
पिछले 18 साल से लगातार अफगानिस्तान की आधारभूत संरचना को खड़ा करने में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर मदद कर रहे भारत को अफगान शांति वार्ता से अलग रखा गया है। पिछले कई सालों से अफगानिस्तान को संवारने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश भारत करता आ रहा है, लेकिन अब जब अमेरिका ने वहां से निकलने के लिए तालिबान से शांति वार्ता करने का फैसला लिया तो भारत को साइड लाइन कर दिया गया है।
इसमें हैरान करने वाली बात ये है कि इस शांति वार्ता में तालिबान के सबसे बड़े स्पॉन्सर पाकिस्तान को न सिर्फ शामिल किया गया है, बल्कि उसे अहम जिम्मेदारी भी दी गई है। पिछले सप्ताह तालिबान के साथ शांति समझौते का मसौदा तैयार करने में अमेरिका, रूस और चीन के साथ पाकिस्तान ने भी भूमिका निभाई थी। दरअसल मौके का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्र की भूगोलीय राजनीति के केंद्र में स्थापित कर लिया है।
पिछले सप्ताह तैयार शांति समझौते के स्वरूप के बाद 12 जुलाई को पेइचिंग में 'साझा बयान' जारी करने को लेकर चारों देशों के बीच एक बैठक में चर्चा हुई। इस बैठक से साफ हो गया कि अफगानिस्तान की स्थिति सुधारकर उसे खड़ा करने की भारत की लंबे समय से चली आ रही कोशिशों पर पानी फेर दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत में अफगानिस्तान के पूर्व राजदूत और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार शाइदा अब्दाली ने कहा कि अफगानिस्तान के साथ रिश्तों को मजबूत करने की भारत की 18 वर्षों की कोशिशों को इस मोड़ पर विफल नहीं होना चाहिए। अब्दाली ने कहा कि पैदा हुए नये हालात में भारत के प्रति उदासीनता की वजह से अफगानिस्तान को भविष्य में बड़ा नुकसान हो सकता है।
हालांकि, इस शांति प्रतिक्रिया में भारत की भूमिका नहीं होने के मुद्दे पर भारत की चिंताएं फिलहाल सामने नहीं आई हैं। वैसे भारत को अफगानिस्तान की राजनीति में हो रहे परिवर्तन से अलग-थलग करने के संकेत इस बात से भी मिलते हैं कि भारत की अनिच्छा के बावजूद अफगानिस्तान में अमेरिका के राजदूत जॉन बास ने कहा कि देश में सिंतबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को तालिबान के साथ शांति वार्ता के पूरा होने तक टाला जा सकता है। भारत शुरू से इसके खिलाफ रहा है।
बीते दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो के भारत दौरे के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने उनसे कहा था कि शांति प्रक्रिया के बीच भी अफगानिस्तान का राष्ट्रपति चुनाव कराया जा सकता है। इससे पहले भारत ने अमेरिका और रूस के सामने अफगानिस्तान में अंतरिम सरकार के गठन के प्रस्ताव का भी विरोध किया था। लेकिन भारत की इन तमाम चिंताओं को न सिर्फ दरकिनार कर दिया गया है, बल्कि भारत को ही इस पूरी प्रक्रिया से साइड लाइन कर दिया गया है।
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