
अब यह नई बात नहीं रह गई है। नई जगहों पर भी ऐसा हो रहा है। हमने अपनी पिछली रिपोर्ट 'संडे नवजीवन' के गत (27 सितंबर के) अंक में मिनी बंदोपाध्याय ने 'बुलडोजर की उलटी पड़ती चाल और हताशा' शीर्षक से प्रकाशित अपनी टिप्पणी में विस्तार से बताया है कि कैसे यह उल्टी चाल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन नबीन के 21-22 सितंबर के मेरठ और सहारनपुर दौरे पर भारी पड़ी और किस तरह उसके कारण उनको अपने काफिले के साथ 'जेसीबी के (तथाकथित) गार्ड आफ आनर' से नजरें बचाकर निकल जाना पड़ा।
संयोग देखिए कि लगभग उसी समय अयोध्या में चौदहकोसी परिक्रमा मार्ग को चौड़ा करने के सिलसिले में 20-21 सितंबर की रात पहले फैजाबाद कहलाने वाले क्षेत्र के जनौरा नाके पर की गई ग्यारह घरों और दुकानों वगैरह को बुलडोज करने की कार्रवाई के सिलसिले में भी बीजेपी नेताओं को पहले मुंह छिपाना, फिर डैमेज कंट्रोल की कवायदों पर उतरना पड़ा। कार्रवाई से प्रभावित लोगों की लप्पो-चप्पो पर भी।
ऐसा करना उनकी मजबूरी थी, क्योंकि इस मामले में बुलडोजर किसी ऐसी जमात पर नहीं गरजे थे कि वे ढीठ होकर उनके गरजने का जश्न मनाते और उसके प्रभावितों के जले पर नमक छिड़कते। वे उनके 'अपनों' पर गरजे थे-उन्हें दिए गए इस आश्वासन के बावजूद कि 'आश्वस्त रहें, पूरा न्याय होगा'- और प्रभावितों में अयोध्या के तीन बार के बीजेपी पार्षद मुरारी यादव भी थे, जो भले ही दूसरी जमातों के घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलते देखकर अपनी पार्टी के साथ खुश हुआ करते थे, बात अपने पर आई तो बहुत कातर होकर रोने और बिफरने लगे थे।
इस मामले में बीजेपी नेताओं को इसलिए भी मुंह छिपाना पड़ रहा था कि मुरारी यादव समेत ज्यादातर प्रभावितों के बीजेपी से पुराने जुड़ाव के बावजूद विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) उनके पक्ष में आगे आ गई थी। उसके नेता और प्रदेश के भूतपूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय ने उनमें से कई को लखनऊ ले जाकर सपा के मुखिया अखिलेश यादव से बात कराई और एक-एक लाख रुपये की राहत राशि भी दिलवाई थी।
उनके इस मूव से बीजेपी नेता डर गए थे कि इस तरह उनके अपनों के नाराज होकर पार्टी से दूर जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो कौन जाने कि विधानसभा चुनाव में क्या हो? कहीं उनकी नाराजगी से पार्टी की लोकसभा चुनाव की शिकस्त की विधानसभा चुनाव में पुनरावृत्ति हो गई तो?
इस डर से वे डैमेज कंट्रोल पर उतरे तो गोदी मीडिया की मार्फत प्रभावितों के लिए समुचित मुआवजा, काम-धंधे के लिए दुकानें और बरसात काटने के लिए टिन शेड वगैरह की सुविधा देने का प्रचार शुरू करा दिया। लेकिन बात नहीं बनी क्योंकि प्रभावित 'पूरे न्याय' की मांग करने और आरोप लगाने लगे कि आधे घंटे की सूचना पर तोड़ दिए गए उनके घरों से आलमारियां, बक्से और उनमें रखे जेवर एवं अन्य कीमती सामान भी उठा ले जाते गए हैं, जबकि उनके लिए दुकानों, टिनशेडों और मुआवजे की घोषणा पूरी तरह हवा हवाई ही है।
गौरतलब है कि इससे पहले बीजेपी नेताओं द्वारा इन प्रभावितों से कहा गया था कि चूंकि वे उनके 'अपने' हैं, इसलिए जिस परिक्रमा मार्ग को चौड़ा किया जाना है, उसके बीच से दोनों ओर समान चौड़ाई में तोड़फोड़ होगी, जिससे उनका कम से कम नुकसान होगा। लेकिन रात में अचानक ऐसे सारे आश्वासन भुलाकर भारी पुलिस बल की उपस्थिति में मार्ग के एक ओर स्थित उनके मकानों को एकदम से बुलडोज कर दिया गया।
इससे ये प्रभावित तो हलकान और परेशान हुए ही, अनेक अन्य नागरिक भी इस अंदेशे से त्रस्त होने लगे कि अब उनके घरों का जानें क्या हो। इस चक्कर में उनका अपने घरों में इत्मीनान, अधिकार एवं आत्मविश्वास के साथ रहना दूभर हो गया, जो अभी भी दूभर ही है ।
समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता सूर्यकांत बताते हैं कि समस्या इसलिए और बड़ी हो गई है कि 'न अपील, न दलील, न वकील' की तर्ज पर घर, मकान और दुकान वगैरह बुलडोज करने की अंधाधुंध कार्रवाइयों ने लोगों को इतना त्रस्त कर दिया है कि उनका मनोविज्ञान तक बिगड़ गया है।
कोई दो साल पहले कुकरैल नदी पुनर्जीवन परियोजना के तहत लखनऊ के पंतनगर, रहीमनगर,अबरार नगर और इंद्रप्रस्थ आदि में ध्वस्तीकरण के लिए चिह्नित घरों पर बुलडोजर की कार्रवाई रोक दिए जाने के बाद भी समाचार माध्यमों ने इस सरकार की तथाकथित दयालुता का ऐसा ही प्रचार कर दावा किया था कि उससे उन घरों में रह रहे लोग आह्लादित हो उठे हैं।
सच्चाई यह है कि पिछले नौ सालों से बुलडोजरों से पीड़ित प्रदेशवासी, वे गांवों के निवासी हों या शहरों के, बेघर हों तब तो मुसीबत में रहते ही हैं, घर बनवा रखे हों तो भी उनको सुकून मयस्सर नहीं होता। कारण यह कि उनमें से अनेक अपने घरों को कभी भी अवैध बताकर ढहा दिए जाने के अंदेशों के बीच रहने को अभिशप्त हैं।
प्रदेश में बुलडोजर राज से पहले तक दो व्यक्ति झगड़ रहे होते और उनमें कोई शातिराना दिखाते हुए दूसरे को धूल चटा या मिट्टी में मिला देने की धमकियों तक जा पहुंचता और दूसरे के लिए उसकी यह अति नाकाबिल-ए -बर्दाश्त हो जाती तो वह भी तमककर कह देता था कि ‘चलो-चलो, बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे। तुम मेरा घर गिरा दोगे क्या?’ तब शातिराना दिखाने वाला झेंपकर मुंह छिपाने लग जाता था। उसकी यह कहने की हिम्मत नहीं होती थी कि हां, वह उसका घर गिरा देगा। क्योंकि यह बात उसके बूते की नहीं होती थी। कारण कि तब तक किसी के द्वारा भी किसी का घर गिराना इतना आसान या सामान्य नहीं हुआ था।
लेकिन अब बुलडोजर राज में घर गिराना इतना सामान्य और आसान हो गया है और उसके चलते इतने समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव उत्पन्न हो गए हैं कि नागरिकों का ‘तुम मेरा घर गिरा दोगे क्या?’ पूछने का आत्मविश्वास ही जाता रहा है।
कहते हैं कि पहले अब्दुल ने यह आत्मविश्वास गंवाया और अब अजीत भी गंवा बैठा है। तिस पर अब यह इक्का- दुक्का घरों का मामला भी नहीं रह गया है। बस्तियों तक का कुछ ठिकाना नहीं कि कब उन्हें अवैध करार देकर ढहा दिया जाए और उनके निवासी सड़क पर आ जाएं।
कई मामलों में तो नागरिक अपने अवैध करार दिए गये घरों की भूमि की रजिस्ट्री, भवन का मानचित्र, गृह कर, बिजली बिल और जल मूल्य की अदायगी की रसीदें और अदालतों के स्थगनादेश वगैरह दिखाते रह जाते हैं और देखने वालों को उनका यह मानवीय पहलू भी नहीं दिखाई देता कि उनके घर गिरा दिए जाएंगे तो वे जाएंगे कहां? यह भी नहीं कि कई लोग एक घर बनाने में ही टूट गए होते हैं, वे समुचित मुआवजा पा भी जाएं तो दूसरा घर कैसे बनाएंगे?
काश, योगी सरकार समझ पाती कि रोटी और कपडे़ के साथ घर मनुष्य की तीन प्राथमिक जरूरतों में शामिल है और वह सिर्फ ‘मकान’ नहीं है। ‘अपने घर’ की बात करें तो उसका अरमान महज चार दीवारों और एक छत से पूरा नहीं होता। अन्यथा एक शायर को उसे पूरा करने के लिए यह प्रार्थना नहीं करनी पड़ती : ‘मेरे खुदा मुझे इतना तो मो’तबर कर दे/मैं जिस मकान में रहता हूं उसको घर कर दे।’
शहरयार ने अकारण नहीं कहा है कि ‘घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है’ और यह तसव्वुर बुलडोजर राज में दुर्लभ होता जा रहा है। हां, इस राज में ‘दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं/साया-ए-दर भी नजर आए तो घर लगता है।’ लेकिन क्या करें, बंद कमरा हो अगर सांस घुटी जाती है, खिड़कियां खोलें तो जहरीली हवा आती है।
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए