
एक नई फिल्म ‘चौहान’ का टीज़र या कहें की ट्रेलर रिलीज हुआ है। यह फिल्म भी उन फ़िल्मों की कड़ी में एक और फ़िल्म है जो बहुसंख्यकवादी प्रोपेगैंडा को बढ़ावा देती हैं। इसकी शुरुआत ऐसी जगह से होती है जिसे भारत सरकार अपनी कहानियों के लिए पसंद करती है – मसलन पुलवामा की एक सड़क, हवा में उड़ते पत्थर और सुरक्षा बलों की तैनाती। वॉयसओवर में आंसू गैस को बेअसर बताया जाता है क्योंकि प्रोटेक्श मास्क ऑनलाइन आसानी से मिल जाते हैं। वॉटर कैनन को भी टेम्परेरी सोल्युशन कहा गया है।
फ़िल्म का इशारा करती है कि दरअसल में कुछ ज़्यादा कड़ाई की ज़रूरत है: भीड़ पर 12-गेज शॉटगन से बर्डशॉट (छोटे छर्रे) चलाना। इस मुद्दे पर हमें थोड़ा रुककर सोचना चाहिए। भारत में बहुसंख्यकवाद का नैरेटिव अब इस भरोसे पर चल रहा है कि ऐसे दावों की कभी जांच-पड़ताल नहीं होती। तो आइए, हम जांच करते हैं।
2017 में, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने ऐसे 88 लोगों का ब्यौरा इकट्ठा किया जिनकी आंखों की रोशनी 2014 से 2017 के बीच जम्मू-कश्मीर पुलिस और सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ) द्वारा चलाई गई शॉटगन की वजह से चली गई थी। कुछ लोग तो ठीक हो गए, लेकिन कई ठीक नहीं हो पाए। एक कारतूस से 360 से 600 धातु की गोलियां निकलकर फैलती हैं और यह तय नहीं किया जा सकता कि वे कहां जाकर लगेंगी। पेलेट गन से होने वाली चोटें बिना किसी खास निशाने के लगती हैं क्योंकि शॉटगन की बैरल राइफ़ल वाली नहीं होती और उनसे निकलने वाली गोलियों पर कोई नियंत्रण नहीं होता।
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यह इस बात से साफ़ है कि जिन 88 लोगों से हमने बात की, उनमें से चौदह प्रदर्शनकारी नहीं थीं, बल्कि ऐसी महिलाएं थीं जो अपने ही घरों के अंदर घायल हुई थीं। सुरक्षा बलों के जवानों का भी उन हथियारों से लगी चोटों के लिए इलाज किया गया है जिन्हें उनके साथियों ने ही चलाया था; इनका इस्तेमाल इतना खतरनाक है।
और फिर इंशा मुश्ताक नाम की चौदह साल की एक लड़की थी, जिसने 11 जुलाई 2016 की शाम को कश्मीर में अपने गांव में बाहर देखने के लिए घर की खिड़की खोली थी। लेकिन उसके बाद वह फिर की कोई सड़क या कोई भी चीज़ नहीं देख सकी। वह पूरी तरह नेत्रहीन हो गई थी: डॉक्टरों ने इसे अब तक का सबसे भयावह मामला बताया।
राज्य के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2016 और फरवरी 2017 के बीच 6,221 लोग घायल हुए, जिनमें से 782 लोगों की आंखों में चोट लगी। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने पैलेट शॉटगन को “कश्मीर में इस्तेमाल होने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में से एक” बताया और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए भारत के हथियारों के जखीरे से इसे हटाने की सिफारिश की। जब भारत सरकार से पूछा गया कि वह बच्चों के चेहरों पर गोली क्यों चलाती है, तो उसने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए जवाब देने से इनकार कर दिया। साफ है कि सबूतों के आधार पर इसे “सीमित नुकसान” नहीं कहा जा सकता।
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‘चौहान’ फिल्म के टीजर में कहा गया है कि सीमित बल के इस्तेमाल से कोई नतीजा नहीं निकलता। यह दावा गलत है; क्योंकि कश्मीर में सरकार की ओर से कभी भी संयम नहीं बरता गया और न ही फोर्स की कोई कमी रही है। यह स्थिति दिखाती है कि तीन दशकों से ज़्यादा समय तक फोर्स के इस्तेमाल ने इस इलाके पर क्या असर डाला है। जो सरकार किसी उल्लंघन का जवाब और भी गंभीर उल्लंघन से देती है, वह लोगों का भरोसा नहीं जीत पाती, बल्कि उसे खो देती है।
प्रदर्शनकारी सड़कों पर इसलिए उतरते हैं क्योंकि भारतीय संसद के दरवाज़े उनके लिए बंद कर दिए गए हैं। और ऐसा सिर्फ़ कश्मीर में ही नहीं हो रहा है। भारत सरकार की ‘प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी’ (कानून बनाने से पहले सलाह-मशविरे की नीति), जिसे 2014 में अपनाया गया था, कहती है कि सभी प्रस्तावित कानूनों पर जनता के साथ 30 दिनों तक चर्चा की जानी चाहिए। फिर भी, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से अब तक पेश किए गए 301 बिलों में से 227 पर जनता से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया। जिन 74 बिलों को सार्वजनिक किया गया, उनमें से कम से कम 40 बिलों के मामले में 30 दिन की समय-सीमा का पालन नहीं किया गया। ‘लोकतंत्र की जननी’ अपने ही परिवार के साथ परिवार के मामलों पर चर्चा नहीं करती।
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इस बात का और सबूत कि हम सिर्फ़ नाम के लिए संसदीय लोकतंत्र हैं: स्टैंडिंग कमेटियों को भेजे जाने वाले बिलों की हिस्सेदारी 2014 से पहले के 71 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत से भी कम हो गई है।
दिसंबर 2025 में, भारत सरकार से पूछा गया कि क्या वह इस पॉलिसी के लागू होने पर नज़र रख रही है; सरकार का जवाब था कि उसने कभी इस पॉलिसी का मूल्यांकन नहीं किया और न ही इस बात का कोई रिकॉर्ड रखा कि इसे किसने माना। तेज़ी से ऐसा हो रहा है कि सरकार के सबसे ज़्यादा समस्या वाले आदेश कानून के तौर पर नहीं, बल्कि नियमों और सलाहों के तौर पर आते हैं। इन्हें एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) बिना किसी विधायी या सार्वजनिक सलाह-मशविरे के तैयार करती है।
सरकार को यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि कोई देश खुद को लोकतंत्र तो नहीं कह सकता, जब वह एक-एक कानून, नियम और एडवाइज़री के ज़रिए इस शब्द के असल मतलब को ही खोखला कर रहा हो। ऐसा करते हुए सरकार ने एक नया शब्दकोश तैयार कर लिया है: असहमति जताने वाला “देश-विरोधी” है, एक्टिविस्ट “अर्बन नक्सल” है, प्रदर्शनकारी “आंदोलनजीवी” है, रिपोर्टर “प्रेस्टिट्यूट” है और अंतिम संस्कार में शामिल युवा “पत्थरबाज़” है।
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एक बार जब प्रोपेगैंडा के ज़रिए ये बातें भारतीय सोच में घर कर जाती हैं, तो सरकार के कामों के बचाव की ज़रूरत नहीं पड़ती। एक फ़िल्म का टीज़र जो किसी अपंग बनाने वाले हथियार को ‘बहादुरी भरे संयम’ के तौर पर दिखाता है, वह उस सोच या शब्दावली को ही अपना रहा होता है। असल में, वह उसी सोच को ऐसे माध्यम में आसानी से पेश कर रहा है जिसे लोगों की सहमति निर्माण के लिए ही बनाया गया है।
खिड़की से बाहर देखने की वजह से अंधी हो गई लड़की को देखकर उसे “सीमित नुकसान” कहना हिम्मत की बात नहीं, बल्कि इसका उलटा है। जब एमनेस्टी की रिपोर्ट आई, तो मैं अपने साथी रघु के साथ कश्मीर के पुलिस प्रमुख एस पी वैद्य से मिलने गया; वे आजकल ट्विटर पर काफी एक्टिव रहते हैं। श्रीनगर में पुलिस हेडक्वार्टर और वहां काम करने वाले अधिकारियों की पृष्ठभूमि काफी कुछ बताने वाली थी, और मैं इस बारे में किसी और समय लिखूंगा।
वैद ने हमारी खातिरदारी करते हुए हमारी रिपोर्ट की एक कॉपी ली। उन्होंने उन बातों पर ध्यान दिया जिनमें हमने बताया था कि उनके लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर शॉटगन चलाने से क्या नुकसान हुआ था। उन्होंने हमारी बातों का विरोध तो नहीं किया, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि इस हथियार का इस्तेमाल क्यों बंद कर दिया जाना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि यह ऐसा हथियार है जिसका इस्तेमाल भारत में कहीं और भीड़ को काबू करने के लिए नहीं किया जाता है। उन्होंने जवाब दिया कि ‘इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।‘
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