हालात

...और अब 'जेन अल्फा' अपनी स्क्रीन से निकलकर आई सड़कों पर

क्या 'स्कूल ठीक करो' मुहिम का मकसद सिर्फ टूटे पंखे और गंदे टॉयलट ठीक करना ही है या उससे कुछ आगे भी?

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूली बच्चों ने अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूली बच्चों ने अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया 

बच्चे कक्षाओं से निकल पड़े हैं, सरकारी दफ्तरों पर दस्तक दे रहे हैं, स्कूलों के गेट पर ताले जड़े हैं, सड़कों पर धरने जारी हैं, वे जवाब मांग रहे हैं। वे कक्षाओं में पंखे, पीने का साफ पानी, साफ शौचालय, अधिक शिक्षक, बेहतर भोजन, डेस्क, बेंच, पुस्तकालय और एक मामले में स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क चाहते हैं। पिछले तीन हफ्तों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र वगैरह से लगातार ऐसे विरोध-प्रदर्शनों की खबरें आई हैं।

शुरुआत में ये घटनाएं अलग-अलग स्थानीय उबाल जैसी लग रही थीं, जिन पर हालिया जेन ज़ी प्रदर्शनों का असर दिखाई दे रहा था। लेकिन अब ये एक और बड़े जन-आंदोलन की शुरुआत जैसी दिखने लगी हैं। इस बार अगुआई जेन अल्फा के हाथों में है।

उत्तर प्रदेश के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज के छात्र सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए। कक्षा 12 के चार छात्रों ने जून-जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन में हिस्सा लिया था। घर लौटने के बाद उन्होंने अपने स्कूल में विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया। इनमें से एक अंकुर सोनकर ने कहा कि दिल्ली के आंदोलन से वह सीख लेकर लौटा था कि अपने अधिकारों के लिए लड़ो।

11 अगस्त को हमीरपुर के चंदूपुर गांव के करीब 200 बच्चे और उनके माता-पिता पांच किलोमीटर दूर जिला कलेक्ट्रेट तक तिरंगा यात्रा लेकर पहुंचे। उनकी शिकायत- उनके स्कूल तक पक्की सड़क नहीं थी। हर बारिश में उन्हें कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता था।

गया में सिमुआरा मिडिल स्कूल के 40-50 छात्र करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर एसडीएम कार्यालय पहुंचे। उनकी मांग थी- खाने लायक मिड-डे मील, चलने वाले पंखे और ऐसी बेंच जिन पर बैठा जा सके...। राजस्थान के बाड़मेर में छात्रों ने स्कूल के गेट पर तब तक ताला लगाए रखा, जब तक अधिकारियों ने रिक्त पदों पर तीन शिक्षकों की नियुक्ति का भरोसा नहीं दिया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में छात्रों ने हॉस्टल के खराब खाने के खिलाफ प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र में छात्रों ने शौचालय, पानी और शिक्षकों की गैरहाजिरी का मुद्दा उठाया। अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग स्कूल, लेकिन शिकायतें हैरतअंगेज ढंग से एक जैसी।

लखनऊ में जय प्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय की छात्राएं मूसलाधार बारिश के बीच ढाई किलोमीटर पैदल चलीं, सड़क पर बैठीं और ट्रैफिक रोक दिया। शिकायत थी कि स्कूल में फिजिक्स और बायोलॉजी के शिक्षक नहीं हैं। पढ़ाने वाला ही कोई नहीं होगा तो वे बोर्ड की परीक्षा कैसे पास करेंगी?

आजमगढ़ के स्मिथ इंटर कॉलेज में छात्रों का विरोध-प्रदर्शन का नारा वायरल हो गया- “केमिस्ट्री शिक्षक न होने से तेजाब सा झुलस रहा है हमारा भविष्य।” स्कूल में करीब 26 साल से केमिस्ट्री और फिजिक्स के शिक्षक नहीं थे!

मध्य प्रदेश के उज्जैन में सैकड़ों स्कूली छात्राओं ने सरकारी स्कूलों को मिलाने या 6 से 10 किलोमीटर दूर दूसरी जगह स्थानांतरित करने की योजना के खिलाफ प्रदर्शन किया। यहां मामला महज बुनियादी ढांचे का नहीं था। खासकर लड़कियों के लिए स्कूल की दूरी यह तय कर सकती है कि वे स्कूल जाएंगी भी या नहीं। 

बेशक, आंदोलन को गति मिलना एक वजह है, लेकिन ये प्रदर्शन इस धारणा की भी पुष्टि करते हैं कि शिकायत दूर करने और उसे ऊपर तक पहुंचाने के पारंपरिक रास्ते- शिक्षक, स्कूल प्रबंधन समितियां, स्थानीय जनप्रतिनिधि आदि काम नहीं कर पाए हैं। जेन अल्फा के प्रदर्शनों ने यह भी दिखाया है कि ऑनलाइन दृश्यता वास्तविक दुनिया में एक तरह की ताकत बन सकती है।

डिजिटल दुनिया में पली-बढ़ी इस पीढ़ी ने अपने रोजमर्रा की जीवनशैली को ही हथियार बना लिया है और अब सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ लड़ाई लड़ने का एक खाका भी सामने है। इंस्टाग्राम रील्स अब लामबंदी का औजार हैं। एआई से बने पोस्टर वायरल हो रहे हैं। छोटे वीडियो स्थानीय शिकायतों को सार्वजनिक मुद्दों में बदल रहे हैं। जैसा कि एक टिप्पणीकार ने कहा, “अब जेन अल्फा स्क्रीन से निकलकर सड़कों पर आ रही है।”

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने अपना ध्यान सरकारी स्कूलों की ओर मोड़ दिया है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने स्वतंत्रता दिवस पर महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में अपने गांव से ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान की शुरुआत की।

पार्टी की राजस्थान के सरकारी स्कूलों का ऑडिट कराने की योजना की घोषणा उसके सह-संयोजक आशुतोष रांका ने की। उन्होंने कहा कि जयपुर, कोटा, जोधपुर, अजमेर, उदयपुर, भरतपुर, धौलपुर, बाड़मेर और हनुमानगढ़ के सरकारी स्कूलों से ऑडिट कराने के अनुरोध पहले ही आ चुके हैं। राजस्थान सरकार इससे घबराई हुई नजर आई। 16 अगस्त को उसने राज्य संचालित स्कूलों में बाहरी लोगों के अनधिकृत प्रवेश पर रोक लगा दी। राजस्थान इस बात का बेहद स्पष्ट उदाहरण है कि स्कूलों का बुनियादी ढांचा राजनीतिक मुद्दा क्यों बन गया है।

25 जुलाई 2025 की सुबह झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में एक सरकारी उच्च प्राथमिक स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत हो गई थी। अगले ही दिन नागौर जिले के खरियावास गांव में एक और स्कूल की छत गिर गई। हादसा स्कूल की छुट्टी के बाद हुआ, इसलिए एक और त्रासदी टल गई।

मामला अदालत पहुंचा तो राजस्थान हाईकोर्ट ने 86,934 जर्जर कक्षाओं को बंद करने का आदेश दिया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इनकी मरम्मत या दोबारा निर्माण पर करीब 20,000 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। खबरों के मुताबिक राज्य के पास हर साल मरम्मत के लिए सिर्फ करीब 375 करोड़ रुपये का बजट है।

आखिर बच्चों को उन चीजों की मांग क्यों करनी पड़ रही है, जिन्हें उन्हें कभी नकारा ही नहीं जाना चाहिए था? क्या ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान अपने मूल सवालों तक लौट सकता है?

भारत दशकों से सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा, शिक्षा का अधिकार और हर बच्चे के लिए समान अवसर की बात करता रहा है। लेकिन वंचित बच्चों का अनुभव गहरे तौर पर असमान है। किसी बच्चे को कलेक्ट्रेट तक पांच किलोमीटर पैदल चलकर उस अधिकार की मांग क्यों करनी पड़े, जो उसे स्वाभाविक रूप से मिलना चाहिए? उसे सिर्फ इसलिए स्कूल क्यों छोड़ना पड़े कि स्कूल बहुत दूर है?

यह समस्या बुनियादी सुविधाओं से भी ज्यादा बुनियादी है। यह ‘शिक्षा तक पहुंच’ का सवाल है, गरीबी से बाहर निकलने के रास्ते और सामाजिक गतिशीलता के अवसर का भी। उम्मीद करनी चाहिए कि जेन अल्फा के ये विरोध-प्रदर्शन सरकारी स्कूलों की भूमिका पर भी नए सिरे से गंभीर विचार करने को मजबूर करेंगे। आखिर उन बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को जमीनी हकीकत बनाना इन्हीं स्कूलों की जिम्मेदारी है, जिनके परिवारों के पास उन्हें निजी स्कूलों में भेजने के साधन नहीं हैं।

पिछले एक दशक में 90,000 से ज्यादा सरकारी स्कूल ‘युक्तिकरण’ के नाम पर बंद या दूसरे स्कूलों में मिला दिए गए हैं। ‘युक्तिकरण’ कम नामांकन वाले स्कूलों को बंद करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नौकरशाही का जुमला है। जमीन पर इसका मतलब है कि किसी आदिवासी बस्ती या ओबीसी गांव के बच्चे को अब हर तरफ चार-पांच किलोमीटर अतिरिक्त चलना होगा। मान लीजिए गांव की कोई लड़की भाग्यशाली है और उसके माता-पिता उसे पढ़ाने के लिए तैयार भी हैं, तो कितनी संभावना है कि वे उसे रोज एक तरफ पांच किलोमीटर पैदल स्कूल जाने देंगे?

हैरत नहीं कि बुनियादी स्तर पर नामांकन घटा है और वर्षों में पहली बार सकल नामांकन अनुपात नीचे आया है? सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार कानून ने जितना करना चाहिए था, उतना नहीं किया, लेकिन हर बच्चे के पैदल पहुंचने की दूरी के भीतर स्कूल का संवैधानिक अधिकार एक अच्छी शुरुआत थी। इस नुकसान की भरपाई के लिए स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाले किसी एक विरोध-प्रदर्शन से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी। जब शिक्षा तक पहुंच गारंटी के बजाय विशेषाधिकार बन जाए, तो समझ लीजिए कि असली तस्वीर क्या है।

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