सिनेमा

जयंती विशेष: आर डी बर्मन ने 9 साल की उम्र में कंपोज किया पहला गाना, 4 दशक तक करोड़ों दिलों पर अपने धुनों से किया राज

राहुल देव बर्मन की शुरूआती पढ़ाई लिखाई कलकत्ता के सेंट जेवियर्स स्कूल से हुई थी। उसके बाद मिडिल की शिक्षा के लिए उनका दाख़िला कलकत्ता के बालिगुंगे हाई स्कूल में कराया गया। इसी दौरान सिर्फ़ 9 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला गाना कंपोज कर दिया था।

मशहूर संगीतकार आर.डी.बर्मन की आज 84वीं जयंती है।
मशहूर संगीतकार आर.डी.बर्मन की आज 84वीं जयंती है। फोटो: सोशल मीडिया

हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार आर.डी.बर्मन की आज 84वीं जयंती है। उनका पूरा नाम राहुल देव बर्मन था, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री में वह पंचम दा के नाम से मशहूर हुए। उन्होंने संगीत में बहुत से नए-नए प्रयोग किए। पंचम दा ने अपने संगीत में वेस्टर्न म्युज़िक का बहुत ही ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया था, जिसमे उनका पूरा पूरा साथ दिया उस दौर की मशहूर और मख़मली आवाज़ वाली गायिका आशा भोसले ने, जो की आगे चलकर उनकी जीवन संगिनी भी बनीं।

राहुल देव बर्मन की पैदाइश आज ही के दिन यानी 27 जून 1939 को कलकत्ता में हुई थी। उनके पिता सचिन देव बर्मन हिंदी सिनेमा के बहुत बड़े और नामी संगीतकार थे। घर में संगीत का माहौल पाकर राहुल ने भी बचपन से ही संगीत की बारीक़ियों को सीखना शुरू कर दिया था। राहुल के पंचम नाम पड़ने का क़िस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। कहा जाता है की राहुल जब बचपन में रोते थे तो उनके गले से संगीत का पांचवा सुर यानी पा निकलता था, उनके इस तरह रोने के अंदाज़ को दादामुनि कहे जाने वाले एक्टर अशोक कुमार ताड़ गए और उन्होंने राहुल का नाम पंचम रख दिया, जो की बाद में इंडस्ट्री में पंचम दा के नाम से मशहूर हुए।

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राहुल देव बर्मन की शुरूआती पढ़ाई लिखाई कलकत्ता के सेंट जेवियर्स स्कूल से हुई थी। उसके बाद मिडिल की शिक्षा के लिए उनका दाख़िला कलकत्ता के बालिगुंगे हाई स्कूल में कराया गया। इसी दौरान सिर्फ़ 9 साल की उम्र में राहुल ने अपना पहला गाना, 'ऐ मेरी टोपी पलट के आ' को अपने सुरों में ढाल दिया, जिसे बाद में उनके पिता सचिन देव बर्मन ने 1956 में अपनी फ़िल्म फंटूश में इस्तेमाल किया। राहुल ने अपनी छोटी सी उम्र में ही एक और मशहूर गाना बना डाला था, जो आज भी हर शख्स की ज़ुबान पर गाहे बगाहे चला आता है। वह मशहूर गाना था सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए। इस धुन को भी उनके पिता ने 1957 की फ़िल्म प्यासा में इस्तेमाल कर डाला। बड़े होकर आर.डी. बर्मन ने बॉम्बे में उस्ताद अली अक़बर ख़ान से सरोद और समता प्रसाद से तबला बजाना सीखा। उसके बाद वह अपने पिता सचिन देव बर्मन के साथ बतौर उनके सहायक काम भी करने लगे। लेकिन आर.डी.बर्मन उस दौर के जाने-माने संगीतकार सलिल चौधरी को ही अपना गुरु मानते थे।

आर.डी.बर्मन ने अपने करियर की शुरुआत अपने संगीतकार पिता सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर की थी। इस दौरान उन्होंने 1958 में आई फ़िल्म चलती का नाम गाड़ी और सोलहवां साल, 1959 में आई फ़िल्म कागज़ के फूल, 1963 में आई फ़िल्म तेरे घर के सामने और बंदिनी, 1964 में आई फ़िल्म ज़िद्दी, 1965 में आई फ़िल्म गाइड और तीन देवियां जैसी क़ामयाब फ़िल्मों में बतौर सहायक संगीतकार अपने पिता के साथ शानदार काम किया। यह बात भी बड़ी दिलचस्प है कि फ़िल्म सोलहवां साल के मशहूर गाने है, ‘अपना दिल तो आवारा’ में आर.डी बर्मन ने माउथ ऑर्गन बजाया था और यह गाना आज भी उतना ही तरोताज़ा है जब से यह गाना बना है।

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आर.डी.बर्मन को बतौर संगीतकार पहला मौक़ा साल 1961 में रिलीज़ हुई मशहूर हास्य अभिनेता महमूद की फ़िल्म छोटे नवाब में मिला। कहा जाता है की महमूद अपनी इस फ़िल्म के संगीत के लिए संगीतकार सचिन देव बर्मन के घर गए थे, लेकिन उन्होंने वक़्त की कमी का हवाला देकर फ़िल्म करने से मना कर दिया। इसी दौरान महमूद की नज़र कुछ दूर बैठे तबला बजा रहे राहुल देव बर्मन पर पड़ी। उन्होंने फ़ौरन आर.डी. बर्मन को अपनी फ़िल्म में संगीत देने का ऑफ़र दे डाला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस फ़िल्म के बाद महमूद और आर.डी. बर्मन के बीच इतनी गहरी दोस्ती हो गई कि 1965 में रिलीज़ हुई महमूद की फ़िल्म भूत बंगला में भी उन्होंने आर.डी. बर्मन को एक छोटा सा किरदार भी दे दिया।

एक क़ामयाब म्युज़िक डॉयरेक्टर के तौर पर आर. डी. बर्मन को पहचान मिली साल 1966 में रिलीज़ हुई फ़िल्म तीसरी मंज़िल से। ऐसा कहा जाता है की इस फ़िल्म के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इस फ़िल्म के  प्रोड्यूसर और लेखक नासिर हुसैन से आर.डी.बर्मन के लिए सिफ़ारिश की थी। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे बोलों पर आर.डी.बर्मन ने इतनी ख़ूबसूरत धुनें बनाई कि फ़िल्म के सभी गाने सुपरहिट साबित हुए, जिससे ख़ुश होकर नासिर हुसैन ने अपनी अगली 6 फ़िल्मों के लिए गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और संगीतकार आर.डी.बर्मन को पहले से साइन कर लिया।

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साल 1967 में रिलीज़ हुई देव आनंद की फ़िल्म ज्वेलथीफ़ और साल 1970 में आई फ़िल्म प्रेम पुजारी के सुपरहिट संगीत ने आर.डी.बर्मन को फ़िल्म इंडस्ट्री के क़ामयाब संगीतकारों की फेहरिस्त में लाकर खड़ा कर दिया। साल 1969 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना कीं फ़िल्म आराधना का मशहूर गाना कोरा कागज़ था, ये मन मेरा की धुन को आर.डी. बर्मन ने ही बनाया था, हालांकि फ़िल्म के आधिकारिक संगीतकार उनके पिता सचिन देव बर्मन थे। कहा जाता है कि जिस दिन फ़िल्म आराधना के इस गाने की रिकॉर्डिंग होनी थीं, इत्तेफ़ाक़ से उस दिन सचिन देव बर्मन काफ़ी बीमार पड़ गए। ऐसे में अपने पिता की ज़िम्मेदारी को उनके बेटे आर.डी.बर्मन ने पूरा किया। उन्होंने इस गाने को कम्पोज़ किया और रिकॉर्ड करवाया। इसीलिए फ़िल्म की कास्टिंग में उनका नाम बतौर एसोसिएट म्युज़िक कंपोज़र के दिया गया।

कहा जाता है की आर.डी.बर्मन ने 60 के दशक में ही फ़िल्म तीसरी मंजिल से बॉलीवुड में भारतीय और वेस्टर्न म्युज़िक को मिलाकर एक नए और क़ामयाब एक्सपेरिमेंट की शुरुआत कर दी थी, लेकिन 70 और 80 के दशक में उनका यह प्रयोग और भी परवान चढ़ा। उनके इस नए एक्सपेरिमेंट में उनका पूरा पूरा साथ दिया किशोर कुमार और आशा भोंसले ने। साल 1970 में रिलीज़ हुई शक्ति सामंत कीं फ़िल्म कटी पतंग को एक म्युज़िकल सुपरहिट फ़िल्म माना जाता है। यह आर.डी. बर्मन के लिए एक बड़ी क़ामयाबी थी। उस दौर में फ़िल्म कटी पतंग के गानों जैसे ये जो मोहब्बत है और ये शाम मस्तानी जैसे गानों को बनाकर आर.डी.बर्मन ने पूरे देश को झूमने पर मजबूर कर दिया था। इसी साल उनके अनोखे संगीत से सजी फ़िल्म हरे राम हरे कृष्णा भी रिलीज़ हुई और आशा भोंसले की आवाज़ में उनका कम्पोज़ किया हुआ गाना दम मारो दम ने ऐसा तहलका मचाया कीं सभी आर.डी.बर्मन की मौसिक़ी के दीवाने हो गए।

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ऐसा बिल्कुल नहीं है की आर.डी.बर्मन ने केवल वेस्टर्न म्युज़िक के सहारे ही अपनी मौसिक़ी की जादूगरी को दिखाया बल्कि उन्होंने भारतीय संगीत को भी नए अंदाज़ से अपनी फ़िल्मों में पेश किया। साल 1971 में आई राजेश खन्ना की फ़िल्म अमर प्रेम का गाना रैना बीती जाए के ज़रिए उन्होंने इंडियन क्लासिकल म्युज़िक को एक नई पहचान देने की कोशिश की। साल 1971 में आई फ़िल्म कारवां के गाने पिया तू अब तो आ जा ने पंचम दा को फ़िल्म इंडस्ट्री में एक नए मुक़ाम पर पहुंचा दिया। इस फ़िल्म के सुपरहिट संगीत के लिए उन्हें पहली बार फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड के लिए नामित किया गया था। इसके बाद उन्होंने अपनी ख़ूबसूरत मौसिक़ी से कई फ़िल्मों को यादगार बना डाला जिनमें सीता और गीता। अपना देश, यादों की बारात, आप की कसम, शोले, आंधी जैसी शानदार फ़िल्में शामिल हैं, आर.डी. बर्मन ने फ़िल्म शोले में संगीत देने के साथ साथ फ़िल्म के गाने महबूबा महबूबा को अपनी आवाज़ भी दी थी। इसके अलावा उन्होंने फ़िल्म शान के गाने यम्मा यम्मा में भी अपनी आवाज़ दी थी।

80 के दशक में उन्होंने कई नए सिंगर्स को ब्रेक देकर हिंदी सिनेमा में उनका डेब्यू करवाया, जिनमें कुमार सानू, अभिजीत और मोहम्मद अज़ीज़ का नाम ख़ास तौर से लिया जाता है।  साल 1994 में आर.डी.बर्मन ने विधु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म 1942  ए लव स्टोरी में आख़िरी बार संगीत दिया क्योंकि इस फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले ही पंचम दा का निधन हो गया था। आर.डी.बर्मन ने तक़रीबन 300 फ़िल्मों में संगीत दिया था, जिनमें 292 हिंदी फ़िल्में थीं, इसके अलावा उन्होंने बंगाली, तमिल, तेलुगू और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी संगीत दिया था।

आर.डी. बर्मन को तीन बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड दिया गया था, जिसमें 1983 की फ़िल्म सनम तेरी क़सम, 1984 की फ़िल्म मासूम और उनके मरणोपरांत 1994 में रिलीज़ हुई उनके संगीत से सजी फ़िल्म 1942 ए लव स्टोरी शामिल हैं। 4 जनवरी 1994 को 55 साल कीं उम्र में फ़िल्म इंडस्ट्री के इस दिग्गज संगीतकार ने दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

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