
उसकी हिम्मत कैसे हुए कि वह बंगाल आकर बंगालियों को बताए कि दुर्गा पूजा कैसे मनाना है? क्या कभी बंगालियों ने किसी और राज्य के लोगों को बताया है कि क्या खाए-पिएं और त्योहार कैसे मनाएं? दुर्गा पूजा के दौरान मीट-मछली खाने वाले बंगालियों को फर्जी हिंदू या पाखंडी कहने के बाद भी उसे छोड़ कैसे दिया गया? आखिर उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?
ये सारे सवाल एबीपी समूह के बांगला न्यूज चैनल आनंदा के प्रसिद्ध ऐंकर ने उठाए हैं। प्राइम टाइम में हुए एक डिबेट शो के दौरान पैनल में शामिल लोगों ने सवाल यह भी उठाया कि एक मध्य प्रदेश के इस अनजान बाबा को बंगालियों को बुरा-भला कहने और समाज में बंटवारा करने की इजाज़त कैसे दी जा सकती है?
लोगों का गुस्सा जायज़ है। बंगाली लोग इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वे सालाना दुर्गा पूजा के त्योहार को माँ दुर्गा की घर वापसी मानते हैं, जब बेटी अपने मायके लौटती है और उसे तरह-तरह के अच्छे पकवान खिलाए जाते हैं और उसका खूब लाड़-प्यार किया जाता है। बेटी का स्वागत सबसे अच्छी मछली और मांस के साथ करने की परंपरा रही है।
इस सबके बीच कोलकाता जिला कांग्रेस कमेटी ने बाबा बागेश्वर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।
स्वामी विवेकानंद ने न केवल अपने अनुयायियों को मांस खाने के लिए कहा, बल्कि उन्हें खुद भी मांस पकाना पसंद था। मांस शाक्त हिंदू धर्म का एक अहम हिस्सा है। प्राचीन रीति-रिवाजों के तहत इसे माँ दुर्गा और माँ काली को चढ़ाया जाता है। दुर्गा पूजा के दौरान नवमी/दशमी पर भक्त जो प्रसाद खाते हैं, वह मांस ही होता है। इस पवित्र रीति-रिवाज में किसी भी तरह का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बढ़ते विवाद से शर्मिंदा बीजेपी नेता मामले को शांत करने में लगे हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शामिक भट्टाचार्य ने बाबा की बातों को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा, "किसी भी साधु या राजनीतिक पार्टी को किसी पर खान-पान से जुड़ी पाबंदियां थोपने का अधिकार नहीं है। साथ ही, किसी भी बाबा को खुद को स्वामी विवेकानंद से ऊपर नहीं समझना चाहिए।" उन्होंने आगे कहा कि बंगाली लोग 'पूजा' के दौरान हमेशा से जो खाते आए हैं, वही खाते रहेंगे।
बीजेपी के अन्य नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी-विरोधी ताकतों ने इस मामले पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दी है और बात का बतंगड़ बनाया है। उन्होंने कहा कि बागेश्वर बाबा को अपनी बात कहने का अधिकार है, और साथ ही बंगालियों को उनकी अपील को नज़रअंदाज़ करने का भी अधिकार है। उन्हें इतनी अहमियत क्यों दी जाए?
इसके जवाब में राज्य सरकार ने बागेश्वर बाबा के पश्चिम बंगाल के पहले दौरे (जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं) के लिए ज़ोरदार स्वागत की तैयारी की। मुख्यमंत्री ने उनका सम्मान किया और राज्य के गेस्ट हाउस ‘सौजन्य’ में उनके लिए एक सरकारी भोज का आयोजन किया। लगभग पूरी कैबिनेट वहां मौजूद थी और बाबा का आशीर्वाद लेने के बाद मंत्री ज़मीन पर पालथी मारकर बैठने के लिए कतार में लग गए। केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार और राज्य बीजेपी प्रमुख शमिक भट्टाचार्य भी वहां मौजूद थे। मुख्य सचिव और सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी वहां थे और खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने बाबा को राज्य में अपने केंद्र खोलने के लिए आमंत्रित किया था।
बाबा पूर्व मुख्यमंत्री की आलोचना करते रहे हैं और उन्होंने कसम खाई थी कि जब बंगाल में बीजेपी सत्ता में आएगी तभी वे बंगाल का दौरा करेंगे। अब जब दीदी चली गई हैं और दादा सत्ता में हैं, तो बाबा ने कहा, राज्य ज़रूर तरक्की करेगा। उन्होंने यह भी कहा, ‘एक बार सीएम हाउस में भी दरबार लगना चाहिए’ (कम से कम एक बार बाबा को CM के सरकारी घर पर भी मिलना चाहिए)। शायद उन्हों जानकारी नहीं है कि पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री के लिए कोई तय घर नहीं है। आधी सदी से ज़्यादा समय से, राज्य के मुख्यमंत्री अपने घरों में ही रहते आए हैं।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता तथागत रॉय ने इस गरमा-गरम बहस पर तंज कसते हुए कहा, "हिंदुओं को नीचा दिखाने की कोशिश करने वाले हठी और बेवकूफ लोगों की हरकतें दिलचस्प हैं। हो सकता है कि बागेश्वर धाम के धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने नवरात्रि में नॉन-वेज खाना खाने पर ऐतराज़ जताया हो। मैं उनसे सहमत नहीं हूं और नवरात्रि में नॉन-वेज खाता भी हूं। फिर भी मैं 100 प्रतिशत हिंदू हूं। हिंदुत्व में 'मुनाफिक' (आधे-अधूरे मानने वाले) जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। यही विविधता हिंदुत्व की असल पहचान है। मैं धीरेंद्र ब्रह्मचारी का सम्मान कर सकता हूं, लेकिन उन्होंने जो कहा वह कोई फरमान नहीं है (हिंदू फरमान जारी नहीं करते); और मैं न तो धीरेंद्र ब्रह्मचारी, न मनु-संहिता और न ही कुरान-हदीस को अपनी ज़िंदगी कंट्रोल करने देता हूं।"
फिलहाल, इस विवाद के ठंडा पड़ने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। इस बीच, 'बाबा' ज़रूर बहुत खुश होंगे। पश्चिम बंगाल में पहले ज़्यादा जाने-पहचाने नहीं होने के बावजूद, पिछले कुछ दिनों में वे घर-घर में पहचाने जाने लगे हैं और लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वे हैं कौन। उनका मकसद भी काफी हद तक पूरा हो गया है, क्योंकि दुर्गा पूजा से पहले बंगाल कभी इतना बंटा हुआ नहीं रहा। बंगाली और गैर-बंगाली आमने-सामने हैं, और ऐसी आशंका बढ़ रही है कि इस बार पूजा के दौरान तनाव और टकराव भी हो सकता है।
बागेश्वर बाबा, जिन्हें धीरेंद्र शास्त्री के नाम से भी जाना जाता है, 30 साल के हैं और मध्य प्रदेश के एक मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। इस मंदिर की स्थापना उनके दादाजी ने की थी। उनका दावा है कि वे आने वाले लोगों के मन की बात पढ़ लेते हैं और उनके कुछ कहने से पहले ही बता देते हैं कि उन्हें किस बात की चिंता है। वे लाइव 'दरबार' लगाते हैं और लोगों से कहते हैं कि वे अपनी 'अर्ज़ी' (समस्या) एक कागज़ की पर्ची पर लिखें; इससे पहले कि लोग अपनी अर्ज़ी लिखना खत्म करें, 'बाबा' खुद दूसरी पर्ची पर उसका समाधान या उपाय लिख देते हैं।
उनकी इस कलाबाजी को एक बार नागपुर में एक तर्कवादी ने उन्हें फिर से वही करने की चुनौती दी, लेकिन शर्त यह थी कि जिन लोगों पर यह प्रयोग किया जाएगा, उन्हें बाबा नहीं बल्कि तर्कवादी ही चुनेगा; इस पर बाबा ने अपना कार्यक्रम बीच में ही छोड़ दिया और शहर से चले गए। वे दुष्ट आत्माओं को भगाने का काम भी करते हैं और कथित भूत-प्रेत के साये में आए स्त्री-पुरुषों का इलाज भी करते हैं। एक बार उन्होंने कैंसर के इलाज के तौर पर गोमूत्र लेने की सलाह दी थी। पिछले कुछ सालों से, वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद से एक कैंसर अस्पताल बनवा रहे हैं; मोदी उन्हें अपना छोटा भाई मानते हैं। ज़ाहिर है, उनके आरएसएस और बीजेपी से करीबी संबंध हैं।
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