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वाराणसी और लखनऊ हारी बीजेपी, यूपी MLC चुनाव के नतीजे महज़ हारजीत नहीं, 2027 से पहले बड़ा जमीनी सर्वे भी

वाराणसी और लखनऊ जैसी सीटों पर बीजेपी की हार पार्टी के उस ‘अविजित योद्धा’ वाले दावों पर भी करारा प्रहार है जो अक्सर हिन्दुत्व और धार्मिक राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द बुना जाता है।

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Getty Images NIHARIKA KULKARNI

उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनावों में वाराणसी, लखनऊ, आगरा और प्रयागराज-झांसी जैसे मजबूत गढ़ों में बीजेपी की शिकस्त और समाजवादी पार्टी की शानदार वापसी का एक बड़ा संकेत यह भी है कि सूबे का प्रबुद्ध और मध्यवर्ग अब सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति से संतुष्ट नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और सूबे की राजधानी लखनऊ जैसी सीटों पर बीजेपी की हार महज़ उम्मीदवारों की हार नहीं, बीजेपी के उस ‘अविजित योद्धा’ वाले दावों पर भी करारा प्रहार है जो अक्सर हिन्दुत्व और धार्मिक राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द बुना जाता है।

काशी, मथुरा (आगरा खंड) और प्रयागराज जैसी धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नगरियों में जब देश का सबसे शिक्षित तबका यानी शिक्षक और स्नातक मतदाता रोजगार, पेपर लीक, पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) और महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों पर मुहर लगाते हैं, तो यह संदेश साफ होता है कि सिर्फ ‘धार्मिक प्रतीकों’ के इस्तेमाल से जनता के असल सरोकारों को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। इसे 2024 में अयोध्या में बीजेपी को मिली हार और सपा की जीत के विस्तार के तौर पर भी देखा जा रहा है।

कड़ी चौकसी के बीच लगी सेंध 

यह नतीजे इसलिए भी अहम हैं कि इनकी कमान पूरी तरह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने हाथ में रखी थी और ऐसे में पूरे प्रशासनिक तंत्र और व्यवस्थाओं की सक्रिय मौजूदगी में लखनऊ स्नातक सीट का बीजेपी से छिटककर समाजवादी पार्टी के खाते में चला जाना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र में सपा की पुरानी पकड़ का और ज्यादा मज़बूत होना और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहक्षेत्र गोरखपुर में बीजेपी उम्मीदवार का बमुश्किल 307 मतों से जीत पाना एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

इन चुनावों में 11 में से 6 सीटों पर बीजेपी और 5 पर सपा प्रत्याशी जीते हैं। अंकों में यह नतीजे पुराने नतीजों (6-5) की वापसी या यथास्थिति का बयान लग सकते हैं, लेकिन वाराणसी में सपा का कब्जा बरकरार रह जाने, उससे भी ज़्यादा लखनऊ की प्रतिष्ठापूर्ण स्नातक सीट अपने हाथ से निकलकर सपा के खाते में चले जाने और आगरा की हार से बीजेपी ही नहीं पूरा सत्ता प्रतिष्ठान सकते में है।

2027 का सेमीफ़ाइनल और योगी की पकड़ का सवाल

राजनीतिक पंडित अगर इन नतीजों को 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों के पूर्व के ‘सेमीफाइनल’ और ‘लिटमस टेस्ट’ के रूप में देख रहे हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ठीक है कि विधान परिषद (एमएलसी) के चुनाव की हार-जीत सीमित और शिक्षित मतदाता वर्ग (शिक्षकों और स्नातकों) के बीच तय होती है, लेकिन यही वह वर्ग है जिसके बारे में माना जाता है कि वह समाज में राय बनाने (ओपिनियन मेकिंग) का काम करता है।

ऐसे में इन नतीजों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक पकड़ के कमजोर पड़ने के रूप में पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, लेकिन यह इस बात का संकेत तो जरूर है कि ‘डबल इंजन’ सरकार के प्रति शहरी शिक्षितों के भीतर एक अंतर्निहित असंतोष पनप रहा है। यह व्यवस्था के खिलाफ बढ़ती सोच (एंटी-इन्कंबेंसी) और स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर टिकट बंटवारे तथा गुटबाजी का भी नतीजा है, जिसने विपक्ष को खासकर सपा के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और प्रबुद्ध जोड़ को जमीन पर मजबूत होने का मौका दिया। 

युवाओं और पढ़े-लिखे वर्ग का जनादेश

प्रदेश की राजनीति, ख़ासकर युवा गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने वाले योगेश सवाल उठाते हैं कि ऐसे समय में जब सत्ता ने अपने सारे घोड़े खुले छोड़ रखे हों, इसे युवाओं और पढ़े-लिखे वर्ग का जनादेश क्यों न माना जाए! वे इसे कोरी हारजीत का मामला नहीं, एक तरह का मुकम्मल ज़मीनी सर्वे मानते हैं: ‘हर सीट पर एक से डेढ़ लाख वोट का अनुमान भी ले लें तो यह मौसमी और प्रायोजित सर्वे से अलग पूरे यूपी (72 ज़िलों का) में बहुत बड़े सैम्पल साइज़ वाला ऐसा ज़मीनी सर्वे माना जा सकता है, जो मौलिक यानी ओरिजिनल भी है और ज़मीनी भी। कानपुर, कानपुर देहात और उन्नाव के चुनाव सीट रिक्त होने के कारण पहले ही हो चुके हैं। 

बैलट पेपर से हुए चुनाव का मनोवैज्ञानिक असर

इस चुनाव की सबसे बड़ी चर्चा इसकी प्रक्रिया को लेकर भी है, क्योंकि यह पूरी चुनावी लड़ाई बैलट पेपर (मतपत्र) के जरिए लड़ी गई। जानकारों का मानना है कि लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल उठा रहे विपक्षी दलों को मतपत्रों से मिली इस जीत ने एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक हथियार भी दे दिया है। विपक्ष अब इस बात को जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है कि जब भी चुनाव मतपत्रों से निष्पक्ष तरीके से होते हैं, तो जनता का असली मूड सामने आता है। हालांकि, भाजपा ने मेरठ और गोरखपुर जैसी कुछ सीटों पर जीत हासिल कर अपनी मौजूदगी बनाए रखी है, लेकिन मुख्य शहरी और वीआईपी क्षेत्रों में मतपत्रों से मिली हार ने सत्तापक्ष को रक्षात्मक रुख अपनाने और ईवीएम बनाम बैलट की बहस को नए सिरे से हवा देने का मौका दे दिया है, जो 2027 के आम चुनावों के नैरेटिव को प्रभावित करेगा।

पांच दशक बाद शिक्षक गुट का सफाया

इस चुनाव में एक और उलटफेर हुआ। विधान परिषद के खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में शिक्षक गुट का ही सफाया हो गया है। यानी यह पहली बार होगा जब उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ का कोई भी नुमाइंदा सदन में मौजूद नहीं होगा। ऐसा करीब पांच दशक बाद हुआ है। अब तक सिर्फ एक सीट संघ के पास हुआ करती थी, लेकिन ध्रुव कुमार त्रिपाठी (अब तक शिक्षक संघ वाले) के गोरखपुर से बतौर बीजेपी सदस्य निर्वाचित हो जाने के बाद वह कोटा पहली बार खत्म हो गया है। यह भी एक रिकार्ड है कि  संगठन के अध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा आठ बार 48 वर्षों तक एमएलसी रहे।

यूपी में जीते हुए उम्मीदवार और सीटें

• मेरठ स्नातक सीट: दिनेश कुमार गोयल (BJP)

• मेरठ शिक्षक सीट: श्रीचंद शर्मा (BJP)
• आगरा स्नातक सीट: डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह 'गुरु जी' (BJP)
• आगरा शिक्षक सीट: डॉ. आकाश अग्रवाल (SP)
• इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक सीट: डॉ. मान सिंह यादव (SP)
• लखनऊ शिक्षक सीट: उमेश द्विवेदी (BJP)
• लखनऊ स्नातक सीट: कांति सिंह (SP)
• वाराणसी शिक्षक सीट: लाल बिहारी यादव (SP)
• वाराणसी स्नातक सीट: आशुतोष सिन्हा (SP)
• बरेली-मुरादाबाद खंड शिक्षक सीट: डॉ. हरी सिंह ढिल्लो (BJP)
• गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक सीट: ध्रुव कुमार त्रिपाठी (BJP) - विजेता

बिहार की आठ में से चार सीट एनडीए जीता, जनसुराज का खाता खुला 

बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर हुए चुनाव में चार सीट भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) गठबंधन के खाते में गईं। वहीं हालिया उपचुनाव में पटना ज़िले की बांकीपुर सीट से विधानसभा में खाता खोलने वाली प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट पर जीतकर विधान परिषद में भी प्रवेश कर लिया है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) एक सीट ही जीत पाई और 2 सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। 

बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की जीत: पटना स्नातक सीट से जेडीयू के नीरज कुमार, दरभंगा स्नातक सीट से बीजेपी के सर्वेश कुमार, तिरहुत शिक्षक सीट से बीजेपी के नरेंद्र प्रसाद सिंह, कोसी स्नातक सीट से बीजेपी के डॉ. एनके यादव विजयी घोषित हुए हैं। जबकि पटना शिक्षक सीट से आरजेडी के डॉ. संजीव सिंह, दरभंगा शिक्षक सीट से जनसुराज के डॉ. सुरेश प्रसाद राय, तिरहुत स्नातक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक सीट से निर्दलीय राहुल राज चुनाव जीते हैं।

जीते हुए उम्मीदवार - एक नजर में

  • पटना शिक्षक: डॉ. संजीव कुमार (RJD)

  • पटना स्नातक: नीरज कुमार (JDU)

  • दरभंगा शिक्षक: सुरेश राय (Jan Suraj)

  • दरभंगा स्नातक: सर्वेश कुमार (BJP)

  • तिरहुत शिक्षक: डॉ. नरेंद्र सिंह (BJP)

  • तिरहुत स्नातक: बंशीधर बृजवासी (IND)

  • सारण शिक्षक: राहुल राज (IND)

  • कोसी स्नातक: एनके यादव (BJP)

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