
पिछले तीन सालों से उच्चतम न्यायालय में निजता के अधिकार और आधार से संबंंधित मामले की लगातार चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का तर्क था कि निजता का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा सुनिश्चित मौलिक अधिकार नहीं है। उषा रामनाथन का मानना है कि इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितना महत्वपूर्ण है?
यह फैसला तीन बेहद अहम बातों को रेखांकित करता है। पहला, 1954 और 1962 में कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले हमारे मौलिक अधिकारों की राह में रोड़ा नहीं बनेंगे। दूसरी बात, पिछले 40 साल की लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बहुत स्पष्टता से निजता के अधिकार का समर्थन किया है। हालांकि, सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से इस अधिकार को खत्म करने की कोशिश की थी।
तीसरा, सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि निजता का अधिकार, अनुच्छेद 21 और मौलिक अधिकार के पूरे अध्याय के द्वारा संरक्षित है।
सरकार ने क्यों आधार के मामले में मौलिक अधिकारों की दलील दी?
वह एक रोचक पहलू है जिसकी पड़ताल होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि सरकार ने हर मामले में निजता के अधिकार का विरोध किया है। उदाहरण के लिए, जब लोग यह मांग करते हुए कोर्ट पहुंचे कि मानहानि आपराधिक कानून का हिस्सा नहीं होना चाहिए, तो व्यक्तिगत निजता के संदर्भ का हवाला देते हुए सरकार ने इससे इनकार कर दिया था। लेकिन यूआईडी या आधार पर सरकार ने अलग रुख अपनाया।
आपकी राय में सरकार ने क्यों आधार मामले में निजता का विरोध किया?
उन्होंने ऐसा भटकाने, आंखों में धूल झोंकने और देरी करने के लिए किया। आप देखें, जिस समय उन्होंने कहा कि निजता का उपयोग मौलिक अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता, उस समय आधार का मामला सुनवाई के अंतिम चरण में था। इस बात को उन्होंने 16 मार्च 2015 को तब उठाया जब पीठ इसकी अंतिम सुनवाई तय करने जा रहा था। क्यों उन्होंने इसे शुरुआत में नहीं उठाया? क्यों इसे इस निर्णायक मौके पर उठाया गया? इस बीच वे आधार की व्यापकता और पहुंच को फैलाने में लगे रहे। यह सबकुछ बहुत अच्छे तरीके से सुनियोजित था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि निजता का अधिकार धारा 377 के संदर्भ में भी लागू होगा। आप इसे कैसे देखती है?
अगर आप फैसले को पढ़ेंगे तो यह बिल्कुल स्पष्ट है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मौलिक अधिकार बहुसंख्यकवाद से जुड़े हुए नहीं हैं। अगर एलजीबीटी समुदाय के लोग अल्पसंख्यक हैं तो कोई भी उनका मौलिक अधिकार नहीं छीन सकता। उनको जीवन, निजता आदि का अधिकार है। 9 जजों की इस पीठ ने सुरेश कौशल के फैसले के मूल को लगभग निष्प्रभावी कर दिया है। इस फैसले का प्रभाव दीर्घकालीन होगा।
यह फैसला एडीएम जबलपुर के विवादास्पद फैसले के लिए भी भारी झटका है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में यह साफ कर दिया गया है मौलिक अधिकारों को न तो निलंबित किया जा सकता है और न ही वापस लिया जा सकता है।
क्या आपको लगता है कि यह फैसला आधार के खिलाफ न्यायिक लड़ाई को मजबूती देगा?
यह अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि निजता एक मौलिक अधिकार है। इस फैसले से यह साफ हो जाता है कि यूआईडी परियोजना को निजता के मौलिक अधिकार की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
इस परियोजना में निजता से बड़े पैमाने पर समझौता किया गया है और इसे लेकर कोर्ट में विस्तृत साक्ष्य जमा किए गए हैं। शायद इसी बात ने सरकार को यह तर्क देने के लिए मजबूर किया कि निजता एक मौलिक अधिकार नहीं हो सकता है।
वे (सरकार) नागरिकों के निजी आंकड़े विदेशी कंपनियों को देते रहे हैं। अब यह नहीं हो सकेगा, इसकी हमें उम्मीद है।
Published: 25 Aug 2017, 3:59 PM IST
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Published: 25 Aug 2017, 3:59 PM IST