
बिहार विधानसभा चुनाव में अति महत्वपूर्ण दूसरे चरण का मतदान कल (मंगलवार, 3 नवंबर को) होना है। इस दौर में कुल 94 सीटों पर मतदान होना है जो एनडीए और महागठबंधन दोनों की किस्मत का फैसला कर देगा। लेकिन 10 नवंबर को होने वाली वोटों की गिनती में नतीजे जो भी निकलें, एक बात तय है कि इस चुनाव ने आरजेडी को तेजस्वी यादव के रूप में एक ऐसा नेता दे दिया है जिसकी लोकप्रियता पूरे बिहार में है।
इस चुनाव ने एक बात और साफ कर दी है कि आरजेडी ने बिहार के जातीय समीकरणों को भी धुंधला कर दिया और लोगों का साफ तौर पर जाति से ऊपर उठकर मतदान करने का आह्वान किया है। तेजस्वी का इस चुनाव में ये नारा काफी लोकप्रिय हो रहा है कि ‘बिहार से लोगों का पलायन रोकने के लिए कमाई, दवाई और पढ़ाई की व्यवस्था बिहार में ही हो।’ तेजस्वी के इस नारे से राज्य के युवा काफी उत्साहित हैं और सभी वर्गों में इसकी चर्चा हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने एक नई जाति को सामने रखा है जो है बेरोजगार जाति। एक बात और इस चुनाव से निकलकर सामने आई है वह यह कि अपने पिता लालू यादव की ही तरह तेजस्वी यादव भी किसी हालत में बीजेपी से हाथ नहीं मिलाने वाले हैं।
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दूसरी तरफ एनडीए का प्रचार जरा फीका रहा है और खास तरह के नैरेटिव के आसपास ही रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार को 1990 से 2005 वाले बिहार के कथित ‘जंगलराज’ याद दिला रहे हैं जब तेजस्वी के पिता लालू और मां राबड़ी राज्य की मुख्यमंत्री रहे हैं। पीएम मोदी ने तो तेजस्वी यादव को ‘जंगलराज के युवराज’ की उपाधि दे दी है। साथ ही उन्होंने कहा कि इनका हश्र भी वही होगा जो 2017 में यूपी के युवराज अखिलेश यादव का हुआ था।
नीतीश कुमार की हताशा तो इस हद तक सामने आई है कि वे युवाओं को उलाहना दे रहे हैं कि “जाओ अपने बाप से पूछो...जंगलराज क्या था...।” इसके अलावा एनडीए की हताशा का आलम यह है कि बिहार के चुनाव में 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक की बाच करने लगे हैं, लेकिन रोचक है कि 2020 के चीनी अतिक्रमण पर चुप्पी साध रखी है।
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एनडीए की एक और कमजोरी इस चुनाव में सामने आई है, वह है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों का 2015 के विधानसभा चुनाव से यू-टर्न। 2015 में तो दोनों एक-दूसरे को लगभग राजनीतिक तौर पर कोस रहे थे। पीएम मोदी ने नीतीश के डीएनए की बात की थी तो नीतीश कुमार ने बीजेपी को भारतीय झूठ पार्टी करार दिया था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में नीतीश कुमार के 30 घोटाले भी गिनाए थे। लेकिन अब दोनों एक ही मंच साझा कर रहे हैं, एकदूसरे की पीठ थपथपा रहे हैं, और उन्हें लगता है कि लोग वह सब भूल चुके हैं। लेकिन दोनों के भाषणों में खोखलापन साफ नजर आ रहा है।
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इसके बरअक्स आरजेडी ने स्मार्ट तरीका अपनाते हुए नीतीश कुमार के बीते तीन साल के काम को मुद्दा बनाया है, खास तौर से कोरोना महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों को लेकर बिहार सरकार के रवैये को लोगों के सामने रखा है। इसके अलावा महागठबंधन ने दस लाख नौकरियों का ऐलान करके एनडीए को सकते में डाल दिया है। हालांकि नीतीश कुमार ने यह कहकर इस ऐलान का मजाक उड़ाने की कोशिश की कि तेजस्वी को सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है इसलिए ऐसी घोषणाएं कर रहे हैं। वहीं डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने बाकायदा हिसाब-किताब सामने रख दिया कि सरकार के पास तो इतने पैसे ही नहीं है कि 10 लाख लोगों को नौकरी दी जा सके। लेकिन तेजस्वी ने इस बात का जवाब यह कहकर दिया कि ‘जहां चार, वहां राह...।’ इसके बाद नीतीश कुमार ने यह कहकर बिहार में उद्योग न होने का बहाना किया कि बिहार समुद्र किनारे नहीं है इसलिए यहां उद्योग नहीं लगते, इसके जवाब में तेजस्वी ने यूपी, पंजाब, हरियाणा जैसे कई राज्यों के नाम गिना दिए जिसकी सीमा से समुद्र नहीं लगता, लेकिन वहां खूब उद्योग हैं। इतना ही काफी नहीं था, कि एनडीए ने अपने घोषणा पत्र में 19 लाख नौकरियों का वादा कर दिया।
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चुनावी वादे दरअसल दुधारी तलवार की तरह होते हैं। अगर तेजस्वी यादव सरकार बनाने में कामयाब होते हैं तो उन्हें चुनावी वादे पूरे करने के लिए इसी दुधारी तलवार पर चलना होगा। लेकिन फिलहाल तो तेजस्वी ने अपनी कैमिस्ट्री और गणित दोनों ही दुरुस्त कर रखा है। जंगलराज के नारे को भी तेजस्वी ने यह कहकर कुंद कर दिया कि वह सामाजिक न्याय के दिन थे और ज आर्थिक न्याय की जरूरत है।
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असल में बिहार जातीय व्यवस्था और राजनीति का शिकार रहा है। ऐसे में कोई भी राजनीतिक विश्लेषक बहुत सोच समझकर ही चुनावी नतीजों का अनुमान सामने रख सकेगा। लेकिन एक बात साफ है कि इस बार का विधानसभा चुनाव एनडीए के लिए कम से कम केकवॉक तो नहीं है। और ऐसा सिर्फ एक महीने में हुआ है जब माहौल एकदम बदल गया है। हो सकता चुनावी नतीजे बहुत नजदीकी हों, लेकिन जीतें या हारें, तेजस्वी यादव ने कम से कम अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत अच्छी की है और ऐसा लगता है कि एक क्रिकेटर के तौर पर उनकी पारी भले ही छोटी रही हो, राजनीति में वह लंबी पारी खेलने वाले हैं।
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