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अर्थतंत्र की खबरें: चांदी और सोना की कीमतों में उछाल और शेयर बाजार में बड़ी गिरावट, रुपया पहली बार 95 के पार

शादी-विवाह के सीजन से पहले जौहरियों की ताजा लिवाली के कारण चांदी 7,000 रुपये चढ़कर 2.37 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई, और सोना बढ़कर 1.51 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया।

फोटो: IANS
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 सोमवार को कीमती धातुओं की कीमतों में लगभग तीन प्रतिशत का उछाल आया। शादी-विवाह के सीजन से पहले जौहरियों की ताजा लिवाली के कारण चांदी 7,000 रुपये चढ़कर 2.37 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई, और सोना बढ़कर 1.51 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया।

अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अनुसार, चांदी की कीमत 7,000 रुपये, या 3.04 प्रतिशत बढ़कर 2,37,000 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी करों सहित) हो गई, जो शुक्रवार को बाजार बंद होने के समय 2,30,000 रुपये प्रति किलोग्राम थी।

99.9 प्रतिशत शुद्धता वाला सोना 3,700 रुपये या 2.5 प्रतिशत बढ़कर 1,51,500 रुपये प्रति 10 ग्राम (सभी करों सहित) हो गया। पिछले बाजार सत्र में सोने की कीमत 1,47,800 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुई थी।

कारोबारियों ने कीमतों में इस सुधार का श्रेय शादियों के सीजन से पहले की गई हाजिर लिवाली और वैश्विक बाजार के अनुकूल रुझानों को दिया।

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ विश्लेषक-जिंस सौमिल गांधी ने कहा कि सोमवार को सोने की कीमतों में सुधार देखने को मिला, जिसे कीमतों में गिरावट के समय की गई लिवाली से समर्थन मिला। वहीं, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड के घटते प्रतिफल ने कीमती धातुओं के बाजार में समग्र धारणा को बेहतर बनाने में मदद की।

उन्होंने कहा कि रुपये की विनिमय दर में आए तेज बदलाव ने भी घरेलू कीमती धातुओं की कीमतों को और अधिक मजबूती प्रदान की।

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वित्त वर्ष के अंतिम कारोबारी दिन सेंसेक्स 1,636 अंक लुढ़का, निफ्टी में भी गिरावट

स्थानीय शेयर बाजारों में सोमवार का चालू वित्त वर्ष के अंतिम कारोबारी सत्र में तेज गिरावट आई और बीएसई सेंसेक्स 1,636 अंक लुढ़क गया जबकि एनएसई निफ्टी 488 अंक के नुकसान में रहा। पश्चिम एशिया में संघर्ष जारी रहने और कच्चे तेल के दाम में तेजी से निवेशकों की धारणा पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

एशियाई बाजारों में कमजोर रुख और विदेशी संस्थागत निवेशकों की निरंतर पूंजी निकासी ने भी घरेलू शेयर बाजारों में नरमी के रुख को बढ़ाया है।

बाजार में लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में गिरावट रही और तीस शेयरों पर आधारित बीएसई सेंसेक्स 1,635.67 अंक यानी 2.22 प्रतिशत टूटकर 71,947.55 अंक पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान, यह 1,809.09 अंक तक लुढ़क गया था।

बीएसई में सूचीबद्ध शेयरों में से 3,563 नुकसान में, जबकि 876 लाभ में रहे। वहीं 154 के भाव अपरिवर्तित रहे।

पचास शेयरों पर आधारित एनएसई निफ्टी 488.20 अंक यानी 2.14 प्रतिशत टूटकर 22,331.40 अंक पर बंद हुआ।

रेलिगेयर ब्रोकिंग लि. के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (शोध) अजित मिश्रा ने कहा, “पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण बाजार में गिरावट आई। तनाव बढ़ने के साथ संघर्ष थमने की उम्मीद टूटी है और कच्चे तेल की कीमत में तेजी आई है। इससे भारत जैसी तेल आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति और वृहद आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गईं हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘एशियाई और अमेरिकी बाजारों में गिरावट सहित कमजोर वैश्विक संकेतों, विदेशी संस्थागत निवेशकों की निरंतर निकासी और रुपये के कमजोर होने से बाजार की धारणा पर और भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।”

सेंसेक्स में शामिल कंपनियों में बजाज फाइनेंस, भारतीय स्टेट बैंक, इंटरग्लोब एविएशन, बजाज फिनसर्व, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक सबसे अधिक नुकसान में रहीं। दूसरी ओर, टेक महिंद्रा और पावर ग्रिड लाभ में रहें।

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डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 95 के पार

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए ने सोमवार को पहली बार 95 के स्तर को पार 95.2 का नया लो बनाया है। हालांकि, दिन के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 94.83 के स्तर पर बंद हुआ, जो कि शुक्रवार के बंद 94.81 से 0.3 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।

मध्य पूर्व में तनाव के कारण डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार कमजोरी देखी जा रही है और अकेले मार्च में अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा ने 4.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बैंकों के लिए ओवरनाइट नेट ओपन पॉजिशन लिमिट को घटाकर 100 मिलियन डॉलर करने के बाद, रुपया मजबूती के साथ खुला था, लेकिन सत्र के दौरान इसने अपनी बढ़त खो दी और शुरुआती स्तर से 160 पैसे गिर गया।

इसके अलावा, पिछले सप्ताह रुपए में लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट आई, जो इसी स्तर की लगातार चौथी साप्ताहिक गिरावट थी, और यह डॉलर के मुकाबले 94.84 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था।

शुक्रवार को बाजार बंद होने के बाद, केंद्रीय बैंक ने कहा कि बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 10 अप्रैल तक, प्रत्येक कारोबारी दिन के अंत में, घरेलू बाजार में उनकी नेट ओपन रुपया पॉजिशन 100 मिलियन डॉलर से अधिक न हो।

अनुमानों के अनुसार, इन निवेशों का आकार 25 अरब डॉलर से लेकर 50 अरब डॉलर से अधिक तक है।

तेल की बढ़ती कीमतों के चलते रुपए के साथ भारतीय शेयर बाजार में भी गिरावट देखी जा रही है और मार्च 2026 में निफ्टी में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई है, जो कि मासिक आधार पर कोरोना काल के दौरान मार्च 2020 के बाद हुई सबसे बड़ी गिरावट है।

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ईरान युद्ध का असर, बांग्लादेश और पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर बड़ा खतरा : रिपोर्ट

एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट संकट से दक्षिण एशियाई देशों में बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका के लिए ज्यादा खतरा है। ये देश इम्पोर्टेड एनर्जी पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं और रिजर्व सप्लाई लिमिटेड है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ये देश तेल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई में संभावित रुकावटों के लिए खास तौर पर कमजोर हैं, इसलिए ग्लोबल एनर्जी मार्केट में लंबे समय तक कीमत और सप्लाई का झटका उनकी सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग्स को प्रभावित कर सकता है।

एस एंड पी ग्लोबल रेटिंग्स एक विश्लेषक-आधारित संस्था है, जो क्रेडिट रेटिंग, रिसर्च और सस्टेनेबल फाइनेंस से जुड़ी राय प्रदान करती है। इसने कहा कि ऐसी इनसाइट्स मार्केट भागीदारों को मुश्किलों को स्पष्टता में बदलने और विश्वास के साथ फैसले लेने में मदद करने के लिए जरूरी हैं।

पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में आर्थिक रिकवरी के संकेत दिख रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि प्रोग्रेस हुई है, लेकिन एनर्जी की लगातार ऊंची कीमतें और ट्रेड और रेमिटेंस में संभावित रुकावटें उनकी नाजुक इकोनॉमी को पटरी से उतार सकती हैं।

इसमें यह भी बताया गया है कि हाइड्रोपावर जेनरेशन पर अपनी निर्भरता और ज्यादा संतुलित वित्तीय स्थिति के कारण लाओस पर इसका असर कम है। हालांकि, यह अभी भी लंबे समय तक चलने वाले एनर्जी कीमत और सप्लाई के झटकों के प्रति कमजोर है, लेकिन इसकी लॉन्ग-टर्म रेटिंग्स पर सकारात्मक आउटलुक का समर्थन करने वाली स्थितियां अभी भी बनी हुई हैं।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने कहा, "बांग्लादेश पर हमारी रेटिंग्स शायद हमारे बेस-केस सिनेरियो से जुड़े शॉर्ट-टर्म आर्थिक रुकावटों का सामना कर सकती हैं।"

अगर ऊर्जा की कीमत में बढ़ोतरी उम्मीद से ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो देश को विकास, मुद्रास्फीति और इसके बाहरी संतुलन के लिए बढ़ते रिस्क का सामना करना पड़ सकता है।

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