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उत्तर प्रदेशः ईमानदार आईपीएस जसवीर सिंह को 17 साल पहले किये ‘असली’ जुर्म की सजा तो मिलनी ही थी

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी जसवीर सिंह को बमुश्किल 6 महीने पहले ही फील्ड पोस्टिंग मिली थी। लगभग 17 साल पहले महाराजगंज में तैनाती के दौरान जसवीर सिंह ने दंगा भड़काने के आरोप में योगी आदित्यनाथ पर रासुका (एनएसए) के तहत कार्रवाई की थी।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक जसवीर सिंह को एक वेबसाइट से बातचीत करने के ‘जुर्म’ में पिछले सप्ताह निलंबित कर दिया गया। दरअसल मीडिया से बातचीत महज एक बहाना है। असली ‘जुर्म’ तो उन्होंने 17 साल पहले किया था जब बतौर महाराजगंज एसएसपी उन्होंने तत्कालीन गोरखपुर सांसद योगी आदित्यनाथ को सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने के लिए गिरफ्तार किया था।

और अब वही योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। तो ऐसे में जसवीर सिंह को सजा तो मिलनी ही थी। जसवीर सिंह को योगी के मुख्यमंत्री बनते ही सजा मिलनी शुरू हो गई थी। 2017 में उन्हें बतौर एडीजी फायर विभाग में भेज दिया गया था। पुलिस महकमे में यह एक पनिशमेंट पोस्टिंग मानी जाती है, क्योंकि यहां कोई ज्यादा काम नहीं होता। लेकिन फिर भी अपनी आदत के मुताबिक जसवीर सिंह ने वहां फैले भ्रष्टाचार को उजागर करना शुरू किया तो उन्हें वहां से हटाकर होमगार्ड विभाग में भेज दिया गया, जहां और भी कम काम होता है।

लेकिन वह वहां भी चुप नहीं बैठे। पिछले साल बतौर एडीजी होमगार्ड उन्होंने होमगार्ड्स की यूनिफॉर्म की खरीद में गड़बड़ी उजागर करने के साथ ही अधिकारियों के यहां भेजी जाने वाली सरकारी गाड़ियों में तेल भराने से इंकार कर दिया था। इसके बाद उन्हें वहां से भी हटाकर रूल्स एंड मैन्यूअल्स विभाग का एडीजी बना दिया गया। अब यहां उनके करने के लिए बिल्कुल काम नहीं था। केवल एक 10 गुणा 10 के कमरे वाला ऑफिस था, जहां वह रोज सुबह साढे नौ बजे पहुंच जाते और शाम छह बजे तक अपने साथ लाई किताबें पढ़ते रहते। ठीक 6 बजे घर जाते और संगीत साधना करते।

यहां रहने के दौरान उन्होंने पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर कोई काम दिए जाने का आग्रह किया था। लेकिन उनसे कहा गया कि आप अपना ‘रिसर्च’ करें। इस पर उन्होंने पूछा कि किस पर रिसर्च करूं, तो उनसे कहा गया- अपने मनपसंद विषय पर। इसके बाद उन्होंने लिखकर पूछा कि जिस विभाग में जब कोई काम ही नहीं होता है, तो उसे 1984 में बनाया क्यों गया था? पिछले 35 सालों से उस पर अनावश्यक खर्च क्यों किया जा रहा है? इस सवाल का जवाब उन्हें आज तक नहीं मिला है।

1992 बैच के आईपीएस जसवीर सिंह की छवि एक निर्भीक और ईमानदार अधिकारी की है। उन्होंने योगी आदित्यनाथ ही नहीं बल्कि उन सभी के खिलाफ उतनी ही सख्ती से कार्रवाई की जिन्हें उन्होंने कहीं भी कोई भी गलत काम करते पाया। लेकिन अपने लगभग 27 साल के करियर में वह बमुश्किल छह महीने ही फील्ड पोस्टिंग में रहे जहां वह जनता से जुड़े मामलों को सीधे देख सकते थे। बाकी साढ़े छब्बीस साल उन्हें उन पदों पर रखा गया जिन्हें “साइड पोस्टिंग’ माना जाता है।

इसी से परेशान होकर वह 2012-13 में कानून की पढ़ाई करने स्टडी लीव पर चले गए। इस दौरान वह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फैकल्टी भी रहे। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ वह लगातार लड़ते रहे। उन्होंने देश और विदेश में मौजूद काला धन उजागर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। इसी की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को काले धन पर विशेष कार्य दल (एसआईटी) बनाने का आदेश दिया था। जिसका पालन करते हुए प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएम मोदी ने एसआईटी का गठन किया था।

राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 1997 में जसवीर को प्रतापगढ़ का एसपी बनाया था। वहां उन्होंने हत्या के एक मामले में निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को गिरफ्तार किया था। लेकिन इसके एक सप्ताह बाद ही उन्हें जिले से हटा दिया गया। राजा भैया भी योगी के करीबी विधायकों में माने जाते हैं और योगी के कहने पर ही पिछले साल राज्यसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को वोट दिया था।

योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जसवीर सिंह ने तब कार्रवाई की जब 2007 में उन्हें महाराजगंज का एसएसपी बनाया गया। उस दौरान एक कार्यकर्ता की हत्या के मामले को लेकर योगी ने सड़क जाम किया था। पुलिस ने हटाने की कोशिश की तो योगी और उनके कार्यकर्ता पुलिस से भिड़ गए। इसके बाद पूरे जिले में दंगे भड़क उठे। इस मामले में योगी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत गिरफ्तार किया गया था।

इस मामले में उन्हें 11 दिन तक जेल में रहना पड़ा और स्थिति सामान्य होने के बाद ही छोड़ा गया। इस घटना के बाद वह दिल्ली पहुंचे और लोकसभा में शून्यकाल के दौरान अपनी गिरफ्तारी के मुद्दे को उठाते हुए फूट-फूट कर रोए। इस दौरान योगी ने ये भी कहा कि पूरे जीवन में इतना अपमान कभी नहीं हुआ। इसके बाद जसवीर को महाराजगंज में नियुक्ति के महज 16 दिनों बाद ही हटाकर फूड सेल भेज दिया गया।

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फूड सेल पहुंचकर उन्होंने खाद्यान्न चोरी की शिकायतों की छानबीन शुरू कर दी। लखीमपुर खीरी के एक मामले से शुरू हुई जांच में मालूम चला कि हजारों करोड़ का राशन दूसरे प्रदेशों को ही नहीं, दूसरे देशों में भी भेजा जा रहा था। उन्होंने दस्तावेजों के साथ सारा मामला सरकार को सौंपकर सीबीआई से जांच कराने की मांग की थी। इस मामले में जांच की सुई तत्कालीन एसपी महासचिव अमर सिंह और बाहुबली राजा भैया की ओर इशारा कर रही थी।

निलंबन का कारण बने वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट को दिए साक्षात्कार में जसवीर सिंह ने कहा, “वे राजनीतिक लोगों के प्रति वफादारी चाहते हैं। यह असंवैधानिक है। यदि हम विरोध नहीं करेंगे तो चीजें कभी नहीं बदलेंगी। मैं जनता की सेवा करने के लिए पुलिस में आया था, न कि राजनेताओं की। अपराध के मामलों में मैं कोई समझौता नहीं करता। यदि मैं आईपीएस अफसर हूं तो मुझे कुछ मूल्यों की रक्षा तो करनी ही होगी।”

आईपीएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के एक पदाधिकारी कहते हैं कि जसवीर ने साक्षात्कार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ उन्हीं मूल्यों की बात की जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान सिखाया जाता है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ये भी कह दिया कि वे खुलकर उनके निलंबन का विरोध नहीं कर सकते क्योंकि जसवीर ने सरकारी नियमों का उल्लंघन किया है, जिनके अनुसार बिना सरकार की इजाजत के मीडिया से बात नहीं कर सकते।

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