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मिडिल ईस्ट जंग: क्या कुछ हासिल हुआ इस युद्ध से?

ईरान के अंदर, बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं, लेकिन सरकार के विरोध में नहीं, बल्कि युद्ध के विरोध में। उनके प्रदर्शन विदेशी हमलावर के प्रति आक्रोश और राज्य के साथ एकजुटता जता रहे हैं।

फोटो: ai generated images
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अहंकारी और शक्तिशाली नेताओं की खासियत होती है कि एक विशेष प्रकार के रणनीतिक जाल में बार-बार फंसते ही रहते हैं। सीमित उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया युद्ध शुरुआत में सामरिक सफलता तो हासिल कर लेता है, लेकिन समय के साथ उस एक लक्ष्य से ही परिभाषित होता है, जिसे वह हासिल नहीं कर पाता। वियतनाम के मामले में, यह हनोई में सरकार का पतन था। इराक में इसका मकसद एक मनमाफिक आज्ञाकारी राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना थी। अफगानिस्तान में इसका मकसद तालिबान को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उखाड़ फेंकना था। ईरान के खिलाफ मौजूदा अमेरिका-इसराइल युद्ध में, वह महत्वाकांक्षी लक्ष्य ‘सत्ता परिवर्तन’ है।

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अपनी अत्यधिक शक्तिशाली मारक क्षमता के बावजूद, हमलावर इस्लामी गणराज्य को धराशाई करने में सफल नहीं हो पाए हैं। इसके विपरीत, उसने न सिर्फ और ज्यादा सख्त रुख अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है, बल्कि विदेशी हमले के मद्देनजर राष्ट्रवादी भावना में आए उछाल से भी लाभ उठाया है।

युद्ध के प्रथम चरण को ईरानी नेतृत्व और उसके सैन्य ढांचे के खिलाफ अभियान के रूप में प्रस्तुत किया गया था और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या को निर्णायक प्रहार माना गया था। ईरान की प्रमुख कमान संरचनाओं को निशाना बनाया गया, उसके वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों को मार डाला गया, और उसकी कथित परमाणु सुविधाओं पर फिर से बमबारी की गई। संघर्ष के शुरुआती दौर में, यह तर्क भी संभव था कि अभियान मुख्य रूप से शासन के खिलाफ निर्देशित था।

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लंबे समय से इस्लामी गणराज्य से नाराज कई ईरानियों को भी शायद शुरू में इन हमलों में उम्मीद दिखी होगी, उन्होंने हमले को उस सरकार के लिए एक सीधी चुनौती के तौर पर देखा होगा जिसने असहमति को दबाया और आजादी को सीमित किया। लेकिन यह भावना जल्द ही खत्म हो गई। युद्ध के पहले ही दिन, मीनाब में लड़कियों के एक प्राथमिक स्कूल पर हुए हमले में 186 छात्राएं और उनकी शिक्षिका मारी गईं। युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ा, ट्रंप प्रशासन के लिए इसमें शामिल होने के कारण बदलते गए और उनकी लक्ष्य सूची में तेल संयंत्र, विलवणीकरण संयंत्र, नागरिक विमान और बुनियादी ढांचा, यहां तक ​​कि यूनेस्को धरोहर स्थल तक शामिल हो गए। अब आम ईरानियों के लिए, यहां तक ​​कि उनके लिए भी जो शासन से नफरत करते थे, स्पष्ट हो गया था कि यह युद्ध उनकी मुक्ति के लिए नहीं था।

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यह परिवर्तन राजनीतिक रूप से निर्णायक है। सत्ता परिवर्तन महज सैन्य परिणाम नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया है। इसके लिए सत्ताधारी अभिजात वर्ग का बिखराव, सत्ता हथियाने में सक्षम एक संगठित विपक्ष और एक ऐसी जनता की जरूरत होती है, जिसका आक्रोश विदेशी हमलावर के बजाय अपने ही शासकों पर केन्द्रित हो। अमेरिका ने इस आक्रोश को अपने ही खिलाफ मोड़ लिया है।

मोजतबा खामेनेई का नए सर्वोच्च नेता के रूप में पदस्थापन उसकी इसी विफलता का उदाहरण है। उनके पिता की हत्या से संस्थागत अराजकता उत्पन्न होने की आशंका थी, जिससे इस्लामी गणराज्य अस्थिर हो सकता था। इसके विपरीत, सिस्टम ने बड़ी तेजी से चीजों पर काबू पा लिया। नेतृत्व में परिवर्तन जरूर हुआ, लेकिन शासन व्यवस्था कायम रही। दरअसल, नए नेता ने सत्ता ऐसे हालात में संभाली है जो उनकी सत्ता को कमजोर करने के बजाय और मजबूत करने वाले साबित हो रहे हैं। युद्धकाल में सत्ता हस्तांतरण अक्सर शासन व्यवस्था को मजबूत ही करता है क्योंकि नेतृत्व परिवर्तन राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर होता है। युवा खामेनेई अब संकटग्रस्त हालात में निरंतरता का प्रतीक बन चुके हैं।

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अमेरिका और इजसराइल को शायद याद नहीं रहा कि ईरान के पास अपने मामलों में विदेशी हस्तक्षेप की यादें अब भी बनी हुई हैं। एक सदी से भी अधिक समय से, ईरानियों ने बाहरी शक्तियों द्वारा देश के संसाधनों का दोहन करने के इरादे से इसकी राजनीति को नया रूप देने के बार-बार किए गए प्रयासों का सामना किया है। 1891-92 का तंबाकू विरोध प्रदर्शन, जब राजशाही ने एक ब्रिटिश कंपनी को ईरान के तंबाकू उद्योग पर नियंत्रण प्रदान किया और फिर बड़े पैमाने पर हुए बहिष्कार ने कंपनी को रियायतें रद्द करने के लिए मजबूर कर दिया, विदेशी आर्थिक प्रभुत्व के खिलाफ देश के पहले संगठित जन प्रतिरोध प्रदर्शनों में से एक था।

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1953 में, अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर ईरान के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ को सत्ता से इसलिए बेदखल कर दिया, क्योंकि उन्होंने देश के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इस तख्तापलट ने मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता में बहाल कर दिया और पश्चिमी सरकारों द्वारा समर्थित दशकों के सत्तावादी शासन की शुरुआत की। यही वह हालात थे जिन्होंने उस आक्रोश और असंतोष को जन्म दिया जिसने अंततः 1979 की क्रांति को हवा दी और देश के राजनीतिक भविष्य को नया आकार दिया।

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क्रांति के बावजूद ईरान के राष्ट्रीय विकास पर बाहरी दबाव बना रहा। 1980 के दशक में, सद्दाम हुसैन द्वारा ईरान पर किए गए हमले के दौरान अमेरिका ने इराक का समर्थन किया। यह आठ साल तक चला एक क्रूर युद्ध था जिसमें लाखों ईरानी नागरिकों की जान गई। बाद के दशकों में, वाशिंगटन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की लहरों ने ईरानी अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया, जिससे उसके नागरिकों को भारी मुश्किलें झेलनी पड़ीं।

यह ऐतिहासिक संदर्भ बताता है कि मौजूदा युद्ध अपने इच्छित प्रभाव के विपरीत नतीजे क्यों दे रहा है। यह संघर्ष शासन को उसके समाज से अलग-थलग करने के बजाय, शासन के उस प्रमुख आख्यान को ही और मजबूत कर रहा है कि ईरान एक ऐसा राष्ट्र है जिस पर बाहरी खतरा लगातार बना हुआ है। ईरानी राजनीति के अत्यंत अहम मुद्दे संप्रभुता और आत्मनिर्णय एक बार फिर चर्चा के केन्द्र में हैं। यहां तक ​​कि राजनीतिक सुधार और अधिक स्वतंत्रता की मांग करने वाले मुखर ईरानी भी मुक्ति के नाम पर अपने देश के विनाश के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं।

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ईरानी प्रवासी समुदाय के अनेक लोग, जो शुरू में अमेरिकी सैन्य अभियान के समर्थन में थे, इस युद्ध के बदलते रुख से भ्रमित हैं। उनका मानना ​​था कि एक सीमित युद्ध इस्लामी गणराज्य के पतन को गति दे सकता है, जो कि उनकी दिली इच्छा भी थी, लेकिन ईरान में बुनियादी नागरिक ढांचे का अंधाधुंध विनाश और आम नागरिकों की जान की हानि ऐसी कीमत है जिसे वे भी चुकाने को तैयार नहीं हैं। यहां तक ​​कि वे लोग भी, जो कभी शासन के प्रतिरोध का प्रतीक होते थे, अपने देश को खून से लथपथ देख नैतिक दुविधा में फंसे दिख रहे हैं।

ईरान के अंदर, बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं, लेकिन सरकार के विरोध में नहीं, बल्कि युद्ध के विरोध में। उनके प्रदर्शन विदेशी हमलावर के प्रति आक्रोश और राज्य के साथ एकजुटता जता रहे हैं।

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अमेरिका और इजराइल के लिए, यह नतीजे विरोधाभासी और समझ से परे हैं। युद्ध ने ईरान के सैन्य, परमाणु और नागरिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन यह भी सही है कि इसने सत्ता को राजनीतिक रूप से मजबूती भी दी है। आम ईरानियों की नजर में, इस्लामी गणराज्य आज न सिर्फ देश पर शासन करने वाला तंत्र है, बल्कि वे लोग भी हैं जो विदेशी हमलों से देश की रक्षा करते हैं। यह परिणाम पश्चिम एशिया में पश्चिमी देशों के कई हस्तक्षेपों की अस्पष्टता को भी उजागर करता है। सैन्य श्रेष्ठता स्वतः ही राजनीतिक परिवर्तन में तब्दील नहीं हो जाती। बमबारी अभियान क्षमताओं को कमजोर कर सकते हैं, नेताओं को मार सकते हैं, लेकिन वे वैधता का निर्माण तो नहीं कर सकते या यह निर्धारित नहीं कर सकते कि कोई समाज बाहरी हिंसा की व्याख्या किस तरह करता है।

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(अशोक स्वैन स्वीडन के उप्सला विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष अनुसंधान के प्रोफेसर हैं)

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