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मायावती का अजित जोगी से समझौता है छत्तीसगढ़ का मामला, नहीं पड़ेगा राष्ट्रीय स्तर पर फर्क: भूपेश बघेल

90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए बीएसपी सुप्रीमो मायावती का अजीत जोगी के साथ समझौता महागठबंधन की एकता के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस का दावा है कि उसने महागठबंधन को बचाने की भरसक कोशिश की।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया भूपेश बघेल ने कहा कि पार्टी ने महागठबंधन को बचाने की भरसक कोशिश की

90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए बीएसपी सुप्रीमो मायावती का अजीत जोगी के साथ समझौता महागठबंधन की एकता के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में बीएसपी के अलग होने से कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान होगा। हालांकि कांग्रेस का दावा है कि उसने महागठबंधन को बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन बीजेपी के दबाव में आकर मायावती ने अजीत जोगी के साथ समझौता किया है।

इस पूरे मुद्दे पर छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश सिंह बघेल से विश्वदीपक ने बातचीत की। पेश हैं उसके अंश:

क्या कारण है कि बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने चुनाव से ठीक पहले अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से समझौता कर लिया? बातचीत की शुरुआत कहां से हुई थी?

बात थोड़ी पुरानी है। बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष ओपी वाजपेयी मेरे पास गठबंधन का प्रस्ताव लेकर आए थे। जब बीजेपी तरह-तरह से दलितों का दमन कर रही थी, दलितों पर जगह-जगह हमले हो रहे थे तब वो मेरे पास आए। इस तरह की बातें भी हो रहीं थी कि बीजेपी-आरएसएस के लोग संविधान को बदलना चाहते हैं। तो इस पृष्टभूमि में वाजपेयी मुझसे मिले। उन्होंने कहा कि हम सब पार्टियों को जो भारत के संविधान पर भरोसा करती हैं, जो संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर को मानती हैं, उन सबको एक होकर चुनाव लड़ना चाहिए ताकि बीजेपी को हराया जा सके। उन्होंने ये भी कहा कि बीजेपी के लोग बाबा साहेब को नहीं मानते और संविधान को कमजोर करना चाहते हैं। इसलिए उनके खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनना चाहिए।

इसके जवाब में मैंने कहा कि बिल्कुल स्वागत है आपका। आइए, हम सब मिलकर लड़ेंगे। हालांकि उसी वक्त मेरे मन में शंका भी आई थी कि मायावती जी ने आज तक जो भी कदम उठाया है, उससे बीजेपी को ही फायदा हुआ है। और मैंने अपनी शंका को जाहिर भी किया था। तब वाजपेयी जी ने कहा कि इस बार ऐसा नहीं होगा, क्योंकि मामला अंबेडकर का है, संविधान की रक्षा का है। बीएसपी पूरी ताकत से कांग्रेस का साथ मिलकर बीजेपी को हराने के लिए काम करेगी।

फिर क्या हुआ? क्या बातचीत आगे बढ़ी या रुक गई?

हां, हमारी बातचीत चलती रही। कई दौर की बातचीत चली। अभी हाल फिलहाल तक हमारी बातचीत चल रही थी। बीएसपी छत्तीसगढ़ के प्रभारी एमएल भारती से भी हमारी मुलाकात हुई।उन्होंने ये तक कहा कि आप दोनों प्रदेश अध्यक्ष यानी कि मैं कांग्रेस की तरफ से और वाजपेयी को बीएसपी के तरफ से मिलकर सीटों के बारे में तय करना होगा। भारती जी से हमारी बातचीत इस बिंदु पर समाप्त हुई कि हम अगले दो-तीन दिन बाद फिर से एक बार बैठेंगे और इस मुद्दे पर आखिरी फैसला करेंगे।

लेकिन सवाल ये है कि सीटों पर आखिरी समझौते से पहले बातचीत क्यों टूट गई? क्या आपने बातचीत बहाल करने की कोशिश की थी?

भारती जी से मुलाकात के तीन-चार दिन के बाद जब मैंने संपर्क किया तो पता चला कि बीएसपी के पूर्व विधायक कामदार जोले ने भारती पर कुछ आरोप लगा दिया है। ये खबर अखबारों के फ्रंट पेज पर भी छपी थी। उस वक्त बीएसपी आंतरिक कलह से जूझ रही थी। बीएसपी के नेताओं ने मुझसे कहा कि जरा बीएसपी के अंदर की खींचतान कम हो जाए, ये तूफान शांत हो जाए तो हम लोग बैठकर सीटों के बारे में बात करेंगे। उस वक्त भी मैंने कहा कि ठीक है। इसके बाद अचानक पता चला कि मायावती जी ने तो अजीत जोगी के साथ समझौता कर लिया है। कमाल की बात ये है कि इसका ऐलान भी लखनऊ में किया गया।

आप क्या कहना चाहते हैं?

असल में  बीजेपी के कहने पर ही मायावती जी ने जोगी के साथ गठबंधन किया है। मेरा सवाल ये है कि संविधान रक्षा का वादा कहां गया बीएसपी का?

इस पूरे प्रकरण में पूर्व कांग्रेसी नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की भूमिका को कैसे देखते हैं?

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अजीत जोगी तो कांग्रेस में रहते हुए ही बीजेपी के लिए काम करते थे। उनके दौर में ही कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में नुकसान पहुंचा है। हालांकि वो वापस आने के लिए भी हाथ-पैर मार रहे थे लेकिन संभव नहीं हो सका। बीजेपी प्लांट के तौर पर अजीत जोगी का इस्तेमाल करना चाहती थी। कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए बीजेपी का आजमाया हुआ नुस्खा है लेकिन वो सफल नहीं हुआ। अब बीजेपी को लाभ पहुंचाने वाले दोनों दल एक साथ हो गए हैं।

बीएसपी कितनी सीटें चाह रही थी और कांग्रेस कितनी सीटें देने के लिए तैयार थी?

बीएसपी पहले 20 सीट मांग कर रही थी फिर 12 से 13 सीट तक आ गई। मैंने कहा कि व्यावहारिक बात कीजिए। आपका (बीएसपी) एक विधायक है और दो सीटों पर आप नंबर दो पर थे पिछले चुनाव में। कुल मिलाकर 4 प्रतिशत के आसपास आपका वोट शेयर है। कुछ सीटें और ले लीजिए। इस प्रकार हम लोग उनको पांच से सात सीटें देने के लिए तैयार थे लेकिन उन्होंने कहा कि कुछ सीटें और बढ़ाइए। हम लोग इस बिंदु पर भी विचार कर रहे थे। लेकिन बीएसपी कुछ ऐसी सीटें मांग रही थी जहां उनका एक से दो प्रतिशत वोट शेयर था। मैंने कहा कि इन सीटों पर अगर आप लड़ेंगे तो हार जाएंगे। बीजेपी को ही फायदा होगा। पर ऐसा लगता है कि वो इसको नहीं समझना चाह रहे थे। इसके बात बातचीत में टूट गई। रुकावट तो पहले ही आ चुकी थी लेकिन उसको दूर किया जाता तब तक पता चला कि मायावती ने अजीत जोगी के साथ समझौता कर लिया।

क्या इससे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को ठेस नहीं पहुंचेगी?

मैं नहीं मानता कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को इससे नुकसान पहुंचेगा। ये राज्य से जुड़ा हुआ मामला है। विधानसभा चुनाव में इसका असर जरूर होगा। जहां तक बात राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की एकता का है तो वो मामला लोकसभा चुनावों से संबंधित है। उसमें अभी वक्त है। उसके बारे में अभी से कुछ कहना ठीक नहीं है।

आने वाले विधानसभा चुनाव में आपके मुद्दे क्या होंगे?

किसानी का संकट बड़ा मुद्दा है। युवाओं के रोजगार का मुद्दा है। इन सबसे ऊपर रमन सिंह सरकार का भ्रष्टाचार बड़ा चुनावी मुद्दा है। आदिवासियों के विस्थापन को भी हमारी पार्टी प्रमुखता से चुनाव प्रचार में जगह देगी। जब यूपीए की सरकार थी तब हमने फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के तहत आदिवासियों को जमीन का हक दिया था। रमन सिंह सरकार ने इसको लागू नहीं किया। इसके उलट आदिवासियों से उनकी जमीनें छीनीं जा रही हैं। हमारी सरकार में इस एक्ट को लागू किया जाएगा। हम बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाले माया-जोगी गठबंधन को भी चुनाव में एक्सपोज करेंगे।

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