अर्थतंत्र

बाजार की नजर: अगले हफ्ते आरबीआई नीति और जीडीपी आंकड़ों से बाजार में मचेगी हलचल

अब निवेशकों की नजर अगले सप्ताह के घटनाक्रमों पर है। बता दें कि अगले हफ्ते यानी 1 जून से 5 जून के बीच कई महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़े और नीतिगत फैसले आने वाले हैं, जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।

फोट: IANS
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भारतीय शेयर बाजार के लिए बीता सप्ताह बड़ा उतार-चढ़ाव भरा रहा। सप्ताह के पहले कारोबारी सत्र की शुरुआत सकारात्मक हुई, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अमेरिका-ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया। इसके चलते निफ्टी शुरुआती दिनों में 24,000 के स्तर के ऊपर पहुंचने में सफल रहा।

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हालांकि जैसे-जैसे सप्ताह आगे बढ़ा, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीदें कमजोर पड़ने लगीं और निवेशकों का रुख सतर्क हो गया। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली ने भी बाजार पर दबाव बनाए रखा। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन में बिकवाली और तेज हो गई, खासकर बाजार बंद होने से पहले के अंतिम आधे घंटे में, जब एमएससीआई इंडेक्स रीबैलेंसिंग के चलते कई फंडों ने अपने पोर्टफोलियो में बदलाव किया। इसके अलावा भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के कमजोर मानसून अनुमान ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई।

परिणामस्वरूप, सप्ताह के दौरान निफ्टी 50 में 0.72 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 23,547.75 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स में 0.85 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 74,775.74 के स्तर पर आ गया।

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वहीं, अब निवेशकों की नजर अगले सप्ताह के घटनाक्रमों पर है। बता दें कि अगले हफ्ते यानी 1 जून से 5 जून के बीच कई महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़े और नीतिगत फैसले आने वाले हैं, जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं। निवेशकों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति, भारत की जीडीपी रिपोर्ट, पीएमआई डेटा, अमेरिकी रोजगार आंकड़ों और अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़े घटनाक्रमों पर रहेगी।

सप्ताह की शुरुआत मई के मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) के आंकड़ों से होगी। यह डेटा देश के विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति, मांग और कारोबारी गतिविधियों का शुरुआती संकेत देता है। इसके साथ ही ऑटोमोबाइल कंपनियों की मासिक बिक्री के आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी, क्योंकि ये उपभोक्ता मांग और आर्थिक गतिविधियों की झलक देते हैं।

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इसके अलावा, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) भी महत्वपूर्ण रहेगा, जो मैन्युफैक्चरिंग, खनन और बिजली क्षेत्रों की स्थिति को दर्शाता है। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई भी निवेशकों के लिए अहम संकेतक माना जा रहा है।

3 जून को अमेरिका से आने वाली कई महत्वपूर्ण आर्थिक रिपोर्ट्स बाजार की दिशा प्रभावित कर सकती हैं। एडीपी रोजगार रिपोर्ट, एसएंडपी ग्लोबल सर्विसेज पीएमआई और आईएसएम नॉन-मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई के आंकड़े अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और महंगाई के दबाव की तस्वीर पेश करेंगे।

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इन आंकड़ों के आधार पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की भविष्य की ब्याज दर नीति को लेकर अनुमान लगाए जाएंगे, जिसका असर वैश्विक पूंजी प्रवाह, उभरते बाजारों की मुद्राओं और विदेशी निवेशकों की रणनीति पर पड़ सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक 3 जून से 5 जून तक चलेगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा 5 जून को सुबह 10 बजे बैठक के फैसलों की घोषणा करेंगे।

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निवेशक महंगाई, आर्थिक विकास, बैंकिंग प्रणाली में तरलता, वैश्विक जोखिमों और ब्याज दरों को लेकर आरबीआई के रुख पर खास नजर रखेंगे। बैंकिंग शेयरों, बॉन्ड यील्ड और रुपए की चाल पर इस बैठक का सीधा प्रभाव देखने को मिल सकता है। साथ ही खाद्य महंगाई, मानसून की स्थिति और वैश्विक कमोडिटी कीमतों को लेकर आरबीआई के आकलन को भी बाजार ध्यान से देखेगा।

इसके अलावा, 5 जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की प्रारंभिक जीडीपी वृद्धि दर और मार्च तिमाही के आर्थिक आंकड़े जारी करेगा। इससे देश की आर्थिक स्थिति की व्यापक तस्वीर सामने आएगी और निवेशकों को विकास दर के नए संकेत मिलेंगे।

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उसी दिन अमेरिका का नॉन-फार्म पेरोल्स (एनएफपी) डेटा और बेरोजगारी दर भी जारी होगी। ये आंकड़े वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इनके आधार पर फेडरल रिजर्व की आगामी नीतियों को लेकर अनुमान लगाए जाते हैं।

इसके साथ ही, अगले सप्ताह अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव और उससे जुड़े कूटनीतिक प्रयासों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी, जिसका सीधा असर वैश्विक जोखिम भावना और कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।

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कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे महंगाई, व्यापार घाटा और कंपनियों की लागत प्रभावित होती है। वहीं अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए की चाल भी विदेशी निवेश प्रवाह और कई कंपनियों की आय पर असर डाल सकती है।

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