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उत्तराखंड से होने वाले पलायन को लेकर चिंता गैरजरूरी

पलायन आयोग की ताजा रिपोर्ट सारी शंकाओं को दरकिनार करती है। हालांकि, उत्तराखंड में पलायन एक बेहद भावनात्मक मुद्दा बना हुआ है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि राज्य से पलायन न तो असामान्य है और न ही चिंताजनक।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया उत्तराखंड में पलायन की वजह से खाली पड़े घर

उत्तराखंड में पलायन शब्द का बहुत भावनात्मक असर है। उत्तराखंड का लगभग हर निवासी इस विषय पर एक मजबूत विचार रखता है और यहां पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली कहावतों में से एक है: ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहां के काम नहीं आते हैं’। पहाड़ों पर न तो वहां का पानी और न वहां के युवा वहां रहने वालों के कोई खास काम आते हैं। लोगों के अंदर बड़े पैमाने पर इस तरह की भावनाओं के मद्देनजर उत्तराखंड सरकार ने पिछले साल ग्रामीण विकास और पलायन आयोग का गठन किया था, जो इस तरह की देश की पहली संस्था है।

इस आयोग ने हाल ही में अपनी पहली रिपोर्ट पेश की है। मैं बहुत ही कम समय में आयोग द्वारा बड़े पैमाने पर एकत्र किये गए माध्यमिक और प्राथमिक दोनों आंकड़ो के लिए उसकी सराहना करना चाहता हूं। मैं इस्तेमाल किये गए सर्वे के साधन की जांच की अनुपस्थिति में इसके द्वारा एकत्र किए गए प्राथमिक डेटा की गुणवत्ता पर टिप्पणी नहीं कर सकता। हालांकि, यह तथ्य सर्वेक्षण उपकरण के प्रति सम्मान पैदा करती है किइस काम के लिये दुनिया भर में एक प्रमुख शोध संस्थान के रूप में बेहद प्रतिष्ठित एनएसएसओ से संपर्क किया गया था।

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हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि एनएसएसओ से किस तरह का परामर्श लिया गया। रिपोर्ट द्वारा अपनाई गई पद्धति रैपिड मूल्यांकन और रूढ़िवादी सर्वेक्षण तकनीकों का संयोजन प्रतीत होती है। रैपिड मूल्यांकन में ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन पर विभिन्न हितधारकों, आम लोगों, नागरिक समाज, उद्यमियों, अधिकारियों और सरकारी विभागों के कर्मचारियों, मीडिया, उद्योगपतियों और अन्य की धारणाएं शामिल हैं। रूढ़ीवादी सर्वेक्षण ग्राम पंचायत स्तर पर वितरित विशेष रूप से डिजाइन की गई प्रश्नावली पर आधारित है। हम इस बात का आकलन कर रहे हैं कि इस तरह के काम को करने के लिये कर्मचारी कितनी अच्छी तरह तैयार और प्रशिक्षित थे।

इस रिपोर्ट की गंभीर खामी यह है कि इसके द्वारा एकत्र आंकड़े, सामान्य और बलपूर्वक या मजबूरी में किये गए पलायन के बीच भेदभाव करने के लिए विश्लेषण की अनुमति नहीं देते हैं। यह भेद काफी महत्वपूर्ण हैं।

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पलायन एक ऐसी घटना है जो प्राचीन काल से मानव जीवन का हिस्सा रही है। वास्तव में, अगर यह पलायन नहीं होता, तो होमो सेपियंस अभी भी पूर्वी अफ्रीका में रह रहे होते। वास्तव में चिंता का विषय बलपूर्वक या मजबूरी में किया गया पलायन होना चाहिए। बलपूर्वक या मजबूरी में किये जाने वाले पलायन को रोकना या कम करना सरकारों की प्राथमिक चिंता होनी चाहिए।

रिपोर्ट के त्वरित अध्ययन से दो व्यापक निष्कर्ष सामने आते हैं। पहला, व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने पर पलायन का मुद्दा अलग नहीं है, या देश के बाकी हिस्सों से अलग तरह का है। दूसरा, पलायन के कारणों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में यह रिपोर्ट हमें कुछ भी नया नहीं बताती है; यह केवल पहले से ज्ञात तथ्यों की पुष्टि करती है।

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दस वर्षों में प्रति ग्राम पंचायत 30 प्रवासियों के राज्य औसत को देखते हुए, हम पाते हैं कि बागेश्वर और पौड़ी दो जिलों के ग्राम पंचायत पलायन के राज्य औसत के बराबर या बहुत करीब हैं। रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, चमोली, चंपावत और देहरादून 5 जिलों में स्थायी प्रवासियों की संख्या राज्य औसत से अधिक है, जिनमें देहरादून में यह संख्या (53) सबसे ज्यादा है। शेष 6 जिले राज्य के औसत से नीचे आते हैं और इसमें आश्चर्य नहीं है कि उधम सिंह नगर और हरिद्वार में यह संख्या सबसे कम है।

असली आश्चर्य तो एक तरफ पौड़ी और अल्मोड़ा और दूसरी ओर देहरादून के आंकड़े देखकर होता है। पौड़ी और अल्मोड़ा आमतौर पर उच्चतम पलायन दर वाले जिलों के रूप में जाने जाते हैं, जो कि इस तथ्य से प्रमाणित है कि 2001 से 2011 के बीच यहां की जनसंख्या वृद्धि दर नकारात्मक रही है।

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आमतौर पर प्रवासियों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला देहरादून जिला वास्तविक आश्चर्य के रूप में सामने आता है, क्योंकि राज्य में यहां का पलायन दर अधिकतम है। इस पहेली का जवाब शायद इस तथ्य में निहित है कि दून घाटी में जहां प्रवासी आते हैं, तो जौनसर-बावर क्षेत्र में स्थिति इसके उल्टा दिखाई देती है।

पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा की स्थिति का विरोधाभास अर्द्ध स्थायी प्रवासियों के आंकड़े शामिल कर हल नहीं किया जाता। इस तरह हम पाते हैं कि 10 साल की अवधि में राज्य में अर्द्धस्थायी प्रवासियों की संख्या 60 हो गई है, जबकि पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा में यह आंकड़ा क्रमश: 46 और 52 है।

पिछले दस वर्ष की अवधि में संबंधित जिलों के 2011 की जनगणना के प्रतिशत के तौर पर प्रवासियों का आंकड़ा स्थिति को आगे स्पष्ट करता है। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि चार जिलों में स्थायी और अर्द्ध स्थायी दोनों प्रवासियों की दर सबसे कम है। इनमें से दो, उधम सिंह नगर और हरिद्वार मुख्य रूप से मैदानी क्षेत्र में स्थित हैं और देहरादून और नैनीताल जैसे जिले आंशिक मैदानी क्षेत्र में स्थित हैं।

इन आंकड़ों के आधार पर, निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:

स्थायी और अर्द्ध स्थायी पलायन दोनों की दरें मैदानी जिलों के साथ राज्य के औसत की तुलना में पहाड़ी जिलों में अधिक है। स्थायी पलायन के इस पैटर्न का एक अपवाद उत्तरकाशी है।

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2001 और 2011 के बीच नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि वाले अल्मोड़ा और पौड़ी गढ़वाल जिलों में स्थायी और अर्द्ध स्थायी पलायन दोनों की दर अन्य पहाड़ी जिलों की तुलना में बहुत अलग नहीं है। हालांकि, पौड़ी गढ़वाल में स्थायी पलायन की दर 3.72 प्रतिशत के साथ उच्चतम है, जबकि अल्मोड़ा में बहुत कम 2.60 प्रतिशत है; अल्मोड़ा में अर्द्ध स्थायी पलायन की दर (8.61 प्रतिशत) पौड़ी गढ़वाल (6.91 प्रतिशत) से अधिक है।

कुल मिलाकर राज्य में स्थायी और अर्द्ध स्थायी पलायन की दरें अपेक्षाकृत मामूली हैं और निश्चित तौर पर इतनी नहीं हैं कि पलायन की वजह से जनसंख्या में कमी को लेकर गैरजरूरी चिंता खड़ी होती हो।

(लेखक दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के मानद निदेशक हैं)

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