
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच खुद को एक मीडिएटर के तौर पर पेश करके अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की भरपूर कोशिश की। हालांकि, पाकिस्तान की भूमिका को लेकर ईरान और अमेरिका दोनों के अधिकारियों की तरफ से सवाल उठते रहे हैं।
इसी बीच अमेरिकी मीडिया ने खुलासा किया कि एक तरफ पाकिस्तान खुद को मीडिएटर के तौर पर आगे कर रहा था और दूसरी तरफ उसने ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरफील्ड पर पार्क करने की अनुमति दी, ताकि उन्हें संभावित अमेरिकी हमले से बचाया जा सके। इस पर अमेरिकी सीनेटर और राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी लिंडसे ग्राहम ने भी सवाल उठाए हैं।
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सीबीएस न्यूज की रिपोर्ट साझा करते हुए अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराने में पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "अगर यह रिपोर्ट सही है, तो ईरान, अमेरिका और अन्य पक्षों के बीच मीडिएटर के तौर पर पाकिस्तान जो भूमिका निभा रहा है, उसकी पूरी तरह से समीक्षा किए जाने की जरूरत है।"
अमेरिकी सीनेटर ने कहा, "इजरायल को लेकर पाकिस्तानी रक्षा अधिकारियों के पहले दिए गए कुछ बयानों को देखते हुए, अगर यह सच निकला तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी।"
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बता दें कि अमेरिकी मीडिया संस्थान सीबीएस ने इस मामले की जानकारी रखने वाले अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया कि पाकिस्तान ने खुद को तेहरान और वॉशिंगटन के बीच एक कूटनीतिक माध्यम के रूप में पेश किया था। इसी दौरान उसने चुपचाप ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरफील्ड पर पार्क करने दिया, ताकि वे संभावित अमेरिकी हवाई हमलों से बच सकें।
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, ईरान ने पड़ोसी देश अफगानिस्तान में भी कुछ सिविलियन एयरक्राफ्ट पार्क करने के लिए भेजे थे। दो अधिकारियों ने सीबीएस न्यूज को बताया कि फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें सैन्य विमान भी शामिल थे या नहीं।
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अमेरिकी अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर नाम न बताने की शर्त पर कहा कि अप्रैल की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा किए जाने के कुछ दिनों बाद तेहरान ने पाकिस्तान एयर फोर्स के नूर खान बेस पर कई विमान भेजे। यह बेस पाकिस्तानी गैरीसन शहर रावलपिंडी के बाहर स्थित एक रणनीतिक सैन्य ठिकाना है।
इन विमानों में ईरानी एयर फोर्स का एक आरसी-130 विमान भी शामिल था, जो लॉकहीड सी-130 हरक्यूलिस टैक्टिकल ट्रांसपोर्ट विमान का टोही और खुफिया जानकारी जुटाने वाला वेरिएंट है।
हालांकि, पाकिस्तान के इतिहास पर नजर डालें तो इस तरह के आरोपों से हैरानी नहीं होती। 9/11 हमलों के समय भी पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे।
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दरअसल, अमेरिका में हुए 11 सितंबर 2001 को हुए हमले (9/11 अटैक) के बाद से यूएस को संदेह था कि इस हमले के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान ने पनाह दी है। हालांकि, पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा। फिर अमेरिका ने पाकिस्तान में 2 मई 2011 को एक गुप्त ऑपरेशन के तहत आतंकी ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, जिसके बाद से दोनों देशों के संबंधों में तनाव आ गया।
हाल ही में पेंटागन के एक पूर्व अधिकारी ने भी यही बात कही थी कि ट्रंप सरकार में भले ही पाकिस्तान और अमेरिका के बीच नजदीकी बढ़ रही है, लेकिन दूसरी सरकार में पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जाएगा, ना ही मुनीर के किसी भी वादे को पूरा करने के लिए खुद को मजबूर पाएगा।
इसके अलावा, ईरान की तरफ से भी पाकिस्तान के मीडिएटर की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।
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