन्न दलों को मिलाकर बने एक कमजोर विपक्ष से हार गईं। बाद में इस गठबंधन का जनता पार्टी में विलय हो गया। प्रधानमंत्री के पद के लिए उन्होंने पुराने नेता मोरारजी देसाई का चुनाव किया। यह अलग बात है कि कुछ सालों बाद उन्होंने आपस में लड़ना शुरू कर दिया और उस जनादेश के साथ धोखा किया जो मतदाताओं द्वारा उन्हें दिया गया था।

1984 के चुनाव में जब कांग्रेस ने 400 सीटें जीतीं तो उस समय राजीव गांधी का कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने तीन साल से ज्यादा समय तक सबसे ताकतवर नेता के रूप में शासन किया, जबकि सबसे संगठित विपक्षी पार्टी बीजेपी पूरी तरह से हाशिए पर पहुंच गई थी, क्योंकि वह सिर्फ 2 सीट जीत सकी थी। यहां तक कि बीजेपी के सबसे लोकप्रिय चेहरा रहे अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी सीट से चुनाव हार गए थे। लेकिन तभी राजीव की अपनी सरकार में रक्षा मंत्री रहे वी पी सिंह ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने बोफोर्स को एक बड़ा मुद्दा बना दिया और कुछ ही महीनों में सबकुछ बदल गया। एक दिसंबर 1989 को वह देश के प्रधानमंत्री बन गए, जिसके बारे में साल की शुरुआत में किसी ने भी कल्पना नहीं की थी।

इसी तरह 13 मई 2004 को कुछ ऐसा हुआ जो बहुत अजीब था। कई दशकों के चुनावी इतिहास में यह अपनी तरह का बहुत बड़ा झटका था। अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में मजबूती से चल रही एनडीए सरकार को सत्ता से बेदखल कर सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आ गई। यह जीत उस समय मिली जब सभी क्षेत्रीय नेता एनडीए के साथ थे या सोनिया गांधी के खिलाफ थे।

यहां तक कि ममता बनर्जी और नवीन पटनायक एनडीए का हिस्सा थे और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी कांग्रेस अध्यक्ष के विदेशी मूल के मुद्दे पर बीजेपी की भाषा बोल रही थी। कई दिनों तक बीजेपी सदमे की हालत में रही क्योंकि शाइनिंग इंडिया और गुड गवर्नेंस का उसका प्रचार हवा हो गया था।

जब 22 मई, 2004 को मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। किसी भी राजनीतिक पंडित ने कभी ऐसी कोई भविष्यवाणी नहीं की थी कि ऐसा होगा। लालू प्रसाद और कुछ हद तक मुलायम सिंह यादव प्रमुख क्षेत्रीय नेता थे जिन्होंने यूपीए को सत्ता में लाने में मदद की। यूपीए ने 2009 में और अधिक बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। इस चुनाव में राहुल गांधी ने मुख्य भूमिका निभाई थी, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, जिनका उपहास उड़ाने का बीजेपी कोई मौका नहीं छोड़ती।

जनमत बनाने वालों के साथ यह समस्या है कि वे विकल्प की बात करना तभी शुरू कर देते हैं जब चुनाव होने में लंबा समय होता है और लड़ाई की रुपरेखा भी तैयार नहीं होती है। कोई विकल्प नहीं होने की चर्चा उस समय शुरू हुई है जब राजनीति सुस्त या डरी हुई है और जिससे सिर्फ सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को मदद मिल रही है।

विकल्प नहीं होने के विचार के मुंह के बल गिरने का एक और उदाहरण इस साल की शुरुआत में फ्रांस से आया। चुनाव से कुछ महीने पहले तक वहां राजनीतिक अस्थिरता थी। इस बात की भी आशंका थी कि घोर राष्ट्रवादी और घोर दक्षिणपंथी ले पेन बहुत बढ़िया प्रदर्शन करेंगी और गठबंधन की सरकार बनाने में कामयाब होंगी।

लेकिन नतीजों के सामने आने के बाद एमानुएल मैक्रान उभर के आए, जो कुछ दिनों पहले तक फ्रांस्वा ओलांद की अगुवाई वाली समाजवादी सरकार में मंत्री भी रहे थे। उनकी नवगठित पार्टी एन मार्श ने एक अप्रत्याशित और ऐतिहासिक जीत हासिल करने के साथ-साथ मुख्यधारा की दोनों स्थापित पार्टियों का एक तरह से सूपड़ा साफ कर दिया।

विकल्प अक्सर चुनाव से कुछ महीने पहले उभरते हैं। कई बार लोगों के मन को भांपते हुए सत्ताधारी पार्टी के कई नेता अपने ही नेता को छोड़ देते हैं और चुनौती पेश करते हैं।

इसलिए, यह कहना और इतनी जल्दी कहना कि 2019 में बीजेपी और नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है, उनकी अज्ञानता और धूर्तता को दर्शाता है।

Published: 21 Aug 2017, 7:37 PM
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