कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में अफगानिस्तान में गहराते मानवीय संकट का जिक्र किया गया है, जहां कथित तौर पर अत्यधिक गरीबी परिवारों को भोजन, इलाज या कर्ज से राहत पाने के लिए अपने बच्चों को बेचने पर मजबूर कर रही है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि ऐसी घटनाएं अब कोई इक्का-दुक्का मामले नहीं हैं बल्कि एक बड़े संकट का हिस्सा हैं, जिसमें अब तीन-चौथाई अफगान अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।
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अफगानिस्तान के बिगड़ते मानवीय संकट ने परिवारों को जिंदा रहने के लिए एक अकल्पनीय कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। अपने बच्चों को बेचना, और अक्सर अपनी बेटियों को भी। ये मीडिया रिपोर्ट्स अत्यधिक गरीबी, भूख, बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती को इसके मुख्य कारणों के तौर पर दिखाती हैं, और तालिबान द्वारा महिलाओं और लड़कियों पर लगाई गई पाबंदियों ने इस स्थिति को और भी बदतर बना दिया है।
इस सप्ताह घोर प्रांत से आई एक मीडिया रिपोर्ट में कई ऐसे परिवारों को दिखाया गया, जो अत्यधिक भूख और बेरोजगारी के चलते अपनी बेटियों को बेचने पर मजबूर हो गए। इनमें से एक पिता, सईद अहमद ने बताया कि उन्हें अपनी पांच साल की बेटी, शाइका को बेचने पर मजबूर होना पड़ा, ताकि उसकी जान बचाने के लिए लिवर सिस्ट और अपेंडिसाइटिस की सर्जरी करवाई जा सके। उन्होंने यह शर्त रखी थी कि खरीदार शाइका को तभी अपने साथ ले जा सकेगा, जब उसकी जरूरी मेडिकल सर्जरी पूरी हो जाएगी। शाइका की सर्जरी सफल रही। सर्जरी का खर्च उस पैसे से उठाया गया, जो उसे 200,000 अफगानी (3,200 अमेरिकी डॉलर से भी कम) में बेचने से मिला था।
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रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि हर चार में से तीन अफगान अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। लगभग 50 लाख लोग भूख के आपातकालीन स्तर का सामना कर रहे हैं, और कुपोषण तथा स्वास्थ्य सेवाओं के पूरी तरह ठप हो जाने के कारण बच्चों की मौतें भी बढ़ रही हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बेरोजगारी अपने चरम पर है, स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह जूझ रही हैं, और वह मदद, जो कभी लाखों लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करती थी, अब घटकर पहले के मुकाबले बहुत ही कम रह गई है।
संयुक्त राष्ट्र (यूएन के आंकड़ों के अनुसार, हर चार में से तीन अफगान अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। माता-पिता का कहना है कि भुखमरी से बचने का उनके पास बच्चों को बेचने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा है। एक परेशान पिता ने अपने दो बच्चों - सात साल की जुड़वां बेटियों, रोकिया और रोहिला का परिचय कराते हुए ब्रिटिश पब्लिक ब्रॉडकास्टर को बताया कि वह इतने गरीब, कर्ज में डूबे और बेबस हो चुके हैं कि अपनी बेटियों को बेचने के लिए भी तैयार हैं।
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इससे पहले आई रिपोर्ट्स में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें माता-पिता ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को इसलिए बेच दिया, क्योंकि उनके दूसरे बच्चे भूख से मर रहे थे। ये रिपोर्ट्स इस बात को उजागर करती हैं कि यह कोई इक्का-दुक्का या अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि अब यह एक आम चलन या पैटर्न बनता जा रहा है।
जानकारों का कहना है कि तालिबान के सत्ता में लौटने और ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय मदद बंद हो जाने के बाद से यह संकट और भी गहरा गया है। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए घोर गरीबी ही आम बात बन गई है, न कि कोई अपवाद।
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यूएन की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि अनुमानों के मुताबिक, 2025 में अफगानिस्तान में लगभग 2.8 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे थे। बड़ी संख्या में लोगों के वापस लौटने, सूखे की स्थिति और बिगड़ने और अंतरराष्ट्रीय मदद में कमी आने से यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भले ही अफगानिस्तान में लगातार दूसरे साल आर्थिक विकास दर्ज किया गया हो, लेकिन 2025 में वास्तविक जीडीपी में सिर्फ 1.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
यह पिछले साल के 2.3 प्रतिशत के मुकाबले कम है। वहीं, आबादी में बढ़ोतरी की दर 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी में अनुमानित 2.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
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