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एक व्यापार समझौता और 500 अरब डाॅलर का सवाल

भारत और अमेरिका एक ऐसे व्यापार समझौते के लिए 'सहमत' हुए जो वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव में हुआ था।

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Getty Images Andrew Harnik

एक महीने पहले भारत और अमेरिका एक ऐसे व्यापार समझौते के लिए 'सहमत' हुए जो वास्तव में अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव में हुआ था। तीन हफ्ते पहले जब इसके मुख्य बिंदुओं का एकतरफा खुलासा हुआ तो इसे 'साझा बयान' कहा गया। फिर एक हफ्ते पहले अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के 'आपातकालीन' टैरिफ को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इस सबके बावजूद बहुचर्चित व्यापार समझौता अभी भी उतना ही धुंधला है जितना कि मटियाला पानी।

बात चाहे व्यापार की हो या युद्ध की, हम हर बात सबसे पहले ट्रंप से ही सुनने के आदी हो चुके हैं। इसलिए यह मान लिया गया था कि उनके सालाना स्टेट ऑफ यूनियन संबोधन में स्थिति कुछ साफ होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पूरे भाषण में वह टैरिफ नीतियों की शानदार कामयाबी का गुण ही गाते रहे। इसे आगे बढ़ाने के लिए दूसरे कानूनों के इस्तेमाल की धमकी भी दी। हालांकि जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके टैरिफ कदमों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया था, ट्रंप ने जोर देकर कहा था कि 'इंडिया डील' अब भी जारी है, और 'एक समझदार व्यक्ति और महान मित्र' मोदी इसे पूरा करेंगे। लगभग 48 घंटे बाद उन्होंने देशों को, बिना नाम लिए, चेतावनी दी कि वह कोर्ट के फैसले के नाम पर उनके साथ खेल न खेलें।

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उनका नया 15 प्रतिशत टैरिफ 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम (यूएस ट्रेड एक्ट ऑफ 1974) की धारा 122 के नाम पर लगाया गया है। यह कम इस्तेमाल होने वाला ऐसा विरला कानून है जो कार्यपालिका को 150 दिनों के लिए अधिकतम 15 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जिसके बाद अमेरिकी कांग्रेस को इसे अनुमोदित करना होता है। लेकिन ट्रंप के अनुसार 'कांग्रेस का अनुमोदन' जरूरी नहीं होगा।

भारत का नाम लिए बिना, ट्रंप ने विभिन्न देशों के साथ टैरिफ और व्यापार समझौतों को 'ऐतिहासिक' और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद बताया। उन्होंने कहा कि ये समझौते विदेशी बाजारों को अमेरिकी सामान के लिए खोल रहे हैं और देश में कमाई ला रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक अस्थायी बाधा है, अंततः उनकी सरकार ही जीतेगी।

भले ही भारत ने 'अंतरिम समझौते' पर आगे की चर्चा के लिए अपने व्यापार प्रतिनिधिमंडल की यात्रा टाल दी, देर से ही सही मोदी सरकार ने इस पर विचार बदला हो, लेकिन इसकी शर्तों पर दुबारा बातचीत करना आसान नहीं होगा। खासतौर से रूस से तेल खरीदने पर लगाई जाने वाली दंडात्मक शर्त जिसे मानने में भारत ने अपने संप्रभु अधिकार को छोड़ दियाा।

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भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी आयात का वादा भी किया है, और वह एकमात्र व्यापारिक साझेदार है जिसने अधिकांश अमेरिकी वस्तुओं पर शून्य टैरिफ लगाने पर सहमति जताई है, जबकि अमेरिकी भारतीय सामान पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। भारत ने अपने संवेदनशील बाजारों को अमेरिकी आयात के लिए खोल दिया और तब भी कोई विरोध नहीं किया जब बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धियों से समझौते ने भारतीय कपास और वस्त्रों के बाजार के लिए मुसीबत खड़ी कर दी।

अमेरिकी अधिकारियों के संकेत बताते हैं कि वे भारत से इन शर्तों को बाध्यकारी मानने की अपेक्षा करते हैं, भले ही समझौते पर अभी हस्ताक्षर नहीं हुए हैं और न ही इसका पूरा ब्योरा तैयार हुआ है। 6 फरवरी को जारी 'अंतरिम समझौते के ढांचे' या साझा बयान, जो भी उसका अर्थ हो, उस पर भी हस्ताक्षर नहीं थे। जब ट्रंप के टैरिफ की संवैधानिकता अनिश्चित हैं, जब दुनिया के बाकी देश अपने विकल्पों पर फिर विचार कर रहे हैं, तो क्या भारत के पास पुनः वार्ता पर जोर देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है? जबकि वह इतना धैर्य भी नहीं दिखा सका कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किए गए टैरिफ को पुनः वैध ठहराने तक प्रतीक्षा कर लेता।

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प्रधानमंत्री मोदी अचानक इतने एकतरफा समझौते पर सहमत होने के लिए क्यों राजी हो गए? पूरे 2025 में भारत इंतजार करता दिखा, जबकि ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, मलेशिया, जापान और वियतनाम ने हथियार डाल दिए। नवंबर 2025 में अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक भारत के साथ व्यापार समझौते में देरी पर अपनी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि समझैता केवल इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को फोन नहीं किया।

बजट सत्र के दौरान 2 फरवरी को फोन करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को किसने प्रेरित किया? अगर उनका विपक्ष को विश्वास में लेने का इरादा नहीं था, तो भी वह समय ले सकते थे। बजट सत्र का बहाना तो उनके पास था ही। संभव है कि सरकार के पास यह खुफिया जानकारी भी रही हो कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के 'आपातकालीन' टैरिफ पर कैसा फैसला दे सकता है। बताया जाता है कि अधिकारियों ने मोदी को अदालत के फैसले तक इंतजार की सलाह दी थी, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया। समझौते को मंजूरी देने के लिए कोई कैबिनेट की बैठक भी नहीं हुई। क्या यह मात्र अहंकार था कि फोन कॉल कर दी गई? या 'प्रिय मित्र डॉनल्ड' का दबाव?

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दो फरवरी को, जब बजट सत्र चल रहा था, ट्रंप ने ट्वीट किया कि उनके 'महान मित्र' नरेन्द्र मोदी ने फोन कर यह कहा है कि भारत व्यापार समझौते पर दस्तखत करने के लिए तैयार है। उन्होंने दावा किया कि मोदी ने रूसी तेल आयात घटाने और अमेरिका से खरीद बढ़ाने पर सहमति दी है, वह भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेंगे और 25 प्रतिशत के दंड को (भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने पर) हटाया जाएगा, और भारत अमेरिकी आयात पर 'शून्य' शुल्क लगाएगा।

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के अनुसार, व्यापार समझौता आदर्श रूप से दोनों देशों के लिए फायदेमंद होना चाहिए। जबकि इस समझौते की शर्तें बताती हैं कि यह मुख्य रूप से अमेरिका के पक्ष में है। अमेरिका का मौजूदा जीडीपी भारत से सात गुना है, और प्रति व्यक्ति आय 30 गुना से ज्यादा है। अर्थशास्त्री प्रसन्नजीत बोस पूछते हैं कि भारत सरकार ने कहीं अधिक बड़े और धनी देश के साथ 'पारस्परिक और संतुलित व्यापार' का वचन क्यों दिया?

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अमेरिका लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है। 2024-25 में अमेरिका को भारतीय निर्यात 86 अरब डॉलर से अधिक रहा, जो कुल 437 अरब डॉलर के निर्यात का 19 प्रतिशत से अधिक है। उसी वर्ष भारत का कुल व्यापार घाटा 283 अरब डॉलर तक बढ़ गया, लेकिन अमेरिका के साथ उसका 40 अरब डॉलर का सरप्लस रहा। अप्रैल-दिसंबर 2025-26 में अमेरिका के साथ व्यापार में सरप्लस 26 अरब डॉलर था। इसलिए, जबकि भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है, अमेरिका के साथ समझौते से हटना वास्तव में विकल्प नहीं है। लेकिन घरेलू हितों की रक्षा के लिए कठोर वार्ता से परहेज नहीं होना चाहिए।

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (13-15 फरवरी) में जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर से पूछा गया कि क्या भारत ने रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध मान लिया है, तो उन्होंने कहा कि भारत के ऊर्जा विकल्प राष्ट्रीय हित और 'रणनीतिक स्वायत्तता' से निर्देशित होते हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने यह कहकर सवाल टाल दिया कि तेल कंपनियां यह फैसला खुद करती हैं। क्या 2019 में अमेरिका के दबाव में भारत ने ईरान से सस्ता तेल खरीदने का अपना अधिकार नहीं छोड़ा था? और क्या 2026 में वह फिर उसी दबाव में नहीं झुका?

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यदि 'रणनीतिक स्वायत्तता' वास्तव में भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शन करती है, तो भारत को वेनेजुएला (व्यावहारिक रूप से अमेरिका) से तेल खरीदने के लिए क्यों मजबूर हुआ? 'बाय अमेरिकन' की प्रतिबद्धता का क्या अर्थ है? भारत को अमेरिका से कोयला क्यों आयात करना चाहिए? और संप्रभु भारत के लिए इसका क्या मतलब है कि ट्रंप प्रशासन भारत के कच्चे तेल आयात पर नजर रखे?

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि रूस से भारत का कच्चा तेल आयात 2022-23 में 50.85 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 83.02 एमएमटी और 2024-25 में 87.54 एमएमटी हो गया, जबकि अप्रैल 2022 से मार्च 2025 के बीच प्रति बैरल कीमत 79.41 डॉलर से घटकर 66.49 डॉलर हो गई। भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी यूराल्स तेल की हिस्सेदारी जो 2020-21 में दो प्रतिशत से कम थी, 2024-25 में 35 प्रतिशत से अधिक हो गई। 2025-26 में वित्तीय वर्ष के अंत तक यह 20 प्रतिशत से नीचे आने की उम्मीद है।

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इन वार्ताओं में भारत को क्या मिला? अंतरिम समझौते में पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की भारत की 'मंशा' या 'आकांक्षा' का उल्लेख है, जैसा कि पीयूष गोयल ने कहा, लेकिन अमेरिका की ओर से भारत से आयात बढ़ाने की कोई पारस्परिक प्रतिबद्धता नहीं है।

गर्ग का तर्क है कि भारत को अपने श्रम-प्रधान निर्यात जैसे वस्त्र, चमड़ा, फुटवियर, प्लास्टिक, रबर और हस्तशिल्प उत्पादोंकृ पर शून्य टैरिफ के लिए अधिक कठोर मोलभाव करना चाहिए था, जो पहले 0-3 प्रतिशत कर के दायरे में थे और अब 10-18 प्रतिशत टैरिफ का सामना कर रहे हैं। 

क्या भारत इस समझौते पर फिर वार्ता कर सकता है? यही 500 अरब डॉलर का प्रश्न है।

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