
बांग्लादेश में जब वोटों की गिनती चल ही रही थी, बीएनपी के एक वरिष्ठ नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा, ‘जिलों से मिली जमीनी रिपोर्ट और रिटर्निंग ऑफिसर के जारी सर्टिफिकेट दो-तिहाई बहुमत की ओर इशारा कर रहे हैं।’ अंतिम नतीजों ने उनके अंदाजे को सही साबित कर दिया। बीएनपी की तुलना में जमात ज्यादा गोल-गोल बातें कर रही थी। जमात के महासचिव मिया गुलाम परवार ने उस वक्त कहा था, ‘मुझे अपने चुनाव क्षेत्र (खुलना-5) में जीत का भरोसा है, लेकिन कुल मिलाकर गिनती पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा।’ आखिर में परवार बीएनपी के मोहम्मद अली असगर से हार गए।
जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी एक समय अवामी लीग के दबदबे का मुकाबला करने वाले साथी थे, और जमात के सड़कों पर उतरने से बीएनपी के अभियान को मजबूती मिली। जमात ने नतीजों पर सवाल उठाए हैं, और बीएनपी पर सरकारी मशीनरी के जरिये धांधली करने का आरोप लगाया है। खुद को 2024 के विद्रोह का ‘असली’ प्रतिनिधि बताते हुए, जमात तर्क देती है कि बीएनपी का आना बस एक तानाशाही को दूसरे से बदलना है।
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दोनों के लिए आगे मुश्किल समय है। बीएनपी को जल्दी साबित करना होगा कि वह राज करने वाली पार्टी है और उसने पिछली गलतियों से सबक सीखा है। वहीं, जमात को साबित करना होगा कि वह एक जिम्मेदार विपक्ष हो सकती है।
हालांकि जमात ने अपने रुख और छवि को नरम किया है, लेकिन इसने 1971 में देश की आजादी का विरोध करने वाले इस्लामी कट्टरपंथी का टैग नहीं हटाया है। कुछ लोगों का मानना था कि जमात को अमेरिका और पाकिस्तान का समर्थन है और पैसों की उसके पास कमी नहीं, इसलिए वह जीत जाएगी। बहरहाल, जानकारों का कहना है कि जमात की हार प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश की जीत का संकेत है।
नतीजों से यह भी पता चलता है कि अवामी लीग को चुनाव में हिस्सा लेने से रोकने के बाद भी जनता में उसकी पकड़ बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोगों ने बैलेट पेपर पर लिखा- ‘नाव नहीं, तो वोट नहीं’। गौरतलब है कि अवामी लीग का चुनाव चिह्न नाव रहा है। इसके अलावा करीब 40 फीसद लोगों ने वोट नहीं किया और माना जा रहा है कि इसमें बड़ी संख्या में अवामी लीग के समर्थक थे। चुनाव में बीएनपी ने 200 से ज्यादा सीटें जीतीं जबकि जमात को अपने सहयोगी नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर भी 70 से कम सीटें मिलीं।
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चुनाव नतीजे यह भी बताते हैं कि बांग्लादेश की महिलाओं, पहली बार वोट देने वालों और युवा मतदाताओं ने जमात के इस्लामी नैरेटिव के खिलाफ वोट दिया। लगभग 5.6 करोड़ या 44 फीसद वोटर 18 से 37 साल की उम्र के थे, और लगभग 50 लाख पहली बार वोट दे रहे थे। जमात की सीटों की संख्या बढ़ी है, यह देखते हुए कि 1991 में इसने सिर्फ 18 सीटें और 2001 में 17 सीटें जीती थीं, जब वह बीएनपी के साथ गठबंधन में थी।
संसद में पचास और सदस्य, जो सभी महिलाएं होंगी, बाद में संसद में शामिल होंगी। इन्हें राजनीतिक पार्टियों द्वारा जीती गई सीटों के आधार पर आनुपातिक बंटवारे के मुताबिक चुना जाएगा।
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पहले भारत के साथ बीएनपी के रिश्ते अच्छे नहीं रहे। इसके बावजूद बांग्लादेश का इस्लामी नैरेटिव को नकारना और 1971 की आजादी की विरासत को फिर से जिंदा करना- दोनों देशों के रिश्तों पर बहुत बड़ा असर डालेंगे। यह दोनों देशों के लिए अपने रिश्तों को फिर से ठीक करने और एक नई शुरुआत करने का मौका है। बीएनपी प्रमुख तारिक रहमान ने भारत के साथ एक बराबर और इज्जतदार पार्टनर की हैसियत से रिश्तों को आगे बढ़ाने की इच्छा जताई भी है।
हाल-फिलहाल नई दिल्ली में बांग्लादेश को दो नजरियों से देखा जाता रहा। हाल ही में एक इंटरव्यू में पूर्व नौकरशाह और बांग्लादेश मामलों की जानकार वीना सिकरी ने कहा: ‘हम जानते हैं कि बांग्लादेश में सरकार बदलने के ऑपरेशन को पश्चिमी ताकतों का समर्थन था, लेकिन यह पाकिस्तान के जरिये किया गया और बांग्लादेश में पाकिस्तान का सबसे बड़ा जरिया जमात-ए-इस्लामी है’।
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जमात के नेतृत्व वाले बांग्लादेशी इस्लामियों के पाकिस्तान के साथ नजदीकी बढ़ाने और हिन्दुओं पर जुल्म करने के हौवे ने चुनाव वाले पश्चिम बंगाल और असम में धार्मिक ध्रुवीकरण पर आधारित भाजपाई अभियान में मदद की। जमात की जबरदस्त हार इस नैरेटिव को कमजोर करेगी।
बांग्लादेश के नतीजे नई दिल्ली के दूसरे नजरिये को मजबूत करेंगे जो ज्यादा व्यापक है और इसे विदेश मंत्री एस. जयशंकर और भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार- अजीत डोभाल और खलीलुर रहमान- आगे बढ़ा रहे हैं।
बीएनपी का स्पष्ट जनादेश के साथ सत्ता में आना दोनों पड़ोसियों के लिए एक मौका है। प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की तरफ से प्रधानमंत्री बनने जा रहे तारिक रहमान को बधाई संदेश दिल्ली की फिर से बातचीत करने की इच्छा का संकेत देते हैं।
(सौरभ सेन कोलकाता में रहने वाले स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं।)
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