देश

ग्रेट निकोबार मुद्दे पर जयराम रमेश का पलटवार, बोले- आदिवासी अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी की जा रही

उरांव के पिछले सप्ताह भेजे गए पत्र के जवाब में रमेश ने कहा कि मंत्री का पत्र ‘‘वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत स्थानीय जनजातीय समुदायों को मिले अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी को उचित ठहराने का प्रयास’’ प्रतीत होता है।

ग्रेट निकोबार मुद्दे पर जयराम रमेश का पलटवार, बोले- आदिवासी अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी की जा रही
ग्रेट निकोबार मुद्दे पर जयराम रमेश का पलटवार, बोले- आदिवासी अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी की जा रही फोटोः सोशल मीडिया

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल उरांव को ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पत्र लिखा और आग्रह किया कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को न केवल लागू होते हुए दिखाया जाए, बल्कि उन्हें पूरी निष्ठा और भावना के साथ वास्तविक रूप से भी लागू किया जाए।

Published: undefined

उरांव के पिछले सप्ताह भेजे गए पत्र के जवाब में रमेश ने कहा कि मंत्री का पत्र ‘‘वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत स्थानीय जनजातीय समुदायों को मिले अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी को उचित ठहराने का प्रयास’’ प्रतीत होता है।

रमेश ने कहा, ‘‘मैं 13 मई, 2026 को ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना पर लिखे गए मेरे पत्र के जवाब के लिए आपकी सराहना करता हूं। हालांकि, मुझे चिंता है कि मेरे द्वारा उठाए गए विशिष्ट कानूनी उल्लंघनों का जवाब देने के बजाय आपका पत्र वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत स्थानीय जनजातीय समुदायों को मिले अधिकारों की जानबूझकर अनदेखी को उचित ठहराने का प्रयास लगता है।’’

Published: undefined

उन्होंने कहा, ‘‘आपका यह कहना कि ‘ग्रेट निकोबार में विकास गतिविधियां अंडमान और निकोबार द्वीप (आदिवासी जनजातियों का संरक्षण) विनियमन, 1956 के तहत जारी वैधानिक दायित्वों के अनुरूप लागू की जाएंगी’, इस तथ्य के विपरीत है कि उक्त विनियमन के तहत अधिसूचित जनजातीय आरक्षित क्षेत्र से 84.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अधिसूचना से बाहर करने का प्रस्ताव है।’’

पर्यावरण मंत्री रह चुके रमेश ने कहा कि वह यह समझने में असफल हैं कि जिन जंगलों का पहले से जनजातीय समुदाय उपयोग कर रहे हैं, उन्हें 1956 के विनियमों के तहत दोबारा जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित करना किस प्रकार उक्त क्षेत्र को अधिसूचना से बाहर करने की भरपाई कर सकता है या जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा में मददगार हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अंडमान और निकोबार प्रशासन का यह दावा कि परियोजना के कारण किसी जनजातीय बस्ती को विस्थापित नहीं किया जाएगा, पूरी तरह सही नहीं है।

Published: undefined

रमेश ने कहा कि पहले चरण के लिए 130.75 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को दूसरी उपयोगिता के लिए हस्तांतरित किया जाना है और ये वन शोम्पेन जनजाति के निवास क्षेत्र का हिस्सा हैं तथा इनमें निकोबारी समुदाय की पारंपरिक भूमि और गांव शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि परियोजना प्रस्तावक के सलाहकार एईकॉम द्वारा प्रकाशित नक्शों में भी परियोजना क्षेत्र के भीतर ‘‘शोम्पेन जनजातियों का स्थान’’ चिह्नित किया गया है। कुछ निकोबारी गांव भी इन नक्शों में दर्शाए गए हैं।

रमेश ने कहा, ‘‘आप जानते हैं कि नीति आयोग ने प्रसिद्ध मानवविज्ञानी प्रोफेसर विश्वजीत पंड्या से एक रिपोर्ट तैयार करवाई थी। डॉ. पंड्या की वीडियो रिपोर्ट में एक शोम्पेन व्यक्ति स्पष्ट रूप से कहता दिखाई देता है- ‘अगर जंगल काटना है तो तट पर काटिए, हमारी पहाड़ियों पर मत आइए।’ मुझे यह देखकर झटका लगा कि प्रशासन शोम्पेन समुदाय के सदस्य द्वारा डॉ. पंड्या और उनकी टीम से कही गई इस बात की वीडियो साक्ष्य की अनदेखी कर रहा है कि उनके जंगलों को अछूता छोड़ दिया जाए।’’

Published: undefined

अपने पत्र में रमेश ने यह भी याद दिलाया कि कलकत्ता उच्च न्यायालय में 19 फरवरी, 2025 को दायर हलफनामे में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा था कि उसने 18 नवंबर, 2020 का अनापत्ति प्रमाणपत्र अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए तथ्यों के आधार पर दिया था।

उन्होंने आग्रह किया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय कलकत्ता उच्च न्यायालय में लंबित मामले में स्पष्ट और ठोस रुख अपनाए तथा यह सुनिश्चित करे कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधान पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से पूरी भावना और अक्षरशः लागू हों।

Published: undefined

उल्लेखनीय है कि 21 मई को रमेश को लिखे पत्र में ओराम ने कहा था कि उनका मंत्रालय अधिनियम के तहत वैध अधिकारों की पहचान और संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, जिसमें व्यक्तिगत वनाधिकार और सामुदायिक वनाधिकार शामिल हैं।

उरांव का पत्र रमेश के उस पहले पत्र के जवाब में था, जिसमें उन्होंने परियोजना में जनजातीय समुदायों के अधिकारों के ‘‘घोर उल्लंघन’’ का आरोप लगाते हुए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की थी।

यह पत्राचार ऐसे समय में हुआ है जब कुछ दिन पहले ही रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर दावा किया था कि यह परियोजना वहां के अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र को ‘‘नष्ट’’ कर देगी और उन्होंने सरकार से परियोजना की मौजूदा रूपरेखा पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था।

पीटीआई के इनपुट के साथ

Published: undefined

Google न्यूज़व्हाट्सएपनवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

Published: undefined