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संसद जाती हर सड़क पर उतरा गुस्साए युवाओं का सैलाब, जिससे हिल गई सरकार, विपक्ष हो उठा उद्धेलित

रविवार के 'संसद चलो मार्च' ने एक ऐसा संदेश दिया जिसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था: बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहमति के लिए सिकुड़ती जगह के बावजूद, जनता का गुस्सा अब भी सामूहिक रूप से सामने आ सकता है।

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Getty Images RITESH SHUKLA

यह किसी राजनैतिक दल की रैली नहीं थी। न ही इसे किसी मज़बूत संगठनात्मक तंत्र का समर्थन हासिल था। फिर भी, सोनम वांगचुक और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) द्वारा बुलाए गए "संसद चलो" मार्च के लिए रविवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अलग-अलग शहरों, सामाजिक पृष्ठभूमियों और राजनीतिक विचारधाराओं वाले लाखों नहीं तो हजारों लोग इकट्ठा हो गए।

देश की राजधानी के एकदम बीचों-बीच जो कुछ हुआ, उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की पारंपरिक जगह, जंतर-मंतर पर पिछले कुछ सालों में अनगिनत आंदोलन हुए हैं। लेकिन हाल के समय में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ़ इतने विविध और भावनात्मक रूप से जुड़े लोगों की भीड़ शायद ही किसी आंदोलन में जुटी हो।

नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक और गड़बड़ियों के विरोध तथा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग के तौर पर शुरू हुआ यह आंदोलन, पिछले एक महीने में धीरे-धीरे असंतोष की व्यापक अभिव्यक्ति में बदल चुका है।

संसद चलो मार्च के दौरान कई जगह युवाओ-छात्रों को पुलिस ने रोकने की कोशिश भी की। नीचे देखिए हमारे फोटोग्राफर विपिन द्वारा ली गई तस्वीरें

उमस भरी गर्मी, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, कई लेयर की बैरिकेडिंग और आस-पास के मेट्रो स्टेशनों के बंद होने के बावजूद, हज़ारों लोग विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर पहुंच गए। संसद के आस-पास का इलाका किसी सुरक्षा ज़ोन जैसा लग रहा था, जहां दिल्ली पुलिस और आरपीएफके जवान अहम रास्तों पर तैनात थे।

लेकिन लोगों का आना रुका नहीं।

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छात्र, युवा नौकरीपेशा और प्रोफेशनल्स, एक्टिविस्ट्स और आम लोग जंतर-मंतर की ओर जाने वाली पतली गलियों से धरना स्थल पर पहुंचते जा रहे थे। कई लोगों ने ढोल इस दौरान ढोल बजा रहे थे, कुछ प्लेकार्ड लहरा रहे थे और धर्मेंद्र प्रधान और मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे थे। उनका गुस्सा सिर्फ परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं था, वे हर नाकामी पर जवाबदेही की मांग कर रहे थे।

एक प्लेकार्ड पर लिखा था: "टैक्स दो, चंदा दो, और फेल एजुकेशन सिस्टम की बात पर चुप रहो।"

दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक लॉ स्टूडेंट ने पूछा, "वे उन छात्रों की  की बात नहीं सुन रहे हैं जो देश का भविष्य हैं। अगर वे हमारी बात नहीं सुनेंगे, तो किसकी सुनेंगे?" कथित पेपर लीक से वह सीधे तौर पर प्रभावित नहीं थीं। लेकिन उन्होंने कहा कि असल बात यह नहीं है। उन्होंने कहा, "देश का भविष्य पूरी तरह से नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।"

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, यह साफ़ होता गया कि विरोध अब प्रधान के इस्तीफ़े की मांग तक ही सीमित नहीं रहा। नारे अब और बढ़ गए थे। ज़्यादातर नारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर केंद्रित थे। केरल भवन के पास, प्रदर्शनकारियों का एक ग्रुप सड़क पर बैठकर नारे लगा रहा था: "मोदी शाही नहीं चलेगी, मोदी तेरी तानाशाही नहीं चलेगी।"

हरियाणा के भिवानी से आए एक नौजवान ने चिल्लाकर कहा: "जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है।"

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कई प्रदर्शनकारियों ने असहमति से निपटने के सरकार के तरीके और तानाशाही सरकारों के बीच समानताएं बताईं। एक प्रतिभागी ने इस समय को "भारत का तियानमेन स्क्वायर पल" बताया, और 1989 में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों पर चीनी सरकार की कार्रवाई की याद दिलाई।

ज़्यादातर लोग बीस-तीस साल की उम्र के लग रहे थे। उनमें से कई का संगठित राजनीति से कोई खास लेना-देना नहीं था। फिर भी, वे अधिकारों, जवाबदेही और लोकतांत्रिक भागीदारी की भाषा में बात कर रहे थे।

दक्षिण दिल्ली के आईआईटी ग्रेजुएट के एक ग्रुप ने कहा कि वे विरोध प्रदर्शन में इसलिए शामिल हुए क्योंकि उनका मानना ​​था कि वांगचुक को गलत तरीके से निशाना बनाया गया है। उनमें से एक ने कहा, "उन्होंने समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम किया है। फिर भी उन्हें देशद्रोही और पाकिस्तानी एजेंट करार दिया गया है। जो कोई भी सरकार की आलोचना करता है, उसे देश-विरोधी का ठप्पा लगा दिया जाता है। अब बहुत हो चुका है।"

इस लामबंदी के केंद्र में खुद वांगचुक ही थे।

दिल्ली पुलिस ने शनिवार सुबह वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया था। उन्होंने अपना अनशन तभी खत्म करने का फ़ैसला किया जब उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि सांसद संसद के मॉनसून सत्र में यह मुद्दा उठाएंगे और केंद्र सरकार इस विवाद पर ध्यान देगी।

इस बीच, विपक्षी विधायकों, सिविल सोसाइटी के सदस्यों और जानी-मानी हस्तियों के एक प्रतिनिधिमंडल की अपील के बाद, 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (आइसा) के तीन कार्यकर्ताओं ने भी अपनी 23 दिन लंबी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल खत्म कर दी।

इन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने छात्रों को भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों को संसद के मॉनसून सत्र के दौरान उठाया जाएगा और राजनीतिक और सार्वजनिक अभियानों के जरिए आगे बढ़ाया जाएगा।

वैसे प्रदर्शनकारियों के बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा था: वांगचुक के अनशन खत्म करने के बाद क्या होगा? दलित परिवार से आने वाले एक स्टूडेंट ने कहा, "अनशन खत्म हो सकता है। प्रोटेस्ट खत्म नहीं होगा।"

लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की मेडिकल स्टूडेंट आर्या ने इस लामबंदी को एक अहम मोड़ बताया। उन्होंने कहा, "काफ़ी समय से लोगों के मन में गुस्सा दबा हुआ था। इस विरोध-प्रदर्शन ने उसे सबके सामने ला दिया है।" जब उनसे पूछा गया कि अब आगे क्या होगा, तो उन्होंने विपक्ष की ओर इशारा किया। "गुस्सा असली है। अब यह विपक्ष पर निर्भर करता है कि वे इसे एक राजनीतिक आंदोलन में बदल पाते हैं या नहीं।"

यह आंदोलन दिल्ली से बाहर भी फैल चुका है। मुंबई और हैदराबाद समेत देश के कम से कम नौ शहरों में वांगचुक और सीजेपी के समर्थन में प्रदर्शन की खबरें आई हैं।

ली मेरेडियन होटल के पास प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि ”हम एक ऐतिहासिक पल के गवाह बन रहे हैं। आज युवाओं ने संसद तक जाने वाली हर सड़क पर कब्ज़ा कर लिया है। लगभग पांच दशकों के बाद, उन्होंने देश को लोकतंत्र की एक बुनियादी सच्चाई याद दिलाई है — संसद का रास्ता सड़कों से होकर गुज़रता है।"

इसी बीच पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया, लेकिन प्रदर्शनकारी अपनी जगह डटे रहे और संसद की ओर अपना मार्च जारी रखा, और आखिरकार वे इसके गेट तक पहुँच गए।

रविवार के विरोध प्रदर्शन में एक खास बात यह रही कि इसमें संगठित राजनीतिक कार्यकर्ता लगभग नदारद थे। हालांकि कई विपक्षी दलों ने सार्वजनिक रूप से इस आंदोलन का समर्थन किया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनके कार्यकर्ता ज़्यादातर गायब ही दिखे।

जिस सरकार ने अक्सर विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक मकसद से प्रेरित या बाहरी ताकतों द्वारा संचालित बताकर खारिज किया है, उसके लिए लोगों की इस स्वतःस्फूर्त भागीदारी का सामना करना ज़्यादा मुश्किल हो सकता है। यहां तक ​​कि सत्ताधारी खेमे से जुड़े कुछ लोगों ने भी निजी तौर पर माना कि वे लोगों की इतनी बड़ी भागीदारी देखकर हैरान थे।

सत्ताधारी खेमे की चर्चाओं से वाकिफ़ एक आरएसएस कार्यकर्ता का कहना था, "हमें इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की उम्मीद नहीं थी, खासकर शहरी युवाओं की।" कुछ लोगों का कहना था कि यह बेचैनी विरोध-प्रदर्शन वाली जगह से बाहर भी साफ़ दिख रही थी। उधर संसद सत्र की कवरेज कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार ने टिप्पणी की, "सड़कों पर भीड़ है, लेकिन इसकी तपिश संसद के भीतर भी महसूस की जा रही है।"

यह कहना मुश्किल है कि क्या यह आंदोलन मौजूदा विवाद के बाद भी जारी रहेगा। अक्सर जब कोई मुख्य चेहरा पीछे हट जाता है या लोगों का ध्यान कहीं और चला जाता है, तो विरोध-प्रदर्शनों की रफ़्तार धीमी पड़ जाती है।

फिर भी, रविवार के 'संसद चलो मार्च' ने एक ऐसा संदेश दिया जिसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था: बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहमति के लिए सिकुड़ती जगह के बावजूद, जनता का गुस्सा अब भी सामूहिक रूप से सामने आ सकता है। और अगर मोदी सरकार छात्रों की चिंताओं को नज़रअंदाज़ करती रही—जो भारत की आबादी का लगभग 23 प्रतिशत हैं—तो आखिरकार उसे इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।