सिनेमा

‘मिर्जापुर’ के ‘मिर्च-मसाला’ ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय को ‘डिजिटल’ पर शिकंजा कसने के लिए किया मजबूर?

सरकार ने OTT शो पर नजर रखने की व्यवस्था कर दी है। लेकिन सभी OTT शो के लिए एक समान मानदंड नहीं हो सकते हैं। थोड़ी-बहुत गाली-गलौज वाली भाषा, नग्नता और ड्रग्स कभी-कभी कहानी के बुनियादी तत्व होते हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

अचानक जारी की गई इस नई अधिसूचना ने फिल्म उद्योग में भी परेशानी के भाव पैदा कर दिए हैं कि फल-फूल रहे डिजिटल प्लेटफॉर्म को अब केंद्र सरकार मॉनिटर करेगी। 9 नवंबर को जारी इस अधिसूचना के तहत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को ओटीटी (ओवर-द-टॉप) प्लेटफार्म की सामग्री को रेगुलेट करने का अधिकार होगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय कई फिल्म निर्माता और कलाकार इस कदम को विजुअल मीडियम में रचनात्मक अभिव्यक्ति के अंत के तौर पर देख रहे हैं।

इनसाइड एज, प्वायजन और कोड एम वेब सीरीज में अच्छे अभिनय की छाप छोड़ने वाले युवा कलाकार तनुज विरमानी इसे स्क्रीन पर कलात्मक आजादी की समाप्ति की घोषणा के तौर पर देखते हैं। 1980 के दशक की चर्चित अभिनेत्री रति अग्निहोत्री के बेटे तनुज का कहना है कि ‘मैं व्यक्तिगत तौर पर अनुभव करता हूं कि डिजिटल प्लटफॉर्म पर कन्टेंट और रचनात्मक अभिव्यक्ति की आजादी में नाटकीय बदलाव हो जाएंगे। पिछले दो साल से जो हम कहना या दिखाना चाहते हैं, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उसके लिए असीमित आजादी-जैसी थी। वह समाप्त हो जाएगी।’ वैसे, तनुज यह भी मानते हैं कि इस असीमित आजादी का ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दुरुपयोग भी किया गया है।

वह कहते हैं, ‘हममें से कई लोगों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप की अनुपस्थिति का दुरुपयोग किया है। अब हम पर निश्चित ही लगाम खींच दी जाएगी। मैं उम्मीद करता हूं कि ओटीटी पर सेंसरशिप नुकसान करने वाले स्तर तक हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगाएगा। क्योंकि मैं सचमुच महसूस करता हूं कि ओटीटी आने वाले दिनों की चीज है। देखें, क्या होता है। सभी ओटीटी शो के लिए एक समान मानदंड नहीं हो सकते हैं। थोड़ी-बहुत गाली-गलौज वाली भाषा, नग्नता और ड्रग्स कभी-कभी कहानी के बुनियादी तत्व होते हैं। दूसरी ओर, किसी को लग सकता है कि ओटीटी पर प्रस्तुत सामग्री को सेंसेशनल बनाने के लिए इन तत्वों का उपयोग किया जा रहा है। हर मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को उन्हें अपने मेरिट के आधार पर देखना चाहिए और सबके लिए एक ही डंडे का उपयोग नहीं करना चाहिए।’

ओटीटी सिरीज हाई, सेलेक्शन डे और इनसाइड एज से लोकप्रिय हुए अभिनेता अक्षय ओबरॉय तनुज की बातों से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘ओटीटी में काम करते हुए मुझे वैसे हिस्सों के अभिनय की आजादी मिली जो आमतौर पर स्क्रीन के लिए नहीं लिखी जाती। मैं समझता हूं कि कंटेन्ट क्रिएटर के तौर पर हम गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते लेकिन इस किस्म की सेंसरशिप ओटीटी के नए बन रहे बाजार के लिए निश्चित ही अच्छी नहीं है। ’ओटीटी सीरियल मिर्जापुर सबसे हिंसक और गाली-गलौज की भाषा वाली है। इसे फरहान अख्तर और उनके साझीदार रीतेश सिधवानी ने प्रोड्यूस किया है। डिजिटल क्षेत्र में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के घुसने में इसने प्रमुख भूमिका निभाई है।

मंत्रालय के करीबी सूत्रों का कहना है कि मिर्जापुर ‘हद से ज्यादा जुबानी और दृश्यात्मक हिंसा के साथ सचमुच लबालब हो गया था।’ फिल्म आलोचक से फिल्म निर्माता बने करन अंशुमन की मिर्जापुर के पीछे रचनात्मक सूझबूझ है। वह इसके सह-निर्माता, सह-लेखक और सह-प्रोड्यूसर हैं। वह महसूस करते हैं कि किसी रचनात्मक व्यक्ति के तौर पर कहानी कहने की आजादी के लिए जो चीजें जरूरी हैं, उन पर अब अंकुश लगा दिया जाएगा। वह कहते हैं कि ‘यह पूरी तरह टालने योग्य प्रति गामी कदम है। किसी भी किस्म की कोई सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए। रेटिंग सिस्टम की तरफ बढ़ने की जगह जिन लोगों को कोई अंदाजा नहीं है कि दुनिया किस तरह काम कर रही है, वे ही लोग करोड़ों लोगों की तरफ से यह फैसला करने जा रहे हैं कि उन्हें क्या देखना चाहिए। बहुत सीधी बात है। अगर आप नहीं देखना चाहते, मत देखिए। गलत कार्यक्रम देखने से बच्चों को रोकने के लिए पर्याप्त टेक्नोलॉजी वाले उपाय हैं।’

ओटीटी प्लटफॉर्म पर सक्रिय टेलीविजन स्टार करन वीर बोहरा का मानना है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के दिशा निर्देश सिर्फ उन्हें प्रभावित करते हैं जो घटियापन या फूहड़पन की इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि ‘यह सिर्फ उन्हें प्रभावित करेगा जो सोचते हैं कि सेक्स बिकता है। काफी अच्छा करने वाले या सचमुच अच्छे टॉप शो ऐसे हैं जिनमें कम सेक्स और घटियापन और अनावश्यक गाली-गलौच वाली भाषा है। हां, वे भी कम हो जाएंगे। मैं इस कदर गालियों का प्रशंसक नहीं हूं। यह अस्वाभाविक लगता और दिखता है।’सेक्स परिवर्तन के मुद्दे पर बनी बेल्जियन फिल्म गर्ल के प्रसारण के अधिकार पश्चिम में जब नेटफ्लिक्स ने हासिल किए, तो यह कहते हुए उन्होंने चेतावनी जारी की कि ’यह फिल्म संवेदनशील मुद्दे पर है और इसमें कुछ सेक्सुअल कंटेन्ट, ग्राफिक नग्नता और खुद को चोट पहुंचाने वाले दृश्य हैं।’

लेकिन सेंसर बोर्ड की पूर्व प्रमुख और बीतों दिनों की प्रसिद्ध अभिनेत्री आशा पारेख को लगता है कि ओटीटी पर वयस्क सामग्री से पहले इस तरह की चेतावनी जारी कर देना भर हतोत्साहित करने देने के लिए पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि ‘कोई शो 16 या 18 साल से ऊपर के लोगों के लिए है- सिर्फ इतनी चेतावनी देने भर से आप इसे कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि बच्चे इसे नहीं देखेंगे। उन्हें इंटरनेट पर सभी सामग्रियों तक पहुंच की खुली छूट है। यह भी मसला है कि आप इंटरनेट पर सामग्री को सेंसर नहीं कर सकते हैं। जब अमेजन ने निर्देशक फ्रांसिस ली के गे फिल्म गॉड्स ऑन कंट्री के कुछ दृश्यों को हटा दिया, तो ली ने दर्शकों से डिजिटल पर इसे नहीं देखने की अपील की। ‘एक अन्य पूर्व सेंसर बोर्ड प्रमुख पहलाज निहलानी को लगता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण और संतुलन बनाना वक्त की जरूरत है। वह कहते हैंः ‘कोई भी और किसी भी तरह का कंटेन्ट दिखाया जा रहा है। इनमें से कई में सिर्फ इफेक्ट के लिए गाली-गलौज वाली भाषा का अनावश्यक उपयोग हो रहा है। सेंसरशिप का डिजिटल शो में उपयोग जरूर ही किया जाना चाहिए और मैं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इस निर्णय का स्वागत करता हूं कि इंटरनेट पर जाने वाली सामग्री की मॉनिटरिंग की जाए।’

लेकिन, इन दिनों चर्चित डिजिटल अपराध सीरियल तैश के निर्माता बिजय नांबियार इस तरह के प्रतिबंधों की बातों से नाराज हैं। वह कहते हैं : ‘यह हमारे मुंह और भी बांध देगा और उन तरीकों को सीमित कर देगा जिनसे कहानी कही जा सकती है। अभी हम जो सामग्री तैयार करते हैं, वह सिर्फ यहीं नहीं, पूरी दुनिया में उपलब्ध है। क्या होगा जब हम किसी शो को यहां सेंसर कर देंगे लेकिन वह अन्य जगहों पर उपलब्ध रहेगा? ’इस लेखक ने इस मसले पर केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से बात करने के लिए उनके व्यक्तिगत नंबर पर सीधे और उनके व्यक्तिगत सहायक के जरिये भी कई बार कोशिश की। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

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