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क्या राज्यसभा सदस्यता खत्म होने से खत्म हो जाएगी धुरंधर राजनेता शरद यादव की राजनीति?

फिलहाल यह कयास लगाना मुश्किल है कि राज्यसभा सदस्यता खत्म होने के बाद वे सत्ता की राजनीति में वे टिके रहते हैं या नहीं। लेकिन इतना तो तय है कि वे किसी न किसी रूप में राजनीति को प्रभावित करते रहेंगे।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया जेडीयू से निष्कासित नेता शरद यादव

सत्ता की कुर्सी पर बैठे नेता को खुद की पार्टी का बागी नेता कांटों की तरह चुभता है और वह बदला लेने से कभी नहीं चूकता। जेडीयू के बागी नेता शरद यादव और अली अनवर इसी के शिकार हुए हैं। राज्यसभा में जेडीयू संसदीय दल के नेता आरसीपी सिंह ने राज्यसभा के चेयरमैन और उप-राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के पास शरद यादव और अली अनवर की सदस्यता खत्म करने को लेकर अर्जी दी थी। और इसी अर्जी को संज्ञान में लेते हुए दोनों नेताओं की सदस्यता रद्द की गई है।

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आखिर ये नौबत आई क्यों? क्यों शरद यादव जैसे दिग्गज नेता को अपनी राज्यसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी? इस पूरी कहानी के केंद्र में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। बिहार की सत्ता को छोड़ने और दोबारा सत्ता पर काबिज होने की उनकी कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। रेलवे टेंडर घोटाले में तेजस्वी यादव पर सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज करने के बाद जिस तरह का नाटकीय घटनाक्रम चला, उसने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया। पूरे मामले में लालू, उनकी पार्टी और तेजस्वी यादव पर नीतीश कुमार ने दोष मढ़ते हुए 26 जुलाई 2017 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। और उसके अगले दिन ही यानी 27 जुलाई को फिर से उन्होंने बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इस घटनाक्रम के बाद ही जेडीयू दो धड़ों में बंट गया। शरद यादव और अली अनवर बागी हो गए। जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव पहले तो कुछ दिन चुप रहे, उसके बाद उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसी बीच आरजेडी ने एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। मना करने के बावजूद शरद यादव और अली अनवर ने लालू की सभा में शिरकत की। पार्टी के खिलाफ की गई इसी कार्रवाई को आधार बनाते हुए जेडीयू ने दोनों की राज्यसभा सदस्यता रद्द कराने में सफलता पाई।

जिस शरद यादव को जेडीयू ने निकाल दिया, उनकी देश की राजनीति में खास पहचान रही है। 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में जन्मे शरद यादव की पढ़ाई के दिनों से ही राजनीति में रुचि थी। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने 1971 में इंजीनियरिंग करने के लिए जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लेने के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई।इसी कॉलेज में शरद यादव छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए।

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ये लोहिया की प्रेरणा ही थी कि शरद यादव ने भी कई राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लिया। मीसा के तहत 1969-70, 1972 और 1975 में आंदोलन के दौरान शरद यादव हिरासत में भी लिए गए। राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रहने वाले शरद यादव की पहचान एक कुशल राजनेता के रूप में होने लगी।

डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से शरद यादव प्रेरित थे। ये लोहिया की प्रेरणा ही थी कि शरद यादव ने राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लिया।1969-70, 1972 और 1975 में आंदोलन के दौरान शरद यादव जेल भी गए। राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रहने वाले शरद यादव की पहचान एक कुशल राजनेता के रूप में होने लगी। और यही वजह है कि उन्हें 1974 में मध्य प्रदेश की जबलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला। यहां से शरद यादव पहली बार सांसद चुने गए। जिस दौर में शरद यादव सांसद चुने गए, वह दौर जेपी आंदोलन का था। 1974 के बाद 1977 में भी शरद यादव यहां से जीते।

शरद यादव के सियासी कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने राजनीतिक जीवन में मध्य प्रदेश, यूपी और बिहार में सक्रिय रहे और तीनों राज्यों में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई। मध्य प्रदेश के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश का रुख किया। यूपी के बदायूं से भी शरद यादव ने चुनाव जीता। यूपी के बाद शरद यादव बिहार पहुंचे। बिहार के मधेपुरा से 1991, 1996, 1999 और 2009 में उन्होंने जीत दर्ज की। शरद यादव को 1995 में जनता दल का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद शरद यादव का सियासी कद परवान चढ़ता चला गया। साल 1997 में वे जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। 13 अक्तूबर 1999 से 31 अगस्त 2001 तक वाजपेयी सरकार में वह नागरिक उड्डयन मंत्री रहे। 1 सितंबर 2001 से 30 जून 2002 तक वे श्रम मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री भी रहे। जनता दल यूनाइटेड की स्थापना के समय से ही वे उससे जुड़े थे। बाद में जार्ज फर्नांडिस को हराकर उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद का भी चुनाव जीता। इस चुनाव में नीतीश कुमार उनके साथ खड़े थे।

शरद यादव का राजनीतिक जीवन कई और उपलब्धियों से भी भरा हैं और उनका संसदीय जीवन भी बेहद लंबा रहा है। फिलहाल यह कयास लगाना मुश्किल है कि सत्ता की राजनीति में वे टिके रहते हैं या उससे बाहर हो जाते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि वे किसी न किसी रूप में राजनीति को प्रभावित करते रहेंगे।

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