किताबें

‘बड़ी आई पत्रकार’ यानी दास्तान-ए-खबर लहरिया

दिल्ली के त्रिवेणी ऑडिटोरियम में, ‘बड़ी आई पत्रकार’ की लेखिकाओं ने उन जगहों से रिपोर्टिंग की असलियत पर चर्चा की जो ‘बहुत ज़्यादा स्थानीय, घर के बहुत करीब’ होती हैं—जहां गुमनामी जैसी कोई चीज़ नहीं होती।

दिल्ली में इसी 8 मई को खबर लहरिया के पत्रकारों की किताब का विमोचन हुआ
दिल्ली में इसी 8 मई को खबर लहरिया के पत्रकारों की किताब का विमोचन हुआ 

खुद का अख़बार निकालने की वह कहानी जब-जब याद आती है, बिहार में भोजपुर इलाक़े के दो विधानसभा क्षेत्रों ‘सहार’ और ‘संदेश’ की कहानी भी जरूर याद आती है, जो पक तो बहुत पहले से रही थी, मुकम्मल 1995 में हुई, जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए। इन दोनों ही सीटों पर पहली बार सही मायने में वोट पड़े थे और यह महज संयोग नहीं था कि दोनों ही सीटों पर उस बार सीपीआई (माले-लिबरेशन) के प्रत्याशी क्रमश: राम नरेश राम (पारसनाथ) और रामेश्वर प्रसाद चुनाव जीते थे। बात इतनी ही नहीं थी, सच यह है कि इन दोनों सीटों पर पहली बार वहां की पिछड़ी-दलित और अत्यंत पिछड़ी जमात ने वोट डाले थे।

सहार का तो इतिहास ही था, कि उससे पहले तक वहां एक बड़े इलाक़े के अधिसंख्य बूथ ज्वाला सिंह नामक एक सामंत की कोठी में सिमट जाते थे, फिर क्या होता था, बताने की जरूरत नहीं। कहना न होगा कि यह पहली बार चुनाव आयोग नाम की संस्था और टीएन शेषन नाम के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के होने का असर तो था ही, इसमें उस चेतना की भी बड़ी भूमिका थी, जिसने ज़रा सी खुली हवा मिली तो उस दबे-कुचले समाज को घरों से इस तरह निकलने को प्रेरित किया कि बिहार के नतीजों की ही नहीं, समाज की दिशा भी बदल गई।

Published: undefined

उत्साह से लबरेज़ महिलाओं की वह लंबी-लंबी लाइनें आज भी जेहन में यूं ही नहीं चस्पा हैं। तब वहां भी कोई ‘खबर लहरिया’ कुछ दिलों में आकार ले रहा था, लेकिन ज़मीन पर वह सोच बाद में यूपी के बुंदेलखंड में उतरती दिखाई दी, जब उस पिछड़े प्रदेश के घूंघट वाले समाज के बीच से कुछ महिलाओं ने अपना खुद का अख़बार निकालने की सोची। विचार के तौर पर ‘खबर लहरिया’ के भ्रूण बनने और फिर उसे जन्म देने का वह फैसला यूं ही नहीं था।

यह सन 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश की पथरीली ज़मीन पर पत्थर दिल सामंती सोच के बीच इस इरादे का पनपना ही बड़ी घटना थी। यह वह इलाक़ा था जहां महिलाएं पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर रहने को अभिशप्त थीं। सख्त बंजर धरती के बीच खेतों, ईंट-भट्ठों पर कठिन हालात में मज़दूरी और जंगल में लकड़ी बीनते, काम के सामान और फल-सब्जी तलाशते जिंदगी बीत रही थी। कि, इसी बीच उन चंद महिलाओं ने जाने किस प्रेरणा से एक अनोखा फैसला ले लिया।

तय किया कि वे अब अपने बीच से, अपना अख़बार निकालेंगी। इनके पास इस अख़बार को लिखने से लेकर ‘छापने’ और उसे बेचने तक की योजना भी थी। शुरू में इसे हाथ से लिखा जाता, और फिर साइकलोस्टाइल करके बांटा जाता, जो बाद में तकनीक से तालमेल करते हुए आगे बढ़ता रहा। बुंदेलखंड की आवाज़ बन चुके इस प्रयोग ने लम्बा रास्ता तय किया और आगे चलकर महिलाओं ने इसे महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले एकमात्र डिजिटल न्यूज़ चैनल की यात्रा तक पहुंचाया।

Published: undefined

इसी ‘खबर लहरिया’ की यात्रा की कहानी अभी जब एक किताब के रूप में हमारे सामने आयी तो हतप्रभ होना लाज़मी था। किताब का शीर्षक ही चौंका गया- ‘बड़ी आई पत्रकार’

वैसे ही जैसे हमारे पुरुष प्रधान समाज के इस पुरुष प्रधान पेशे में हम महिलाओं के लिए अक्सर सुनते आए हैं- ‘बड़की पत्रकार हैं’। किताब खबर लहरिया की टीम के निजी अनुभवों पर आधारित है, और प्रस्तुति का ढंग निहायत सहज और सरल। ठीक उसी भाषा में जिसकी कभी हिन्दी पत्रकारों से अपेक्षा रहती थी लेकिन समय के साथ वह पहले हिंग्लिश हुई और अब जाने कहां पहुंच चुकी है। इस मायने में सुदूर ग्रामीण इलाके में काम करने वाली महिलाओं के अनुभवों की यह दास्तान न सिर्फ उस दुरूह यात्रा का मुकम्मल बयान है बल्कि उन दुश्वारियों से निपटते हुए आगे बढ़ने की कहानी भी है जो नई पीढ़ी के पत्रकारों ही नहीं, उन्हें गढ़ने की जिम्मेदारी वहन करने वाले उन पत्रकारों के लिए भी पढ़ना ज़रूरी है, जो खाए-अघाये-मोटाए माने जाते हैं, या खुद को मान बैठे हैं।

दरअसल खबर लहरिया टीम के यह अनुभव सिर्फ आपबीती नहीं सुनाते, 270 पेज की इस किताब के जरिए आज की कथित मुख्यधारा के पत्रकारों को एक बड़ी चुनौती भी देते हैं।यह ‘खबर लहेरिया’ के पत्रकारों द्वारा लिखी गई एक सामूहिक जीवनी ही नहीं, उस यात्रा का मुकम्मल बयान भी है, जो इसकी सहयात्रियों ने कदम-कदम झेला, महसूस किया और रास्ता निकाला।

Published: undefined

इसमें यात्रा के तमाम पड़ाव भी हैं और उनपर नज़र रखने वाले नज़रिए का बयान भी: “महिला रिपोर्टर बनने की हमारी यात्रा का हर मोड़ हमारा तय किया हुआ भी नहीं था, हम कुछ अपनी इच्छा से बने, कुछ बेमन से। …बीमारियां, कुपोषण, जाने कौन-कौन से दर्द, डर, दुःख, इच्छाएं, ये सब हमारे शरीर पर से गुजरते जाते। कभी एक के बाद एक, कभी सब एक साथ। यह सारे अनुभव हमारी पत्रकारिता की यात्रा, उसकी सफलता और असफलता के हिस्से हैं।”

किताब के आवरण से लेकर अंदर सुरचिपूर्ण साज-सज्जा के साथ विषयवस्तु की प्रस्तुति से गुज़रने का अहसास भी अलग ही अनुभव देता है। ‘बड़ी आई पत्रकार’ उन दस महिला पत्रकारों की कलम से लिखी गई अपनी कहानी है जो ‘खबर लहरिया’ की पूरी यात्रा, इसके पड़ावों, ऊबड़-खाबड़ उतार-चढ़ावों से गुजारते हुए हमें वहां पहुंचा देती है, जहां उनकी ख़ामियों, खूबियों से गुजरते हुए उस मज़बूती का अहसास होता है, और जब हम हतप्रभ रह जाते हैं: “जिन सालों में हम बुंदेलखंड में खुद को और अपने न्यूज़रूम को स्थापित कर रहे थे, उस समय ‘मान्यता’ शब्द बार-बार दोहरया जाने वाला शब्द था। यह मान्यता एक जटिल चीज़ थी। इसमें सफल पत्रकार होने की वह वैधता और सम्मान था, जो हम हमेशा तलाशते रहते थे।”

Published: undefined

और यह भी कि “हमारी लगभग हर ‘अच्छी’ खबर हमें अपने किसी मूल्य या विश्वास को टटोलकर देखने के लिए मजबूर करती थी और यह बात हमें एक खास किस्म के अच्छे पत्रकार बनाए रखती थी, जो अपनी विरासत और क्षेत्र से जुड़े हुए थे।”

खास बात यह भी है कि यह महिला पत्रकार सामूहिक रूप से अपनी यह दास्तान लिखते हुए कुछ भी छिपाना नहीं चाहतीं। वे अपनी मज़बूती का बयान करती हैं तो कमियों की बात भी करती हैं और उस क़ीमत की भी जो उन्हें अपनी यात्रा में यहां तक पहुंचने के लिए वर्जनाओं को तोड़ते वक्त चुकानी पड़ी होगी:

“रिपोर्टिंग और घर से बाहर की दुनिया के रास्ते में कई रुकावटें थीं। सबसे बड़ी रुकावट वो आदर्श थे, जिन्हें हम भी मानते थे: अच्छी औरत, अच्छी मां, अच्छी प्रेमिका के आदर्श। इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दो दशक हमने जेंडर और लैंगिकता (सेक्सुअलटी) की बदलती समझ, राजनीतिक और आर्थिक बदलावों, डिजिटल टेक्नोलॉज़ी और बाहरी दुनिया में महिलाओं की नई भूमिकाओं के अनुसार ढलने में लगाए।… हमने जब अपने छोटे शहरों में शुरुआत की, तब रिपोर्टिंग में हमारे लिए बहुत जगह नहीं थी, पर हमने खुद के लिए, अपने इतिहास के लिए और अपने शरीरों के लिए जगह बनाई और इस प्रक्रिया में ख़तरों और जोखिमों को भी झेला…अकेले आना-जाना, नए लोगों से दोस्ती और बातचीत करना, लोगों के पूर्वाग्रहों से लड़ना, खुद पर भरोसा करना सीखना, निडर और बेबाक़ बनना… यह भी सीखा/जाना कि काम का मतलब सिर्फ खटना नहीं होता है, काम को अच्छे से करते रहने के लिए सुस्ताना भी होता है…।”

Published: undefined

‘बड़ी आई पत्रकार'- इक्कीसवी सदी में पत्रकारिता की कहानी’ की लेखिकाएं हैं- दिशा मालिक, गीता देवी, हर्षिता वर्मा, कविता बुंदेलखंडी, लक्ष्मी शर्मा, ललिता, मीरा देवी, नाज़नी रिज़वी, श्यामकली और सुनीता प्रजापति। किताब की शुरुआत में रोहिणी मेनन ने उचित ही लिखा है- “ये महिला पत्रकार अपने बारे में इतनी बेबाक़ी से सच कैसे बोल ले रही हैं? ये किताब दुनिया भर के पत्रकारों के लिए कुछ करने का संकेत है।”

किताब भाषा सहयोग के बारे में, खबर लहरिया की समय रेखा और प्रस्तावना टिप्पणी के बाद ‘पत्रकार होना’, ‘पत्रकार की देह’, ‘फ़ील्ड पर पत्रकार’, ‘ग्रामीण पत्रकारिता का मज़ा’, ‘पत्रकारिता का बिजनेस’, ‘हमारी ईंट-हमारा गारा’ जैसे अध्यायों में विभाजित है।

बीते शुक्रवार को दिल्ली में रिलीज़ हुई, 399 रुपए मूल्य की इस किताब के प्रकाशक हैं साइमन एंड शूस्टर इंडिया (Simon and schuster india)। किताब Amazon पर भी उपलब्ध है और हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी में भी प्रकाशित हुई है। हालांकि हिन्दी शीर्षक में जो अपील और ठसक है, वह अंग्रेज़ी शीर्षक ‘द गुड रिपोर्टर’ (The Good Reporter) में नदारद है।

Published: undefined

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

Published: undefined