
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में जनता के भारी आक्रोश के आगे झुकते हुए बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी। यह निर्णय अंकिता के माता-पिता से मुलाक़ात के दो दिन बाद और उत्तराखंड बंद से ठीक एक दिन पहले लिया गया है। अंकिता के माता-पिता ने साफ शब्दों में सीएम धामी से सीबीआई जांच की मांग की थी। अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या सीबीआई जांच में उस वीआईपी का नाम सामने आएगा, जिसे हत्याकांड के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है?
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मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने अंकिता हत्याकांड की सीबीआई जांच की घोषणा करते हुए कहा कि दिवंगत अंकिता भंडारी के माता–पिता के अनुरोध और उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए राज्य सरकार ने इस प्रकरण की सीबीआई से जांच कराये जाने की संस्तुति की है।
अंकिता भंडारी केस में सीबीआई जांच की सिफारिश का स्वागत करते हुए राज्य के पूर्व सीएम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने कहा, “लोग पिछले तीन साल से इसकी मांग कर रहे हैं। आज, उन्हें लगा कि सीबीआई जांच की सिफारिश की जानी चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड के सभी लोग इसकी मांग कर रहे हैं। हालांकि, न्याय अभी भी अधूरा है। उन वीआईपी को तभी गिरफ्तार किया जाएगा जब यह जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होगी।”
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अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने के लिए पिछले कई दिनों से पूरे राज्य में आंदोलन कर रहे उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश गोदियाल में फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने बेटी अंकिता भंडारी मामले की सीबीआई जांच की मांग मानकर अतीत में हुई अपनी गलतियों को माना है। यह तमाम सामाजिक संगठनों और प्रदेश की जनता की जीत है। हम उम्मीद करते हैं कि यह सीबीआई जांच माननीय न्यायाधीश की निगरानी में होगी जिसकी मांग लगातार पूरे प्रदेश की जनता और स्वंय बेटी अंकिता के माता-पिता ने भी उठाई है।
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वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अंततः सीबीआई जांच का फ़ैसला! धामी सरकार ने अंकिता भंडारी मर्डर केस की जांच सीबीआई को सौंप दी। यह निर्णय अंकिता के माता-पिता से मुलाक़ात के दो दिन बाद और उत्तराखंड बंद से ठीक एक दिन पहले लिया गया। यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक फ़ैसला नहीं, बल्कि जनता के दबाव और न्याय की मांग की जीत है। अब सवाल साफ़ है- क्या सीबीआई जांच में वीआईपी का नाम सामने आएगा? क्या सच को अंततः सामने आने दिया जाएगा?
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वहीं सीपीआई-एमएल के राज्य सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच का फैसला, उत्तराखंड में चले जन आंदोलन से पैदा हुए दबाव का नतीजा है। पुनः यह दोहराना है कि यह जांच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में होनी चाहिए। बीजेपी की पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने यह निर्णय लेने में तीन साल लगाए और यह फैसला तब लिया, जब जन दबाव और आंदोलन चरम पर पहुंच गया। अगर यह निर्णय समय से ले लिया गया होता तो मुमकिन था कि वीआईपी अब तक जेल की सलाखों के पीछे होता। अभी भी यदि वीआईपी कानून के शिकंजे में नहीं फंसता तो इसके लिए धामी सरकार द्वारा सीबीआई जांच की संस्तुति में की गयी तीन साल की देरी ही जिम्मेदार होगी।
उत्तराखंड की जनता को सजग और सचेत रह कर इस पूरे मामले पर निगाह बनाए रखनी चाहिए। सीबीआई के हाथ में केस जाने के बाद भी सड़कें खामोश नहीं होनी चाहिए। सड़क पर अंकिता भंडारी के न्याय की आवाज़ गूंजती रहेगी, तभी कोई भी जांच और जांच एजेंसी सही दिशा में कदम बढ़ाएगी।
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अंकिता हत्याकांड में कथित 'वीआईपी' को लेकर हाल में हुए खुलासों के बाद राज्य की राजनीति में तूफान आ गया था और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन सीबीआई जांच की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। धीरे-धीरे अंकिता को न्याय दिलाने का आंदोलन पूरे उत्तराखंड में फैल गया और हर शहर, कस्बा और गांव में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी बीच अंकिता को न्याय दिलाने के लिए शनिवार को उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया था। हालांकि, इससे एक दिन पहले ही राज्य सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश कर जनता के आक्रोश को शांत करने की कोशिश की है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या सीबीआई जांच में वीआईपी का नाम सामने आएगा?
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